अब भी द्रोणागिरी पर्वत लाएंगे या नहीं राहुल?

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सब नसीब की बातें हैं। एक देश है, एक संविधान है, सब के लिए एक नियम-क़ानून हैं, फिर भी अगर भोपाल और रांची में किसी का आसमानी सुल्तानी से सब-कुछ छिन जाता है और किसी को सब-कुछ मिल जाता है तो इसे आप नसीब का खेल नहीं मानेंगे तो और क्या मानेंगे? इसलिए देना है तो अपने ग्रह-नक्षत्रों को दोष दीजिए।….मुझे तो फ़िक्र यह हो रही है कि मीनाक्षी-प्रसंग के बाद भी अगर राहुल विक्रम-बजरंगी नहीं बने तो कांग्रेस वह द्रोणागिरी पर्वत कहां से लाएगी, जिस की खोह में उस की संजीवनी छिपी हुई है?

मध्यप्रदेश से राज्यसभा चुनाव के लिए मतदान होता तो कांग्रेस की प्रत्याशी मीनाक्षी नटराजन विधायकों का पर्याप्त बहुमत होते हुए भी जीततीं या नहीं और उन की उम्मीदवारी से कुनमुना रहे विधायक क्रॉस वोटिंग करते या नहीं – मुद्दा यह है ही नहीं। मुद्दा तो यह है कि प्रदेश निर्वाचन अधिकारी ने खोटी नीयत से काम किया है या नहीं, केंद्रीय निर्वाचन आयोग ने इस मामले को दुरुस्त करने से इनकार कर सही किया है या नहीं, सुप्रीम कोर्ट द्वारा निर्वाचन प्रक्रिया पूरी हो जाने के एक दिन बाद सुनवाई की तारीख़ देने के औचित्य पर प्रश्नचिह्न लगना चाहिए या नहीं और भोपाल से दिल्ली पहुंचे कांग्रेस के पांच दर्जन से ज़्यादा विधायकों से महामहिम राष्ट्रपति के व्यस्तता की वज़ह से नहीं मिल पाने के निर्णय की पंक्तियों के बीच कुछ पढ़ने की ज़रूरत है या नहीं?

प्रदेश निर्वाचन अधिकारी की नीयत पर संदेह कर मैं देशद्रोह का पापी बनने को तैयार नहीं हूं। इसलिए उन की पवित्र आत्मा को दूर से नमन करता हूं। यह कह कर भी मैं सनातन समाज का कोपभाजन नहीं बनना चाहता हूं कि केंद्रीय चुनाव आयोग को अपनी विस्तारित बांह की मध्यमा-संचालन से उपजे हालात को दुरुस्त करने का नैतिक कर्तव्य निभाना चाहिए था और वह उस ने नहीं निभाया। उच्चतम न्यायालय की सर्वोच्च गरिमा का सम्मान करना तो मेरा जन्मजात धर्म है। इसलिए अपनी ज़ुबान को मैं बत्तीस दांतों के पहरे में रखूंगा-ही-रखूंगा। रही बात राष्ट्रपति महोदया की तो मैं ताल ठोक कर यह कह सकता हूं कि अगर उन्हें अपनी चरम मसरूफ़ियत के बीच दो-चार मूल्यवान लम्हे भी रोते-पीटते निर्वाचित जन-प्रतिनिधियों की बात सुनने को मिल सकते होते तो वे कतई ऐसा नहीं करतीं कि कन्नी काट जाएं।

सो, मेरा तो मानना है कि न तो प्रदेश के राज्यसभा निर्वाचन अधिकारी ऐसा कुछ करना चाहते थे, जो उन्हें करना पड़ा और न केंद्रीय चुनाव आयोग को यह पड़ी थी कि अगर कोई बात सच है तो उस से मुंह फेर ले। अब जब मीनाक्षी ने अपने नामांकन पत्र में पूरी जानकारी देने में चूक कर दी तो चुनाव कराने वाले व्यक्ति और संस्थाएं बेचारे क्या करें? उन्हें नियमों के तहत काम करना होता है और वही उन्होंने किया। आप को पूछना है तो लाख पूछते रहिए कि झारखंड में भारतीय जनता पार्टी समर्थित निर्दलीय राज्यसभा प्रत्याशी के मामले में इन्हीं नियमों का पालन क्यों नहीं किया गया? अगर 1995 में आई ठिलवई-नरेश गोविंदा अभिनीत ‘गैंबलर’ फ़िल्म का पिछले 31 साल से बज रहा यह गीत आप ने नहीं सुना है कि ‘मैं चाहे ये करूं, मैं चाहे वो करूं, मेरी मर्ज़ी’ तो इस में भी क्या संवैधानिक संस्थाओं की ख़ता है?

मैं यह भी पूरे विश्वासपूर्वक मानता हूं कि सुप्रीम कोर्ट ने मीनाक्षी का नामांकन पत्र खारिज़ कर दिए जाने के मसले पर उसी वक़्त सुनवाई नहीं कर के और अंततः याचिका को खारिज़ कर के कोई अन्याय नहीं किया है। सर्वोच्च अदालत का हुक़्म सिर-माथे। आप चाहे कितने ही बड़े वकील हों और आप का मसला आप को ख़ुद कितना ही अति-आवश्यक लग रहा हो, देश की सर्वोच्च अदालत से यह अपेक्षा रखना उस के साथ ज़्यादती नहीं है क्या कि वह अपने मुख्यद्वार पर स्थाई तौर एक जहांगीर-घंटा लटका कर रखे और उस के बजते ही हर मामले में आधी रात को अपने दरवाज़े खोल कर न्यायमूर्तियों को गाउन पहना कर बैठा दे? निर्वाचन प्रक्रिया संपन्न होने का कर्मकांड अपने हिसाब से चलता है और न्याय-देवता के विधि-विधान अपने हिसाब से। जो इसे ले कर विलाप कर रहे हैं कि हमारी याचिका पर सुनवाई एक दिन बाद हुई, उन के स्मृति-पटल की दुर्बलता पर मुझे तरस आ रहा है। क्या वे भूल गए कि अभी जुम्मा-जुम्मा सात रोज़ पहले ही न्याय-मंदिर से उद्घोषणा हुई थी कि अगर बीस-तीस लाख मतदाता इस बार के चुनाव में मतदान करने से वंचित रह भी जाएंगे तो ऐसी हायतौबा मचाने की क्या ज़रूरत है? वे अगली बार मतदान कर लेंगे!

मुझे पक्का यक़ीन है कि महामहिम ने भी विधायकों के रुदन को लोकतंत्र के अरण्य के हवाले करने में किसी राजधर्म का कोई उल्लंधन नहीं किया है। यह आप को क्यों ज़रूरी लगता है कि एक राष्ट्राध्यक्ष को चूं-चूं का मुरब्बा किस्म की झंझटों में पड़ना चाहिए? आख़िरकार किसी पद की कोई महत्ता होती है या नहीं? ज़रा-ज़रा सी बातों को दिल से लगा लेने की छटपटाहट दिखा कर क्या राष्ट्रपति के पद की भव्यता के छिलके बिखेर देना बुद्धिमानी होती? इसलिए महामहिम ने अपने पद की महिमा और यश की रक्षा के लिए जो किया, एकदम ठीक किया। मूढ़ विधायकों में इतनी अक़्ल तो होनी चाहिए न कि राष्ट्रपति भवन कोई पंचायत भवन नहीं है कि आप जब चाहें उस की चैपाल पर जा कर खड़े हो जाएं!

सो, ये सब नसीब की बातें हैं। एक देश है, एक संविधान है, सब के लिए एक नियम-क़ानून हैं, फिर भी अगर भोपाल और रांची में किसी का आसमानी सुल्तानी से सब-कुछ छिन जाता है और किसी को सब-कुछ मिल जाता है तो इसे आप नसीब का खेल नहीं मानेंगे तो और क्या मानेंगे? इसलिए देना है तो अपने ग्रह-नक्षत्रों को दोष दीजिए। नाहक किसी और की मंशा पर शक़ मत कीजिए। मगर हर बात में मीन-मेख निकालने की ऐसी आदत मौजूदा विपक्ष को पड़ गई है कि उसे चारों तरफ़ षड्यंत्र-ही-षड्यंत्र नज़र आते हैं। उस के देखादेखी सत्तापक्ष को भी इस बीमारी ने घेर लिया है और उसे भी प्रतिपक्ष का हर नेता देश के ख़िलाफ़ साज़िश में लिप्त दिखाई देता है।

अब इन षड्यंत्रवादियों के शुबहे की चरमावस्था देखिए। वे कह रहे हैं कि चूंकि राहुल गांधी ने दिग्विजय सिंह को तीसरी बार राज्यसभा का उम्मीदवार नहीं बनाने का फ़ैसला पहले ही कर लिया था और इस वज़ह से दिग्विजय को ख़ुद ही ऐलान कर देना पड़ा कि वे इस बार दौड़ से अलग रहने का निर्णय ले रहे हैं, इसलिए वे भीतर-भीतर उबल रहे थे। कमल नाथ के बारे में अफ़वाह उड़ाई जा रही है कि वे राज्यसभा में जाना चाहते थे, मगर राहुल ने उन्हें भी न भेजने की ठान ली थी, इसलिए वे भी कोप-भवन में बैठे थे। सो, दोनों की फुंकार से मीनाक्षी ढेर हो गईं और अगर उन का नामांकन रद्द करने के लिए हासिल किया गया दस्तावेज़ काम नहीं आता तो नौ-दस कांग्रेसी विधायक भाजपा के उम्मीदवार को वोट दे देते।

चंडूखाने में ये चर्चाएं भी हैं कि मध्यप्रदेश के प्रभारी हरीश चाौधरी ने सारे वरिष्ठ नेताओं को अपनी अधपकी कार्यशैली से पहले ही नाख़ुश कर रखा था। इस का ख़ामियाज़ा भी मीनाक्षी को भुगतना पड़ा। फिर यह कहने वालों की भी कमी नहीं है कि प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष जीतू पटवारी और विधायक दल के नेता उमंग सिघार भी मीनाक्षी को मध्यप्रदेश में इसलिए ठौर नहीं देना चाहते थे कि इस से, जब कभी भी बनती, कांग्रेस की सरकार बनने पर बतौर मुख्यमंत्री दोनों की संभावनाओं पर अभी से ढक्कन लग जाता। मुंह जब तक रहेंगे, बातें तो तब तक होती ही रहेंगी। मुझे तो फ़िक्र यह हो रही है कि मीनाक्षी-प्रसंग के बाद भी अगर राहुल विक्रम-बजरंगी नहीं बने तो कांग्रेस वह द्रोणागिरी पर्वत कहां से लाएगी, जिस की खोह में उस की संजीवनी छिपी हुई है?

लेखक न्यूज़-व्यूज़ इंडिया और ग्लोबल इंडिया इनवेस्टिगेटर के संपादक हैं।


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