गणेश जी का उत्सव दस दिनों तक मनाया जाता है। दुर्गापूजा भी नौ रात्रियों तक मनाई जाती है। रामलीला का आयोजन भी आमतौर पर दस दिनों तक चलता है। भगवान कृष्ण की जन्माष्टमी भी मथुरा-वृंदावन में पूरे सप्ताह मनाई जाती है। पुरी में भगवान जगन्नाथ का रथ उत्सव भी दस दिनों तक चलता है। तिरुपति बालाजी का श्रीवरी ब्रह्मोत्सव नौ दिनों तक धूमधाम से मनाया जाता है। अब इस परंपरा में नरेंद्र भाई के ‘सेवा-संकल्प’ में पूरे एक महीने उत्सव और जुड़ने का हमें सौभाग्य मिला है।
ज़िंदगी रोशन करने के लिए अपने घर की मुंडेर पर दीया जलाने की हमारी परंपरा ज़्यादा नहीं तो कम-से-कम पांच हज़ार साल पुरानी तो है ही। मेरी दादी, मेरी नानी और फिर मेरी मां भी हर दिन गोधूलि बेला में घर के मंदिर और तुलसी के चौबारे पर घी का दीया जलाती थीं। मां जब तक थीं, उन्होंने इस रीत का अनवरत निर्वाह किया। वे नहीं रहीं तो बहुत अरसे तक मेरी पत्नी भी ऐसा ही करती रही। घर के छोटे-से मंदिर में रोज़ सुबह-शाम दीया-बाती करने का उस का नियम था। दिल्ली के घरों में चौबारा तो कहां से बनाएं, सो, तुलसी गमले में उगती है और मिट्टी का दीया वह हर शाम पूरे श्रद्धा भाव से उस पर रख दिया करती थी।
मगर कुछ बरस से यह नियम ज़रा लड़खड़ा-सा गया है। प्रतिदिन दीया बालने की पत्नी की हुमक अब वैसी नहीं रही है। एक तो कोरोना-काल में डर के मारे दिल्ली छोड़ कर बहुत दिनों मां, मैं और पत्नी अरण्यवास में चले गए तो गमले में लगी तुलसी सूख गई। और, सूखी तो ऐसी सूखी कि कई बार लगाने की कोशिश की, पर नहीं पनपी, तो नहीं पनपी। सो, तुलसी का दीया आजकल मौन है। फिर पत्नी-बेटियों के आग्रह पर अरसे बाद घर के भीतर हल्का-फुल्का नवीनीकरण कराया तो मंदिर के पट कुछ महीनों के लिए पूरी तरह बंद रखने पड़े और सुबह-शाम दीया लगाने का पत्नी का दस्तूर भंग हो गया। उस के बाद पट तो खुले, लेकिन दीये की निरंतरता नैपथ्य में चली गई।
नरेंद्र भाई मोदी के जन्मदिन पर देश भर में जले करोड़ों आशीर्वाद-दीयों ने मुझे दादी-नानी-मां-पत्नी के सहारे प्राणवान रहे अपने घर के परंपरागत दीये की याद दिला दी। वह दीया मेरे गांव, ननिहाल और जंगल-जंगल पदस्थ मेरे पिता के कवेलू-आवासों से ले कर अंततः दिल्ली तक के घर की सुखदायी-संतोषदायी जीवनीशक्ति बना रहा। दीये की यह भीनी टिमटिमाहट ही आज भी, जब-जब मन उदास होता है, हमारा संबल बनती है। सो, जब नरेंद्र भाई के जन्मदिन पर आशीर्वाद-दीये जलाने के आयोजन-प्रयोजन की होड़ में लगे उन के कल्याणाकांक्षियों की सघन उंदुर-दौड़ मैं ने देखी तो मेरे तो होश फ़ाख़्ता हो गए। मैं तो कभी सोच भी नहीं सकता था कि सनातनी सभ्यता की आधारशिला पावन दीये को भी कभी ऐसे सियासी शस्त्रीकरण का ज़रिया बनाने की हद तक हमारे हुक्मरान उतर सकते हैं।
मेरा जन्म मध्यप्रदेश में हुआ। अगर उसे लालन-पालन कहा जा सके तो लालन-पालन भी मध्यप्रदेश में हुआ। औपचारिक शिक्षा भी मध्यप्रदेश में हुई। पत्रकारिता के संस्कार भी मध्यप्रदेश से मिले। जब राजनीति में कूदने का चस्का लगा तो उस की मैदानी धरती भी मध्यप्रदेश ही रही। तो ज़ाहिर है कि मध्यप्रदेश से अतिरिक्त लगाव मेरी धमनियों में है। इसलिए नरेंद्र भाई के लिए देश भर में बुधवार को रोशन किए गए दीयों में मेरी नज़र सब से पहले मध्यप्रदेश के दीयों पर पड़ी। वहां के मुख्यमंत्री मोहन यादव इस वज़ह से थोड़े परिचित रहे हैं कि वे भी उज्जैन के उसी विक्रम विश्वविद्यालय से पढ़ कर निकले हैं, जहां से मैं। विक्रम की शिक्षण-अध्ययन परंपरा बहुत अर्थपूर्ण और संजीदा मानी जाती रही है। महाकाल के मंदिर से उत्तर दिशा में पांच-छह किलोमीटर दूर आज भी सांदीपनि ऋषि का आश्रम मौजूद है। इसी आश्रम में श्रीकृष्ण, उन के बड़े भाई बलराम और सुदामा ने एक साथ शिक्षा प्राप्त की थी।
तो मुझे लगा कि हमारे मोहन यादव में सांदीपनि की धरती की धूल का कुछ तो असर ज़रूर होगा। मगर फिर मैं ने पाया कि नरेंद्र भाई को आशीर्वाद देने के लिए 3 करोड़ 55 लाख दीये तो अकेले मध्यप्रदेश में जलाए गए। मुख्यमंत्री के ख़ुद के गृह-नगर उज्जैन में महाकाल महालोक के आसपास और क्षिप्रा नदी के घाटों पर 33 लाख 27 हज़ार दीये जला कर एक नया विश्व रिकॉर्ड बनाया गया। अब तक नहीं समझ पा रहा हूं कि इस तिलिस्म की रचना पर गर्व करूं या दूर कहीं जा कर किसी चुल्लू की तलाश में जुटूं? मैं तो अब तक घर-बाहर के मंदिर में आनंद से झूमती दीये की लौ में ही ऐसे शक्तिपुंज के दर्शन करता रहा हूं कि ये लाखों-करोड़ों दीयो की आक्रामक दीपशिखाएं तो मेरे सामने डेढ़ दर्जन परमाणु अस्त्र ढो कर अठारह हज़ार किलोमीटर दूर तक चली जाने वाली सटन-2 मिसाइल का दृश्य पेश कर रही हैं।
नरेंद्र भाई के स्वयं गृह-प्रदेश गुजरात में साढ़े अठारह हज़ार स्थानों पर 88 लाख दीयों ने अपनी माटी के लाल पर आशीष बरसाया। अहमदाबाद की कांकरिया झील किनारे सवा लाख और अटल-पुल पर 76 हज़ार दीये जलाए गए। सूरत में दस हज़ार स्थानों पर दस लाख दीये जले। अहमदाबाद के विश्व उमियाधाम में नरेंद्र भाई के जीवन के 76 बरस पूरे होने पर 76 हज़ार दीये प्रज्वलित कर आरती की गई। गृह मंत्री अमित भाई शाह नरेंद्र भाई के जन्मस्थान वडनगर पहंुचे और आरती-पूजन समारोह का हिस्सा बने। उत्तरप्रदेश और उत्तराखंड के मुख्यमंत्रियों ने भी दीयों की झड़ी लगा दी। नरेंद्र भाई के निर्वाचन क्षेत्र बनारस में दशाश्वमेध घाट, अस्सी घाट और काशी विष्वनाथ धाम क्षेत्र में 5 लाख से अधिक दीये जले। राजधानी लखनऊ में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने अपने मंत्रियों के साथ हज़ारों प्रज्वलित दीयों से बनाई गई नरेंद्र भाई की आकृति की आरती उतारी।
बिहार में 21 लाख आशीर्वाद-दीये जले। छत्तीसगढ़ में 36 लाख दीये जले। पश्चिम बंगाल में एक करोड़ घरों में दीप प्रज्वलन प्रायोजन हुआ। राजस्थान से ले कर महाराष्ट्र तक, आंध्र प्रदेश से ले कर अरुणाचल तक, ओडिशा से ले कर गोवा तक और हरियाणा से ले कर असम, त्रिपुरा, मणिपुर तक हर मतदान केंद्र के क्षेत्र को इकाई मान कर दीप प्रज्वलन के कार्यक्रम आयोजित हुए। सरकारी योजनाओं के लाभार्थियों से अपने-अपने घरों के बाहर पांच-पांच, ग्यारह-ग्यारह दीये जलवा कर नरेंद्र भाई मोदी को शुभाशीष दिलवाया गया। भारतीय जनता पाटी की सरकारों वाले 22 राज्यों के बीच इस मामले में एक-दूसरे को पटखनी देने की होड़-सी मच गई।
आजकल देश भर में गणपति विराजे हुए हैं। गणेश जी का उत्सव दस दिनों तक मनाया जाता है। दुर्गापूजा भी नौ रात्रियों तक मनाई जाती है। रामलीला का आयोजन भी आमतौर पर दस दिनों तक चलता है। भगवान कृष्ण की जन्माष्टमी भी मथुरा-वृंदावन में पूरे सप्ताह मनाई जाती है। पुरी में भगवान जगन्नाथ का रथ उत्सव भी दस दिनों तक चलता है। तिरुपति बालाजी का श्रीवरी ब्रह्मोत्सव नौ दिनों तक धूमधाम से मनाया जाता है। राजस्थान और मध्यप्रदेश में तेजाजी महाराज का उत्सव छह दिनों तक मनाया जाता है। हमारे देश में प्रमुख से प्रमुख देवी-देवताओं और लोकदेवताओं तक के जन्मोत्सव कई दिनों तक मनाने की प्राचीन परंपरा है।
सो, भला हुआ कि नरेंद्र भाई 76 के हुए तो अब इस परंपरा में पूरे एक महीने मनाया जाने वाला सालाना ‘सेवा-संकल्प’ उत्सव और जुड़ने का सौभाग्य हमें मिल गया है। भारत एक उत्सवधर्मी देष है। हम हर बात का उत्सव मनाते हैं। जब सात बरस पहले नरेंद्र भाई ने कहा था कि ‘डर होना चाहिए, डर अच्छी चीज़ है’ तो मुझे नहीं मालूम था कि एक दिन आएगा कि वे मेरे मन के दीये को भी सियासी-धमक का डर फैलाने के साधन में तब्दील कर लेंगे। नरेंद्र भाई के लिए एक सद्भावना-दीप मैं भी दीप्तिमान करने का मेरा भी मन था। मगर अब मेरे उंगलियां ही नहीं, टांगें तक थर-थर कांप रही हैं।
