इसके बावजूद नहीं बदलेंगे केजरीवाल

Categorized as अजित द्विवेदी कालम

अरविंद केजरीवाल क्या अब सबक लेंगे? संदेह है। उनको लग रहा है कि विचारधारा विहीन जो राजनीति उन्होंने शुरू की है उसमें नुकसान कम हैं और कामयाबी ज्यादा है। अगर कोई उनको समझाना चाहे तो वे बड़े सहज अंदाज में कह सकते हैं कि अपने रास्ते पर चल कर दो राज्यों में उन्होंने सरकार बनाई। इसके अलावा दो राज्यों में इतना वोट हासिल किया कि उनकी पार्टी रिकॉर्ड समय में राष्ट्रीय पार्टी बन गई। इसलिए वे क्यों किसी से कुछ सीखें या क्यों अपना रास्ता बदलें! बात ठीक भी है। अपनी तरह की राजनीति करके वे दिल्ली में तीन बार मुख्यमंत्री बने। पंजाब में प्रचंड बहुमत की सरकार बनाई। गुजरात में पार्टी का वोट प्रतिशत दहाई में रहा। गोवा में भी अच्छा खासा वोट मिला। उन्होंने गोवा में कांग्रेस को जीतने नहीं दिया और गुजरात में उसको मुख्य विपक्षी पार्टी नहीं बनने दिया। इसलिए वे मानते रहेंगे कि उनकी राजनीति बिल्कुल ठीक है।

उनके सात राज्यसभा सांसद पार्टी छोड़ कर चले गए। लेकिन केजरीवाल को कोई फर्क पड़ता नहीं दिख रहा है। वे इसका भी भारतीय जनता पार्टी के खिलाफ अपना नैरेटिव बनाने के लिए इस्तेमाल कर रहे हैं। वे पिछले कई सालों से कहते आ रहे हैं कि भाजपा उनकी पार्टी के नेताओं को तोड़ने के लिए ऑपरेशन लोटस चला रही है। दिल्ली के उनके विधायकों ने आगे आकर 20-20 करोड़ रुपए का ऑफर दिए जाने की बात कही थी। हालांकि किसी ने कोई सबूत नहीं पेश किया। यह तक नहीं बताया कि विधायकों को फोन करके ऑफर देने वाला भाजपा का नेता कौन था। लेकिन केजरीवाल इस लोकप्रिय धारणा को मजबूत बनाते रहे कि भाजपा उनकी पार्टी को तोड़ने के लिए ऑपरेशन लोटस चलाती रहती है क्योंकि उसको आम आदमी पार्टी से खतरा लगता है। सो, पंजाब के छह राज्यसभा सांसद और दिल्ली की स्वाति मालीवाल के भाजपा में जाने की घटना को उन्होंने अपने इसी नैरेटिव का हिस्सा मान कर उस पर भाजपा को निशाने पर लिया है।

इसके बहाने अरविंद केजरीवाल यह धारणा बना रहे हैं कि पंजाब में भाजपा उनको कमजोर करना चाहती है। ध्यान रहे पंजाब में अरविंद केजरीवाल की पार्टी का मुकाबला कांग्रेस से होगा। कांग्रेस के अलावा अकाली दल अब भी एक बड़ी ताकत है। इन दो के अलावा अमृतपाल सिंह और सरबजीत सिंह खालसा की पार्टी वारिस पंजाब दे भी एक ताकत के तौर पर उभरी है। लेकिन भाजपा पंजाब में कोई ताकत नहीं है। अकाली दल से अलग होने के बाद लोकसभा और विधानसभा दोनों चुनावों में भाजपा का प्रदर्शन बहुत खराब हुआ। वह लोकसभा में शून्य पर आ गई। हालांकि प्रयोग बहुत किए। कैप्टेन अमरिंदर सिंह और सुनील जाखड़ को पार्टी में लाकर भी एक बड़ा प्रयोग किया था। लेकिन वह प्रयोग भी फेल हो गया। आम आदमी पार्टी के सात राज्यसभा सांसदों को तोड़ना भी एक प्रयोग है। राज्यसभा में इससे भाजपा के सांसदों की संख्या 113 हो गई है लेकिन असली प्रयोग पंजाब के लिए है। वह अकेले लड़ कर पंजाब के हिंदू वोटों की राजनीति कर सकती है। इसमें राघव का चेहरा कितना काम आएगा यह नहीं कहा जा सकता है।

एक तरफ भाजपा अपना प्रयोग कर रही है तो दूसरी ओर उसका नैरेटिव केजरीवाल यह बना रहे हैं कि भाजपा उनकी पार्टी को इसलिए कमजोर करना चाहती है क्योंकि भाजपा के लिए असली चुनौती आम आदमी पार्टी है। यह राष्ट्रीय राजनीति का नैरेटिव है। केजरीवाल हमेशा यह मानते रहे हैं कि उनके साथ जुड़ने वाला नेता चाहे वह कितना भी बड़ा क्यों न हो, वह उनकी राजनीतिक महत्वाकांक्षा को पूरा करने का टूल भर है। केजरीवाल यह भी मानते हैं कि उन्हें किसी की जरुरत नहीं है या कोई नेता ऐसा नहीं हो सकता है, जो इतना उपयोगी हो कि उसके जाने से आम आदमी पार्टी की राजनीति कमजोर होती हो। वे हमेशा यह मानते हैं कि अपने व्यक्तित्व, नैरेटिव खड़ा करने की उनकी क्षमता और जोखिम लेकर टकराव करने की राजनीति के कारण वे आगे बढ़े हैं। इस काम में बाकी सब सहायक की भूमिका में हैं। इसका अर्थ है कि वे जब चाहें तब शून्य से नया नैरेटिव खड़ा कर सकते हैं और उसके दम पर सफल चुनावी राजनीति कर सकते हैं।

केजरीवाल के लिए जिस तरह से अन्ना हजारे, योगेंद्र यादव, प्रशांत किशोर, कुमार विश्वास, प्रोफेसर आनंद कुमार, अजित झा आदि वैचारिक रूप से प्रतिबद्ध लोग सहायक टूल थे वैसे ही एनडी गुप्ता, सुशील गुप्ता, अशोक मित्तल, संजीव अरोड़ा, राजेंद्र गुप्ता, विक्रमजीत सिंह साहनी जैसे अरबपति भी उनके सहायक टूल हैं। जैसे वैचारिक रूप से प्रतिबद्ध और पार्टी की स्थापना के समय से जुड़े लोगों के जाने से कोई फर्क नहीं पड़ा वैसे ही अरबपतियों के जाने से भी कोई फर्क नहीं पड़ेगा। सोचें, इस बात के लिए केजरीवाल की कितनी आलोचना हुई है कि वे ऐसे लोगों को राज्यसभा भेजते हैं, जिनका पार्टी से कोई जुड़ाव नहीं रहा और जो अरबपति हैं। लेकिन क्या केजरीवाल पर कोई फर्क पड़ा?

आम आदमी की पार्टी होने का दम भरने वाले केजरीवाल जब अरबपतियों को राज्यसभा भेजते हैं तो इसकी खूब आलोचना होती है। लेकिन उन पर इसका कोई असर नहीं होता है। वे इसे दोहराते भी हें। जैसे उन्होंने एक अरबपति संजीव अरोड़ा को राज्यसभा भेजा। फिर उनको राज्यसभा से हटा कर विधानसभा का उपचुनाव लड़ाया और पंजाब सरकार में मंत्री बना दिया। तब कहा जा रहा था कि संजीव अरोड़ा की सीट पर खुद राज्यसभा जाएंगे। लेकिन उस सीट के लिए केजरीवाल एक दूसरे अरबपति को खोज कर ले आए। उन्होंने राजेंद्र गुप्ता को राज्यसभा भेजा। इसका अर्थ है कि केजरीवाल यह सब जान बूझकर और एक योजना के तहत करते हैं। इसलिए आगे भी वे ऐसी ही राजनीति करेंगे। उन्होंने अब न्यायपालिका से टकराव का नया मोर्चा खोल दिया है।

वे दिल्ली हाई कोर्ट में जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा की बेंच से शराब नीति से जुड़े कथित घोटाले का केस हटवाने के लिए अब सत्याग्रह कर रहे हैं। पहले इसके लिए दलीलें दीं और हलफनामा देकर हितों के टकराव का मुद्दा बनाया। जब उसमें कामयाबी नहीं मिली तो महात्मा गांधी की समाधि पर जाकर सत्याग्रह किया। वे अब सत्याग्रह के प्रतीक को एक नए स्तर पर ले जा रहे हैं। वे केंद्र की सरकार और मौजूदा पूरी व्यवस्था को अंग्रेजों के जमाने जैसी व्यवस्था बताने में लगे हैं। पता नहीं उनको इसमें कितनी कामयाबी मिलेगी लेकिन इतना तय है कि वे दूसरी पार्टियों की तरह पारंपरिक राजनीति नहीं करने वाले हैं। अपने को लेकर आत्ममुग्धता हर नेता में किसी न किसी स्तर तक होती है लेकिन केजरीवाल उसका चरम रूप हैं। इसलिए कोई आए जाए उन पर कोई फर्क नहीं पड़ने वाला है। वे अपनी राजनीति नहीं बदलने वाले हैं।


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