ज्यादा मतदान प्रतिशत का उत्सव!

Categorized as अजित द्विवेदी कालम

देश में मत प्रतिशत बढ़ने का उत्सव मनाया जा रहा है। चुनाव आयोग इसे लोकतंत्र की मजबूती और जीत का प्रतीक बता रहा है। भारतीय जनता पार्टी से लेकर राइटविंग इको सिस्टम इस बात से आह्लादित है कि मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर से मतदाता सूची की ऐसी सफाई हुई कि मतदान बढ़ गया। असल में मतदान तो औसत रफ्तार से ही बढ़ा है। मतदान प्रतिशत जरूर बढ़ा है, जिसके पीछे एक बड़ा कारण एसआईआर है। मतदान किस रफ्तार से बढ़ा है इसे सिर्फ एक आंकड़े से समझा जा सकता है। पश्चिम बंगाल में 10 फीसदी मतदान बढ़ने का हल्ला है। लेकिन असल में मतदान करने वाले लोग 3.6 फीसदी ही बढ़े हैं, जो पिछले 10 चुनावों में सबसे कम है। जाहिर जब 91 लाख लोगों के नाम कट जाएंगे तो वह मतदान प्रतिशत में जो प्रतिबिम्बित होगा ही।

बहरहाल, अब सवाल है कि चार राज्यों पश्चिम बंगाल, असम, केरल और तमिलनाडु और एक केंद्र शासित प्रदेश पुडुचेरी में सामान्य से बहुत ज्यादा मतदान होने से क्या किसी तरह का चुनावी संकेत मिलता है? इसका जवाब है कि कोई संकेत नहीं मिलता है और यह एक्जिट पोल के अनुमानों से भी जाहिर होता है। जैसे पश्चिम बंगाल और केरल में मतदान प्रतिशत बढ़ा तो सत्ता बदलने का अनुमाना है लेकिन तमिलनाडु, पुडुचेरी और असम में मतदान बढ़ा तो वहां सत्तारूढ़ दल की वापसी का संकेत है। इसका अर्थ है कि मतदान प्रतिशत बढ़ने या घटने का नतीजों पर कोई एक निश्चित असर नहीं होता है। यह असर अलग अलग राज्यों में अलग अलग हो सकता है।

पारंपरिक और शास्त्रीय राजनीतिक विश्लेषण के हिसाब से ऐसा माना जाता है कि मतदान प्रतिशत बढ़ने से सत्तारूढ़ दल को नुकसान होता है। ज्यादा मत प्रतिशत को सरकार विरोधी भावना का प्रकटीकरण माना जाता है, जबकि कम मतदान या सामान्य मतदान को यथास्थिति का संकेत माना जाता है। परंतु अब शास्त्रीय परिभाषा बदल गई है। अब मतदान प्रतिशत में भारी बढ़ोतरी के बावजूद सरकारें सत्ता में वापसी कर रही हैं। पिछले साल बिहार में ऐसा दिखा और इस बार तमिलनाडु, असम और पुडुचेरी में दिख रहा है। मतदान प्रतिशत बढ़ने पर जितने राज्यों में सरकार बदल रही है, उससे ज्यादा सरकारें वापस लौट रही हैं। इसका अर्थ है कि चुनाव नतीजों को समझने के लिए दूसरे पहलुओं पर देखने की जरुरत है।

उन पहलुओं पर विचार से पहले यह समझना होगा कि हालिया चुनावों में मतदान प्रतिशत में अप्रत्याशित बढ़ोतरी के क्या कारण हैं? पहला कारण तो मतदाता सूची का विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर है। एसआईआर के बाद पहला चुनाव बिहार में हुआ था, जहां मतदान में सीधे 10 फीसदी की बढ़ोतरी हो गई थी। एसआईआर में 10 फीसदी के करीब वोट कटे थे और मत प्रतिशत उतना ही बढ़ा था। मतदान करने वालों की वास्तविक संख्या में भी बढ़ोतरी हुई थी। मतदान में 10 फीसदी की बढ़ोतरी के बाद भी नीतीश कुमार की सरकार पहले से ज्यादा बहुमत से लौटी। बिहार के बाद 12 राज्यों में एसआईआर हुआ, जिसमें से पांच राज्यों में मतदान हुआ है। असम में एसआईआर नहीं एसआर यानी विशेष पुनरीक्षण हुआ था। मतलब वहां पुनरीक्षण में गहनता की कमी रही। बहरहाल, इन सभी राज्यों में एब्सेंट, शिफ्टेड, डेड एंड डुप्लीकेट यानी एएस़डीडी मतदाताओं के नाम कटने का असर मतदान प्रतिशत पर दिखा। पश्चिम बंगाल को छोड़ दें तो बाकी राज्यों में यह प्रक्रिया बहुत सहज रही। बंगाल में तार्किक विसंगति के नाम पर 27 लाख से ज्यादा लोगों के नाम कटे। वह एक अलग विश्लेषण का विषय है। इतनी बड़ी संख्या में लोगों को दस्तावेज होने के बावजूद मतदान से वंचित कर देना बहुत चिंताजनक विषय है।

सो, मतदान प्रतिशत बढ़ने का एक कारण तो मतदाता सूची की सफाई है, जिससे मृत मतदाताओं, स्थायी रूप से शिफ्ट कर गए मतदाताओं और डुप्लीकेट मतदाताओं के नाम कट गए। इससे जब मतदाता सूची का आधार कम हुआ तो अपने आप प्रतिशत में बढ़ोतरी हुई। इसके अलावा मतदान बढ़ने का एक कारण यह है कि हर पांच साल पर लाखों की संख्या में नए मतदाता जुड़ते हैं, जिनमें बड़ी संख्या में पहली बार मतदान करने वालों की होती है। यह भी हर राज्य की परिघटना है। तीसरा कारण यह है कि चुनाव आयोग मतदान प्रतिशत बढ़ाने का अभियान चलाता है। लोगों को प्रेरित करता है, जिसका लाभ मिलता है। चौथा कारण यह है कि राजनीतिक दल पहले से ज्यादा साधन संपन्न हैं और वे मतदाताओं को बूथ तक लाने के लिए अतिरिक्त प्रयास कर रहे हैं। यह कहने में कोई हिचक नहीं है कि भारतीय जनता पार्टी ने हर जगह चुनाव को एक बहुत बड़े इवेंट में बदल दिया है। पहले की तरह मतदान एक सहज प्रक्रिया नहीं है। उसने चुनाव को बहुत पोलराइज भी किया है। इससे भी लोकसभा से लेकर हर राज्य के चुनाव में मतदान प्रतिशत बढ़ता है।

सो, ये कई कारण हैं मतदान प्रतिशत बढ़ने के। अब सवाल है कि मतदान प्रतिशत बढ़ने के आधार पर अगर नतीजों का अकलन नहीं किया जा सकता है तो किस आधार पर करेंगे? इसके लिए हर राज्य को अलग अलग पहलुओं से समझना होगा। लेकिन उससे पहले एक कॉमन बात समझने की जरुरत है। जिस तरह से पहले एंटी इन्कम्बैंसी को एक फैक्टर माना जाता था और उसके आधार पर मतदान के प्रतिशत का आकलन होता था या नतीजों का अंदाजा लगाया जाता था उसी तरह से अब प्रो इन्कम्बैंसी को समझने की जरुरत है। इसे इन्कम्बैंसी एडवांटेज भी कहते हैं। यानी जो सत्ता में है उसको बहुत लाभ होता है। उसके पास सरकारी खजाना होता है, जिसे वह चुनाव में लुटा सकता है। उसके पास पूरी मशीनरी होती है, जिससे वह वेलफेयर स्कीम्स को डिलीवर कर सकता है। सो, वेलफेयर डिलीवरी और इन्कम्बैंसी एडवांटेज एक कॉमन फैक्टर है, जिसके आधार पर नतीजों का आकलन किया जा सकता है। इसके बाद हर राज्य के अपने अपने कुछ विशिष्ट गुण दोष हैं, जिनको इन दो चीजों के साथ जोड़ा जाएगा।

अगर वेलफेयर डिलीवरी और इन्कम्बैंसी एडवांटेज के हिसाब से देखें तो सभी राज्यों में सत्तारूढ़ दलों को इसका फायदा दिखेगा। जो सरकार में है वह किसी न किसी स्तर पर अपने प्रतिद्वंद्वी से बेहतर स्थिति में है। लेकिन राज्यवार देखेंगे तो हर राज्य के विशिष्ट गुणदोष को इसमें जोड़ना होगा। मिसाल के तौर पर पश्चिम बंगाल को देखते हैं। वहां ममता बनर्जी 15 साल से सत्ता में हैं तो उनके खिलाफ नाराजगी भी है तो सत्ता में होने का लाभ उठा कर उन्होंने जो कल्याणकारी योजनाएं शुरू की हैं और लोगों को लाभ पहुंचाया है उसका फायदा भी है। लेकिन वहां के चुनाव की खास बात ध्रुवीकरण है। बंगाल का चुनाव पूरी तरह से भाजपा और तृणमूल कांग्रेस के बीच लड़ा गया है। हो सकता है कि इस बार कांग्रेस और लेफ्ट को पहले जितने वोट भी न मिलें। दो पार्टियों के बीच के ध्रुवीकरण को भाजपा ने अपने फायदे के लिए इस्तेमाल किया और चुनाव जीतती दिख रही है।

तमिलनाडु में विपक्ष के अंदर बिखराव और दो से ज्यादा पार्टियों के मैदान में होने का लाभ सत्तारूढ़ डीएमके को मिला, जिसके पास पहले से इनकम्बैंसी एडवांडेज था। केरल में लेफ्ट पार्टियों को सरकार में होने का फायदा मिला है लेकिन उस फायदे के ऊपर 10 साल की एंटी इन्कम्बैंसी भारी पड़ी है। साथ ही भाजपा और केंद्र सरकार से मुख्यमंत्री विजयन की नजदीकी ने अल्पसंख्यक मतदाताओं में उनको अलोकप्रिय बनाया। उनकी पार्टी को इसका नुकसान हुआ है। असम में हिमंत बिस्वा सरमा ने सत्ता में होने का लाभ उठा कर कई काम किए। इसमें एक काम परिसीमन का है, जिसके जरिए चुनाव क्षेत्र का भौगोलिक और जनसंख्या संरचना को बदला गया। इसका लाभ भाजपा को मिला है। ऊपर से सांप्रदायिक ध्रुवीकरण ने उनका काम आसान कर दिया। सो, सिर्फ वोट प्रतिशत बढ़ने की बजाय दूसरे पहलुओं के जरिए ही किसी भी चुनाव के नतीजों की संभावना का आकलन किया जा सकता है।


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