‘मां-बहन’: रिश्तों की गालियों से गरिमा तक की सिनेमाई यात्रा

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यहां स्त्री-विमर्श है, लेकिन नारेबाज़ी नहीं। यहां सामाजिक टिप्पणी है, लेकिन उपदेश नहीं। यहाँ संवेदनशीलता है, लेकिन भावुकता का अतिरेक नहीं। तकनीकी पक्ष की बात करें तो फ़िल्म का कैमरा वर्क कहानी के स्वभाव के अनुरूप है। चमक-दमक से दूर, वास्तविक जीवन के करीब। फ्रेम्स में एक तरह की घरेलू घुटन भी है और आत्मीयता भी।

हिंदी भाषा में कुछ शब्द ऐसे हैं, जो अपने शाब्दिक अर्थ से कहीं अधिक सामाजिक और सांस्कृतिक अर्थ लेकर चलते हैं। ‘मां-बहन’ उन्हीं शब्दों में से एक है। रोज़मर्रा की बातचीत में यह अक्सर गाली का हिस्सा बन जाता है, लेकिन जब यही शब्द एक फ़िल्म के शीर्षक में सामने आता है तो दर्शक चौंकता भी है और उत्सुक भी हो जाता है। शायद यही उत्सुकता निर्देशक सुरेश त्रिवेणी की सबसे बड़ी जीत है कि वे हमें एक ऐसे शीर्षक के बहाने रिश्तों, समाज और स्त्री-अस्तित्व की परतों में ले जाते हैं, जिन पर हम अक्सर बात तो करते हैं, लेकिन गंभीरता से सोचते कम हैं। आज के ‘सिने-सोहबत’ में ताज़ा तरीन फ़िल्म ‘मां-बहन’ पर चर्चा करते हैं।

‘तुम्हारी सुलु’, ‘जलसा’ और ‘सूबेदार’ जैसी फ़िल्मों से ख़ुद को बख़ूबी साबित कर चुके सुरेश त्रिवेणी उन फ़िल्मकारों में हैं जो असाधारण कहानियां खोजने के बजाय साधारण जीवन की असाधारण जटिलताओं को कैमरे के सामने रखते हैं। ‘मां-बहन’ में भी उनका यही अंदाज़ दिखाई देता है। यह फ़िल्म किसी बड़े सामाजिक भाषण की तरह नहीं चलती, बल्कि धीरे-धीरे आपके भीतर उतरती है। मुस्कुराती है, चुभती है, सवाल करती है और कई बार आईना भी दिखाती है।

फ़िल्म की सबसे बड़ी खूबी इसकी शैली है। इसे एक डार्क कॉमेडी कहा जा रहा है, लेकिन यह सिर्फ़ हंसाने वाली फ़िल्म नहीं है। यहां हास्य जीवन की विडंबनाओं से पैदा होता है। ऐसे क्षण आते हैं जब दर्शक हंस रहा होता है और अगले ही पल उसे एहसास होता है कि वह जिस बात पर हंसा है, वह दरअसल बेहद गंभीर है। यही संतुलन फ़िल्म को ख़ास बनाता है।

अगर कहानी और जॉनर की बात करें तो ‘मां बहन’ एक डार्क कॉमेडी-थ्रिलर है जो एक ऐसी मां और उसकी दो बेटियों की कहानी कहती है, जिनके रिश्तों में पहले से ही खटास, गलतफहमियां और दूरी मौजूद है। लेकिन एक रात अचानक घटित हुई एक रहस्यमयी घटना उन्हें फिर से एक साथ खड़ा होने पर मजबूर कर देती है। जैसे-जैसे वे इस मुश्किल स्थिति से निकलने की कोशिश करती हैं, पड़ोस, समाज और लोगों की बनाई हुई धारणाएं भी कहानी का हिस्सा बन जाती हैं। हास्य, सस्पेंस और सामाजिक व्यंग्य के मिश्रण के साथ फिल्म केवल एक रहस्य नहीं सुलझाती, बल्कि उन महिलाओं की कहानी भी कहती है जिन्हें समाज हमेशा अपने तयशुदा चश्मे से देखने का आदी रहा है।

माधुरी दीक्षित इस फ़िल्म की आत्मा हैं। पिछले कुछ वर्षों में उन्होंने चुनिंदा काम किए हैं, लेकिन ‘मां-बहन’ उनके करियर के उन पड़ावों में गिनी जाएगी जहां एक सितारा नहीं, बल्कि एक परिपक्व अभिनेत्री दिखाई देती है। उनके चेहरे की मुस्कान, आंखों की थकान और संवादों के बीच की खामोशी, सब मिलकर एक ऐसा किरदार रचते हैं जो लंबे समय तक याद रहता है। कई दृश्यों में वे बिना किसी बड़े नाटकीय प्रदर्शन के सिर्फ़ अपनी मौजूदगी से दृश्य पर अधिकार जमा लेती हैं। यही कारण है कि रिलीज़ के बाद उनके अभिनय की व्यापक सराहना हो रही है।

तृप्ति डिमरी इस फ़िल्म में नई पीढ़ी की आवाज़ बनकर सामने आती हैं। उनके किरदार में महत्वाकांक्षा है, बेचैनी है, सवाल हैं और अपने लिए जगह बनाने की ज़िद भी। माधुरी और तृप्ति के बीच के दृश्य फ़िल्म की सबसे बड़ी ताकत हैं। दोनों अलग पीढ़ियों का प्रतिनिधित्व करती हैं, लेकिन फ़िल्म इन्हें संघर्ष के बजाय संवाद में बदल देती है। यही संवाद फ़िल्म को समकालीन बनाता है।

इस फ़िल्म में रवि किशन, अरुणोदय सिंह, गीतांजलि कुलकर्णी और शार्दुल भारद्वाज के अलावा जिस नए कलाकार ने अपने कमाल के प्रदर्शन से सबको चकित किया है वह है धरना दुर्गा। धरना दुर्गा की पृष्ठभूमि कॉन्टेंट क्रिएटर की रही है और इस फ़िल्म के लिए उनका चयन संभवतः सोशल मीडिया पर उनके निरंतर और उम्दा प्रदर्शन के लिए हुआ होगा। शुक्र है कि सोशल मीडिया कई नई प्रतिभाओं को सिनेमा में मौक़ा मिल पाने का एक सक्रिय प्लेटफॉर्म भी बनता जा रहा है।

सुरेश त्रिवेणी का निर्देशन हमेशा मानवीय रहा है। वे अपने पात्रों को जज नहीं करते। वे उन्हें समझने की कोशिश करते हैं। ‘मां-बहन’ में भी वे किसी को खलनायक या नायक बनाने की जल्दी में नहीं दिखते। उनके पात्र कमज़ोरियां रखते हैं, गलतियां करते हैं और कई बार दर्शक को असहज भी करते हैं। लेकिन शायद जीवन भी तो ऐसा ही है। इसीलिए फ़िल्म कृत्रिम नहीं लगती।

फ़िल्म का लेखन उल्लेखनीय है। कई संवाद ऐसे हैं जो फ़िल्म के बाद भी साथ चलते हैं। खास बात यह है कि फ़िल्म अपने विचारों को भाषणों में नहीं बदलती। यहां स्त्री-विमर्श है, लेकिन नारेबाज़ी नहीं। यहां सामाजिक टिप्पणी है, लेकिन उपदेश नहीं। यहाँ संवेदनशीलता है, लेकिन भावुकता का अतिरेक नहीं।

तकनीकी पक्ष की बात करें तो फ़िल्म का कैमरा वर्क कहानी के स्वभाव के अनुरूप है। चमक-दमक से दूर, वास्तविक जीवन के करीब। फ्रेम्स में एक तरह की घरेलू घुटन भी है और आत्मीयता भी। कई बार कैमरा पात्रों के इतना करीब आ जाता है कि दर्शक खुद को उस बातचीत का हिस्सा महसूस करने लगता है।

बैकग्राउंड म्यूज़िक भी उल्लेखनीय है। आज के दौर में जहां कई फ़िल्में संगीत के जरिए भावनाएं थोपने लगती हैं, वहां ‘मां-बहन’ संयम बरतती है। संगीत कहानी को सहारा देता है, उस पर हावी नहीं होता। कई दृश्य अपनी खामोशी की वजह से अधिक प्रभावशाली बन जाते हैं।

फ़िल्म की एडिटिंग भी सराहनीय है। कहानी अपने समय से चलती है। कहीं-कहीं इसकी धीमी गति कुछ दर्शकों को चुनौतीपूर्ण लग सकती है, लेकिन यही ठहराव पात्रों को विकसित होने का अवसर देता है। यह कोई ऐसी फ़िल्म नहीं जो हर पांच मिनट में चौंकाने की कोशिश करे। यह धीरे-धीरे अपने अर्थ खोलती है।

अगर कोई कमी तलाशनी हो तो कहा जा सकता है कि कुछ स्थानों पर फ़िल्म अपने विचारों को और अधिक धार दे सकती थी। कुछ उपकथाएं ऐसी लगती हैं जिन्हें थोड़ा और विस्तार मिलता तो प्रभाव बढ़ जाता लेकिन ये कमियां फ़िल्म की मूल शक्ति को कमज़ोर नहीं करतीं।

असल में ‘मां-बहन’ की सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि यह रिश्तों को नए सिरे से देखने के लिए प्रेरित करती है। हम जिस समाज में रहते हैं, वहां मां और बहन के नाम पर सम्मान की बातें भी होती हैं और उन्हीं नामों को गाली में बदल देने की प्रवृत्ति भी। फ़िल्म इस विरोधाभास को बड़ी सहजता से पकड़ती है। वह हमें बताती है कि समस्या सिर्फ भाषा में नहीं, बल्कि सोच में है।

सुरेश त्रिवेणी की यह फ़िल्म उनके सिनेमा की स्वाभाविक प्रगति भी लगती है। ‘तुम्हारी सुलु’ में उन्होंने एक गृहिणी के सपनों को आवाज़ दी थी। ‘जलसा’ में उन्होंने अपराधबोध और सामाजिक विशेषाधिकार की परतें खोली थीं। ‘मां-बहन’ में वे रिश्तों और स्त्री-अस्तित्व की उस जटिल दुनिया में प्रवेश करते हैं जहां हास्य और पीड़ा साथ-साथ चलते हैं।

फ़िल्म खत्म होने के बाद दर्शक के पास कोई बड़ा ट्विस्ट नहीं बचता, लेकिन कई छोटे-छोटे सवाल बच जाते हैं। और शायद यही किसी अच्छी फ़िल्म की पहचान है। वह सिर्फ़  दो घंटे का मनोरंजन नहीं देती, बल्कि हमारी सोच में थोड़ी जगह घेर लेती है।

‘मां-बहन’ उन फ़िल्मों में से है जो बॉक्स ऑफिस के आंकड़ों से ज्यादा बातचीत, विचार-विमर्श में जीवित रहती हैं। यह फ़िल्म आपको हंसाएगी भी, असहज भी करेगी और सोचने पर मजबूर भी करेगी। माधुरी दीक्षित और तृप्ति डिमरी के सशक्त अभिनय, सुरेश त्रिवेणी के संवेदनशील निर्देशन और एक विचारोत्तेजक पटकथा के कारण यह फ़िल्म इस साल अब तक की उल्लेखनीय हिंदी फिल्मों में अपनी जगह बनाने में सफल रहती है।

इस फ़िल्म को इसलिए भी ज़रूर देखें क्योंकि यह हमें याद दिलाती है कि जिन रिश्तों के नाम हम सबसे अधिक लेते हैं, शायद उन्हें सबसे कम समझते भी हैं।

नेटफ़्लिक्स पर है। देख लीजिएगा।  (पंकज दुबे पॉप कल्चर क़िस्सागो, उपन्यासकार और मशहूर यूट्यूब चैट शो ‘स्मॉल टाउन्स बिग स्टोरीज़” के होस्ट हैं।)


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