अवसरवाद का ओवरडोज हो रहा है

Categorized as अजित द्विवेदी कालम

भारतीय जनता पार्टी ने आजादी के बाद से बनी परंपराओं और स्थापित मान्यताओं से हट कर जो राजनीति की उसे समय की जरुरत के आधार पर न्यायसंगत ठहराया गया। भाजपा ने खुद यह नैरेटिव स्थापित किया कि आजादी के बाद देश में कुछ भी अच्छा नहीं हुआ है और सब चीजों को ठीक करने के लिए कुछ ऐसे कदम उठाने होंगे, जिनको पारंपरिक राजनीति में अच्छा नहीं माना जाता है। देश के लोगों ने इस बात को काफी हद तक स्वीकार भी किया और भाजपा का साथ दिया। तभी भाजपा लगातार तीन चुनाव जीत कर केंद्र में सरकार बनाने में कामयाब हुई।

लेकिन अब ऐसा लग रहा है कि एक निश्चित उद्देश्य के लिए जिन अपारंपरिक उपायों को आजमाने की शुरुआत हुई थी और जो सामान्य राजनीतिक नैतिकता व लोक लिहाज के प्रतिकूल थीं, उनको मुख्यधारा मान लिया गया है और भाजपा उसका आनंद लेने लगी है। यह वैसा ही जैसे किसी खास परिस्थिति में किसी के व्यभिचार की अनदेखी कर दी जाए या अपवाद मान कर स्वीकार कर लिया जाए तो वह फिर उस व्यभिचार में आनंद लेने लगे।

ऐसे बहुत से मामले हैं लेकिन अभी सिर्फ आम आदमी पार्टी के सात राज्यसभा सांसदों के अलग होने और भाजपा में शामिल होने के बहाने अलग अलग पार्टियों के नेताओं के भाजपा में शामिल होने के घटनाक्रम पर विचार करते हैं। 2014 में केंद्र में सरकार बनाने से पहले इस तरह की घटनाएं अपवाद के तौर पर होती थीं। गाहेबगाहे नेता पार्टी छोड़ कर दूसरी पार्टी में जाते थे। लेकिन पार्टी बदलने वाले नेताओं को अच्छी निगाह से नहीं देखा जाता था। जनता उनकी आलोचना करती थी। पीठ पीछे उनका मजाक उड़ाया जाता था। दलबदल करने वाले नेता बदनाम होते थे और राजनीतिक उपयोगिता के बावजूद उनको नैतिकता की कसौटी पर कसा जाता था। आयाराम-गयाराम की मिसाल बनती थी। भजनलाल कितने भी कामयाब हुए लेकिन उनको बहुत सम्मान कभी नहीं मिला।

पार्टियां तब भी टूटती थीं लेकिन वह विचारधारा के टकराव का मसला होता था। कांग्रेस टूटी हो या समाजवादी राजनीति करने वाली पार्टियां टूटीं या देश की सबसे बड़ी साम्यवादी पार्टी का विभाजन हुआ वह सब देश ने देखा। लेकिन उनकी खास बात यह थी कि किसी बाहरी ताकत ने उसको इंजीनियर नहीं किया। उस समय दलबदल की परिघटना बिल्कुल अलग थी। कांग्रेस जिस समय सर्वशक्तिशाली थी उस समय भी लोग कांग्रेस छोड़ कर जाते थे। एकाध अपवादों को छोड़ दें तो दूसरी पार्टियों के नेताओं को तोड़ कर कांग्रेस में नहीं शामिल कराया जाता था। भाजपा के साथ भी ऐसा ही होता था। नेता भाजपा छोड़ कर जाते थे। शंकर सिंह वाघेला, केशुभाई पटेल से लेकर उमा भारती, बाबूलाल मरांडी, कल्याण सिंह, बीएस येदियुरप्पा जैसी अनेक मिसालें हैं। सब वापस भी लौट आए। लेकिन ऐसा अभियान कभी नहीं चला कि हर पार्टी के जैसे तैसे नेता को भी भाजपा में ले लाओ।

आजादी से पहले संभवतः 1946 में समाजवादी विचार के नेताओं ने कांग्रेस छोड़ी थी। जयप्रकाश नारायण सहित कम से कम छह बड़े समाजवादी नेताओं ने कांग्रेस छोड़ी। उस समय जो निर्वाचित सदस्य थे उन्होंने अपने पद से भी इस्तीफा दिया। अस्सी के दशक की एक बड़ी मिसाल हेमवंती नंदन बहुगुणा की है, जिन्होंने इंदिरा और संजय गांधी के बेहद ताकतवर रहते कांग्रेस छोड़ी और कांग्रेस छोड़ने के साथ ही लोकसभा सीट से भी इस्तीफा दिया। पौड़ी गढ़वाल की उनकी सीट पर उप चुनाव में कांग्रेस ने पूरी ताकत लगाई इसके बावजूद बहुगुणा चुनाव जीते। उस समय राजनीतिक नैतिकता बची हुई थी और नेता विचारधारा के आधार पर पार्टी बदलते या नई पार्टी बनाते थे। चंद्रशेखर, रामधन, मोहन धारिया ने सर्वोच्च नेता से टकराव के बाद कांग्रेस छोड़ी। लेकिन अब ऐसा लग रहा है कि राजनीतिक नैतिकता और विचारधारा पूरी तरह से समाप्त हो गई है। सत्ता के लालच में हर पार्टी का नेता भाजपा में जाना चाहता है और भाजपा उसको शामिल भी कर रही है। कई बार तो ऐसा होता है कि दूसरी पार्टी के नेताओं को भाजपा में शामिल होने के लिए मजबूर किया जाता है।

ऐसा लग रहा है कि भाजपा अब सिर्फ रणनीतिक जरुरत से या किसी मजबूरी में दूसरी पार्टियों में तोड़ फोड़ नहीं कर रही है, बल्कि उसे ऐसा करने में मजा आ रहा है। वह अपनी खुशी के लिए, मजा लेने के लिए पार्टियों में विभाजन करा रही है, नेताओं को तोड़ रही है। यह भी कह सकते हैं कि उसे विपक्षी पार्टियों को तकलीफ देने में मजा आ रहा है। यानी वह परपीड़ा सुख ले रही है। अन्यथा सोचें, आम आदमी पार्टी के राज्यसभा सांसदों को तोड़ कर अपनी पार्टी में मिलाने की क्या आवश्यकता है? ऐसा नहीं है कि भाजपा को राज्यसभा में इनके समर्थन की जरुरत है या इनके समर्थन नहीं करने से उसे कामकाज में समस्या आ रही है। ऐसा भी नहीं है कि इनके आने से पंजाब में भाजपा को कुछ हासिल हो जाएगा। भाजपा नेतृत्व के हर उलटे सीधे काम को मास्टरस्ट्रोक बताने वाले इसे किसी दूरगामी रणनीति का हिस्सा बता रहे हैं। हालांकि उनको खुद पता नहीं है कि वह रणनीति क्या है। अगर ऐसे लोगों की बात छोड़ दें तो कोई तार्किक कारण समझ में नहीं आता है। सिवाए इसके कि इसके जरिए यह माहौल बनाया गया है कि पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी की पार्टी भी ऐसे ही टूटेगी।

बहरहाल, भाजपा ने अजित पवार की पार्टी को साथ लिया तो कहा गया कि मराठा वोट के लिए यह जरूरी था। सोचें, उनके खिलाफ 70 हजार करोड़ रुपए के सिंचाई घोटाले का आरोप लगा था और भाजपा के शीर्ष नेताओं ने जनता के सामने संकल्प किया था कि उनके जेल भेजेंगे, जहां वे चक्की पीसेंगे। लेकिन भाजपा द्वारा भ्रष्ट ठहराए गए अजित पवार पूरे परिवार के साथ भाजपा के साथ आ गए। एक एक करके परिवार के हर सदस्य को भ्रष्टाचार के मामले में क्लीन चिट भी मिल गई। ऐसे नेताओं की लंबी सूची है, जिनके ऊपर भाजपा ने भ्रष्टाचार के आरोप लगाए और उन्हें फिर अपनी पार्टी में शामिल करा कर केंद्रीय एजेंसियों से क्लीन चिट दिलाई। इसका राजनीतिक लाभ भी भाजपा को हुआ। भले उसके ऊपर भ्रष्ट नेताओं के क्लीन चिट देने की वॉशिंग मशीन बन जाने का आरोप लगा।

लेकिन अब भाजपा सिर्फ जरुरत के लिए नेताओं को नहीं तोड़ रही है। अन्यथा कोई बताए कि पंजाब के कारोबारी अशोक मित्तल को भाजपा में शामिल कराने की क्या जरुरत है? उनके ऊपर केंद्रीय एजेंसी ईडी ने धनशोधन के आरोप लगाए और छापा मारा, जिसके 10 दिन के बाद ही वे भाजपा में शामिल हो गए। यह भाजपा का दुस्साहस है। वह समझ रही है कि जनता को कोई फर्क नहीं पड़ता कि जिसको चोर, बेईमान, भ्रष्ट कहा और फिर उसी को पार्टी में शामिल कराया। वह समझ रही है कि जिसको चोर, बेईमान और भ्रष्ट कहा उसको कमल का फूल पकड़ा कर चुनाव में भेजेंगे तो उसकी जीत पक्की हो जाएगी। हो सकता है कि अभी ऐसा हो जाता हो। लेकिन भाजपा को हो रहे फायदे के मुकाबले इसका नुकसान बहुत ज्यादा है। वह नुकसान खुद भाजपा को है और पूरे देश की राजनीति व समाज को भी है।

भाजपा ने अपने ही द्वारा भ्रष्ट ब्रांड किए गए इतने नेताओं को अपनी पार्टी में शामिल करा लिया है कि भ्रष्टाचार की बात अप्रासंगिक हो गई है। सोचें, इस देश में भ्रष्टाचार एक ऐसा बड़ा मुद्दा है, जिस पर सरकारें बदलती रही हैं। 1989 में बोफोर्स सौदे में भ्रष्टाचार के मुद्दे पर सरकार बदली तो 1996 में नरसिंह राव सरकार पर लगे भ्रष्टाचार के आरोपों ने नतीजों को प्रभावित किया तो 2014 में संचार, कोयला आदि घोटालों ने सरकार बदली।

लेकिन पिछले 12 साल में भाजपा ने अपनी राजनीति से यह स्थापित कर दिया कि आगे कभी भी भ्रष्टाचार के मसले पर सरकार नहीं बदलेगी। दूसरे मुद्दे होंगे, जिन पर सरकार बदलेगी। लेकिन भ्रष्टाचार कोई मुद्दा नहीं होगा। भाजपा को यह श्रेय जाता है कि उसने राजनीति से ईमानदारी, शुचिता, विचारधारा आदि सबको समाप्त कर दिया। राजनीति और खास कर चुनावी राजनीति में जो उपयोगी है वह कुछ भी करे तो उसके लिए भाजपा ने उच्च पद आरक्षित कर दिया है। भ्रष्टाचार, दलबदल और चुनाव जीतने के लिए साम, दाम, दंड और भेद के उपायों को भाजपा ने इस तरह से मेनस्ट्रीम कर दिया है कि राजनीति पूरी तरह से बदल गई है। अब या तो कोई इससे ज्यादा अनैतिकता करने वाली राजनीतिक ताकत उभरे तो भाजपा से मुकाबला होगा या फिर बिल्कुल कंट्रास्ट खड़ा हो, जैसे दुनिया के सबसे ताकतवर साम्राज्य के सामने गांधी खड़े हुए थे, तब भाजपा को चुनौती मिलेगी।


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