बंगाल में कैसे जीती भाजपा?

Categorized as अजित द्विवेदी कालम

पश्चिम बंगाल की भौगोलिक और जनसंख्या संरचना को देख कर बहुत से राजनीतिक विश्लेषक और नेता भी यह मानते थे कि भारतीय जनता पार्टी को बहुत पहले पश्चिम बंगाल में चुनाव जीत जाना चाहिए था। पश्चिम बंगाल की सीमा बांग्लादेश से मिलती है, जहां से घुसपैठ होने और राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा पैदा होने का नैरेटिव बहुत दिनों से बनता रहा है। घुसपैठ के कारण और ऐतिहासिक रूप से मुस्लिम बहुलता की वजह से राज्य की जनसंख्या संरचना भाजपा के हिंदुत्व के नैरेटिव को सपोर्ट करती थी। इसके बावजूद भाजपा चुनाव नहीं जीत पाती थी। पिछले चुनाव में राष्ट्रवाद, राष्ट्रीय सुरक्षा और हिंदुत्व का नैरेटिव बनाने के बावजूद भाजपा जीत नहीं सकी थी। इस बार उसका नैरेटिव भी चल गया और उसका बारीक प्रबंधन भी कामयाब हो गया। भाजपा ने बंगाल का किला फतह कर लिया। ममता बनर्जी चुनाव हार कर सत्ता से बाहर हो गईं।

पश्चिम बंगाल में भाजपा को मिली बड़ी जीत का विश्लेषण कई पहलुओं से किया जा सकता है। लेकिन मोटे तौर पर तीन बातों को रेखांकित करने की जरुरत है। ये तीन बातें ही सबसे अहम हैं। पहला, भाजपा को यह संदेश बनवाना था कि वह चुनाव जीत रही है, जो कि उसने बनवा दिया। दूसरा, यह भरोसा दिलाना था कि इस बार चुनाव से पहले, चुनाव के दौरान और चुनाव के बाद कोई हिंसा नहीं होगी, यह भरोसा दिलाने में भी वह कामयाब हुई और तीसरा कि भाजपा व राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ का हिंदुत्व किसी भी रूप में पश्चिम बंगाल के हिंदुत्व से अलग नहीं होगा, यह मैसेज भी आम हिंदुओं तक पहुंच गया। इन तीन बातों को बहुत सारे फैक्टर में विभाजित करके देखा जा सकता है। लेकिन बुनियादी रूप से ये तीन बातें ही भाजपा की जीत को परिभाषित करती हैं।

असल में पश्चिम बंगाल में भाजपा की जीत के लिए जरूरी स्थितियां पहले से मौजूद थीं। राज्य में 27 फीसदी मुस्लिम आबादी थी, ममता बनर्जी की सरकार द्वारा मुस्लिम तुष्टिकरण के प्रत्यक्ष प्रमाण थे और बांग्लादेश से घुसपैठ व बढ़ती मुस्लिम आबादी से जनसंख्या संरचना बदलने का खतरा भी दिख रहा था। इन स्थितियों की मौजूदगी के बावजूद भाजपा नहीं जीत पा रही थी तो उसका कारण यह था कि हिंदुत्व को लेकर हिंदू समाज बंटा हुआ था और हिंदुओं के अंदर भय था। वे भरोसा नहीं कर पा रहे थे कि भाजपा चुनाव जीत रही है। इस बार भाजपा ने सबसे पहले भय को खत्म करने का प्रयास शुरू किया। इस काम में चुनाव आयोग ने बड़ी भूमिका निभाई।

सवाल है कि हिंदुओं को कैसे भरोसा होता कि भाजपा जीत रही है? इसके लिए सबसे पहले उन स्थितियों को बदलना था, जिनके आधार पर तृणमूल की जीत पक्की मानी जाती थी। वह काम मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर से शुरू हुआ। चुनाव आयोग ने मतदाता सूची की सफाई शुरू की। ऐसे मतदाता, जिनकी मृत्यु हो चुकी थी या जो स्थायी रूप से शिफ्ट हो गए थे या जिनके नाम एक से ज्यादा जगह पर दर्ज थे, उनके नाम मतदाता सूची से हटाया गया। बंगाल में यह माना जाता था कि ऐसे लोगों की सूची तृणमूल के पास होती थी और मतदान के दिन दोपहर के समय ऐसे तमाम लोगों के वोट डाल दिए जाते थे। इसे ‘छापा वोट’ कहा जाता था। जब ऐसे 63 लाख लोगों के नाम कटे तो हिंदुओं को भरोसा बना कि अब ‘छापा वोट’ नहीं होगा।

इसके बाद दूसरी स्थिति मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में एकतरफा वोट होने की थी। तार्किक विसंगति के नाम पर जब 27 लाख लोगों के नाम मतदाता सूची से हटे और यह खबर आई कि मुस्लिम बहुल मुर्शिदाबाद, मालदा, उत्तरी दिनाजपुर इलाकों में सबसे ज्यादा नाम रोके गए हैं तो उससे भी धारणा प्रभावित हुई। भाजपा ने दावा किया कि तृणमूल के फर्जी मतदाताओं के नाम हटा दिए गए हैं।

इस तरह हिंदुओं को भाजपा की जीत का भरोसा दिलाने के बाद उनको यह यकीन दिलाने की जरुरत थी कि हिंसा नहीं होगी। इसके लिए चुनाव आयोग ने अभूतपूर्व तरीके से ढाई लाख केंद्रीय अर्धसैनिक बल तैनात किए। चुनाव आयोग ने खुद सोशल मीडिया में तृणमूल कांग्रेस का नाम लेकर लिखा कि इस बार भय मुक्त, हिंसा मुक्त चुनाव होगा। आयोग ने यह भी कहा कि सोर्स जैमिंग और बूथ जैमिंग नहीं हो पाएगी।

यानी लोगों को घरों से निकल कर वोट देने से नहीं रोका जा सकेगा और उन्हें बूथ पर भी नहीं रोका जा सकेगा। केंद्रीय बलों की तैनाती, केंद्रीय पर्यवेक्षकों की तैनाती, सुपरवाइजर की नियुक्ति और इन सबको देख कर तृणमूल कांग्रेस की बौखलाहट ने हिंदुओं को सुरक्षा का भरोसा दिलाया। सुरक्षा का यह भाव मतदान प्रतिशत में दिखाई दिया। मतदान प्रतिशत 92 से ऊपर जाने के पीछे एक कारण एसआईआर था लेकिन उसके अलावा पिछली बार के मुकाबले 31 लाख ज्यादा लोगों ने इस बार मतदान किया।

इसके बाद बारी थी भाजपा और पश्चिम बंगाल का हिंदुत्व अलग अलग होने की धारणा को बदलने की। भाजपा ने इसके लिए गंभीर प्रयास किए। उसके नेता मछली हाथ में लेकर प्रचार करने उतरे। उसके नेताओं ने सार्वजनिक रूप से मांस, मछली खाकर दिखाया। यह संदेश दिया कि तृणमूल कांग्रेस की ओर से भाषा, संस्कृति और धर्म को लेकर जो भय दिखाया जा रहा है वह झूठ है। इसका असर भी हिंदुओं पर हुआ। इसके लिए भाजपा ने इस बार अपने तमाम बाहरी और हिंदी भाषी नेताओं को परदे के पीछे रखा। संगठन प्रभारी और चुनाव प्रभारी ने इस बार प्रचार नहीं किया, बल्कि परदे के पीछे रह कर काम किया। इससे ममता बनर्जी को बाहरी और भीतरी का नैरेटिव बनाने का भी मौका नहीं मिला।

ध्यान रहे पश्चिम बंगाल में हिंदू अल्पसंख्यक हो जाएगा, मुस्लिम घुसपैठिए बढ़ कर सारे संसाधनों पर कब्जा कर लेंगे, ममता बनर्जी मुसलमानों का तुष्टिकरण करती हैं ये सारे नैरेटिव पहले से थे। लोग इससे प्रभावित होकर भाजपा को वोट कर रहे थे। पिछले दो लोकसभा और एक विधानसभा चुनाव में भाजपा को औसतन 40 फीसदी वोट मिला। यह पूरा का पूरा वोट हिंदुओं का था। उसे इस वोट में 10 फीसदी और हिंदू वोट जोड़ना था। जैसे ही उसने जीत की धारणा बनवाई और हिंसा नहीं होने का भरोसा दिलाया वैसे ही उसका पहले से मौजूद हिंदुत्व का नैरेटिव चुनाव जिताने वाला बन गया और भाजपा से दूरी रखने वाले हिंदुओं का बड़ा समूह भी उसके साथ आ गया। इसमें सबसे बड़ा हिस्सा भद्रलोक का था, जो भाषा और संस्कृति के नाम पर भाजपा से दूरी रखता था।

इसके बाद कई औऱ फैक्टर जोड़े जा सकते हैं, जिसने इस नैरेटिव को कामयाब बनाने में भूमिका निभाई। जैसे भाजपा ने जमीनी स्तर पर बहुत अच्छा प्रबंधन किया। अलग अलग जातियों, धर्मों और क्षेत्र के लोगों को बंगाल भेजा गया, जिन्होंने वहां जमीनी स्तर पर काम किया। सिख समुदाय के नेता भेजे गए तो राजस्थान व गुजरात के नेता भी भेजे गए। बिहार के नेताओं को ऐसे इलाकों में लगाया गया, जहां प्रवासी बिहारी वोट ज्यादा थे।

ऐसे ही बंगाल के बाहर काम करने वाले लोगों को लाने की व्यवस्था की गई। सभी सीटों पर ताकत लगाने की बजाय जीत सकने वाली सीटों को चुना गया। हालांकि ऐसे माइक्रो मैनेजमेंट ममता बनर्जी की पार्टी ने भी किया लेकिन इस तरह का प्रबंधन तभी काम करता है, जब आपका सेंट्रल नैरेटिव काम कर रहा हो। इस बार भाजपा ने हिंदुत्व और सनातन को बचाने का जो सेंट्रल नैरेटिव सेट किया वह चल गया तो उसकी बाकी सारी चीजें भी असरदार हो गईं।


Previous News Next News

More News

नंदीग्राम से कांग्रेस प्रत्याशी ने खटखटाया हाईकोर्ट का दरवाजा

September 21, 2026

पश्चिम बंगाल में नंदीग्राम से कांग्रेस प्रत्याशी मिलन प्रधान ने 2007 के नंदीग्राम हिंसा से जुड़े पांच और मामलों में गिरफ्तारी की आशंका जताते हुए कलकत्ता उच्च न्यायालय का रुख किया है। श्री प्रधान फिलहाल जेल में बंद हैं। प्रधान के अधिवक्ता अयान भट्टाचार्य ने सोमवार सुबह न्यायमूर्ति सौगत भट्टाचार्य की अदालत में मामले का…

केरल में भारी बारिश से भूस्खलन और अचानक बाढ़ से छह लोगों की मौत, चार लापता

September 21, 2026

केरल में भारी बारिश के कारण भूस्खलन और अचानक बाढ़ जैसी घटनाओं में छह लोगों की मौत हो गई और चार अन्य लापता हो गए। राज्य के कई हिस्सों, खासकर इडुक्की, कोट्टायम और मलप्पुरम जिलों के पहाड़ी इलाकों में भारी बारिश हुई। इडुक्की जिले के वट्टावडा में भूस्खलन से दो लोगों की मौत हो गई,…

वोट के लालच में गिरगिट की तरह रंग बदल रही है सपा: मायावती

September 21, 2026

बहुजन समाज पार्टी (बसपा) अध्यक्ष मायावती ने सोमवार को तंज कसते हुये कहा कि समाजवादी पार्टी (सपा) ने प्रचारित ‘पीडीए रथ’ में अपने लाल रंग का कम और आरएसएस/भाजपा के ‘भगवा’ रंग का ज्यादा इस्तेमाल किया है। सुश्री मायावती ने एक्स पर लिखा यूपी के आगामी विधानसभा आमचुनाव की तैयारी के लिये सपा प्रमुख का…

ट्रंप ने ईरान को लेकर विकल्पों पर विचार किया, पूछा, ‘पूरे देश को कब तबाह कर दूं?’

September 21, 2026

अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा है कि वह ईरान के साथ जारी संघर्ष को लेकर कई विकल्पों पर विचार कर रहे हैं, जिसमें ईरान पर बड़े हमले का विकल्प भी शामिल है। उन्होंने सवाल किया, “मैं पूरे देश को कब तबाह कर दूं?” ईरान को एक नई चेतावनी देते हुए श्री ट्रंप ने…

कांग्रेस अपने कारणों से हारी है

September 21, 2026

बहुत आदर्श स्थितियों के बावजूद दिल्ली यूनिवर्सिटी स्टूडेंट यूनियन यानी डूसू का चुनाव कांग्रेस हार गई। कांग्रेस के छात्र संगठन एनएसयूआई को सेंट्रल पैनल की चार में से एक भी सीट नहीं मिली। पिछले साल के चुनाव में एनएसयूआई ने एक सीट जीती थी और उससे पहले दो सीटें मिली थीं। यानी दो से एक…

logo