राहुल पर बढ़ती कांग्रेस की निर्भरता

Categorized as अजित द्विवेदी कालम

ऐसा लग रहा है कि कांग्रेस पार्टी पूरी तरह से राहुल गांधी पर निर्भर होती जा रही है। उनके बगैर कांग्रेस में न तो कोई फैसला हो पा रहा है और न कोई राजनीतिक गतिविधि चल पा रही है। यहां तक कि खुद राहुल की ओर से जो एजेंडा स्थापित किया जा रहा है उसको भी कांग्रेस के नेता आगे नहीं बढ़ा पा रहे हैं। उसके लिए भी राहुल का इंतजार हो रहा है। सोनिया गांधी के समय तक यह स्थिति नहीं थी। फैसलों के लिए जरूर सोनिया गांधी पर कांग्रेस की निर्भरता थी लेकिन बाकी राजनीतिक गतिविधियां स्वाभाविक रूप से चलती थीं। प्रदेशों के नेता वहां की जरुरत के हिसाब से काम करते थे। कांग्रेस जहां सरकार में थी वहां सरकार के कामकाज होते थे और जहां विपक्ष में होती थी वहां वह मजबूती से विपक्ष की भूमिका निभाती थी। जिन राज्यों में चुनाव होते थे वहां कांग्रेस का प्रदेश नेतृत्व चुनाव की तैयारी करता था। लेकिन अब ऐसा लग रहा है कि कांग्रेस की सरकारों का कामकाज, पार्टी की राजनीतिक गतिविधियां और चुनाव अभियान सब कुछ अकेले राहुल गांधी पर निर्भर है।

इसे कांग्रेस की राजनीति पर नरेंद्र मोदी का प्रभाव कह सकते हैं। जिस तरह से नरेंद्र मोदी अकेले भाजपा की हर राज्य सरकार का संचालन करते हैं, हर राज्य की राजनीति संभालते हैं और लोकसभा से लेकर विधानसभा और नगर निगम के चुनाव लड़ाते हैं, यहां तक कि हर ट्रेन को हरी झंडी भी खुद ही दिखाते हैं उसी तरह कांग्रेस में राहुल गांधी की स्थिति हो गई है। फर्क यह है कि भाजपा में संगठन का एक बड़ा ढांचा है, राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ के लोग हैं और नरेंद्र मोदी के पास अमित शाह हैं। इसके अलावा भी मोदी और शाह के दिशा निर्देश पर काम करने वाली प्रतिबद्ध लोगों की एक टीम भी है, जो राजनीतिक अभियानों को आगे बढ़ाती है तो बड़ी सफलता के साथ चुनाव प्रबंधन का भी काम करती है। बाकी सरकार में होने की जो सुविधाएं हैं वह तो अपनी जगह हैं ही। मुश्किल यह है कि राहुल गांधी के पास इनमें से कुछ भी नहीं है। तभी सब कुछ उनको खुद करना होता है और अगर वे नहीं होते हैं यानी विदेश चले जाते हैं या छुट्टी पर होते हैं तो पूरी कांग्रेस पार्टी छुट्टी पर चली जाती है।

जैसे अभी राहुल गांधी करीब दो हफ्ते के लिए दक्षिण अमेरिका के दौरे पर गए तो कांग्रेस पार्टी में सब कुछ ठहर गया। बिहार में विधानसभा चुनाव हो रहा है लेकिन राजद के साथ सीट बंटवारे की बातचीत अटकी रही तो कांग्रेस का प्रचार अभियान भी शुरू नहीं हुआ। राहुल जब दक्षिण अमेरिका के दौरे पर थे उसी समय चुनाव आयोग ने बिहार की अंतिम मतदाता सूची जारी की। योगेंद्र यादव जैसे सामाजिक कार्यकर्ताओं और बिहार में सीपीआई एमएल ने इसमें गड़बड़ियों का मुद्दा उठाया। खबर है कि करीब 10 हजार मतदाता ऐसे हैं, जिनके नाम काटते वक्त यह नहीं बताया गया है कि किस वजह से उनका नाम कटा है। गौरतलब है कि चुनाव आयोग ने नाम काटने की तीन श्रेणियां बनाई हैं। एक श्रेणी मृत लोगों की है, दूसरी स्थायी रूप से शिफ्ट कर गए लोगों की है और तीसरी जिनके नाम एक से ज्यादा जगहों पर था। लेकिन 10 हजार नामों को इनमें से किसी श्रेणी में नहीं रखा गया है और नाम काट दिया गया है।

सोचें, राहुल गांधी ने बिहार में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण को कितना बड़ा मुद्दा बनाया था! वे दो हफ्ते तक बिहार में रहे थे और 23 जिलों की यात्रा की थी। कांग्रेस के साथ साथ उन्होंने राजद, लेफ्ट, वीआईपी सबको साथ रखा और दो हफ्ते तक इसी काम में लगाए रखा। लेकिन जब एसआईआर का काम अंतिम नतीजे पर पहुंचा यानी अंतिम मतदाता सूची आई तो राहुल गांधी भी गायब और पार्टी भी नदारद। न तो दक्षिण अमेरिका से राहुल गांधी का कोई बयान आया और न प्रदेश में उनकी पार्टी ने कोई विरोध प्रदर्शन किया। चुनाव आयोग ने अंतिम मतदाता सूची जारी करते हुए कहा था कि 10 अक्टूबर को पहले चरण की अधिसूचना जारी होने से पहले तक नाम जोड़ने के लिए आवेदन किया जा सकता है। हकीकत यह है कि 10 अक्टूबर तक नाम जोड़ने का एक भी आवेदन नहीं आया। क्या अब भी राहुल गांधी एसआईआर में गड़बड़ी और ‘वोट चोरी’ के आरोप लगाएंगे?

चुनाव आयोग ने जिस समय बिहार में विधानसभा चुनाव की घोषणा की उस समय भी राहुल गांधी देश से बाहर थे। कायदे से तो चुनाव की घोषणा से पहले ही गठबंधन में घटक दलों के साथ सीटों का बंटवारा तय हो जाना चाहिए था। लेकिन चुनाव की घोषणा के बाद भी यह काम अटका रहा। कांग्रेस के नेताओं ने किसी तरह से इस बारे में फैसला नहीं होने दिया। भाजपा के गठबंधन एनडीए में भी देरी हुई लेकिन वहां यह काम प्रदेश के नेता, संगठन प्रभारी और चुनाव प्रभारी करते रहे, जबकि कांग्रेस में राहुल का इंतजार होता रहा। कांग्रेस की ओर से कहा जा सकता है कि राहुल की गैरहाजिरी का इस्तेमाल कांग्रेस दबाव डालने के लिए कर रही थी। लेकिन वह हकीकत नहीं है। कांग्रेस हर छोटे बड़े फैसले के लिए राहुल का मुंह देख रही है।

हरियाणा में दलित समाज के आईपीएस वाई पूरन कुमार ने गोली मार कर खुदकुशी कर ली, जिस पर करीब आठ दिन विवाद चला। पूरन कुमार की आईएएस पत्नी अमनीत कुमार ने पति के शव का पोस्टमॉर्टम रूकवा दिया और कहा कि जब तक राज्य के पुलिस महानिदेशक और रोहतक के पूर्व एसपी को गिरफ्तार नहीं किया जाता है तब तक वे पोस्टमॉर्टम नहीं होने देंगी। इसे लेकर चंडीगढ़ में वाल्मिकी समाज ने महापंचायत की। विवाद इतना बढ़ गया कि 17 अक्टूबर को राज्य सरकार के एक साल पूरे होने पर आयोजित समारोह में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के शामिल होने का कार्यक्रम रद्द हुआ। इस दौरान आम आदमी पार्टी पूरे पंजाब में कैंडल मार्च करती रही और भाजपा को दलित विरोधी ठहराने की राजनीति करती रही। लेकिन इस दौरान कांग्रेस पार्टी नदारद रही। राहुल गांधी विदेश से लौटे तो वे चंडीगढ़ गए और तब कांग्रेस पार्टी एक्शन में आई। सोचें, पंजाब और हरियाणा दोनों राज्यों में कांग्रेस मुख्य विपक्षी पार्टी है। उसका संगठन भी मजबूत है। हरियाणा में करीब 20 फीसदी और पंजाब में 30 फीसदी से ज्यादा दलित आबादी है। पिछले कुछ दिनों से राहुल गांधी दलित राजनीति साधने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे हैं। लेकिन इस मामले में भी उनकी पार्टी उनके भरोसे बैठी रही।

अगले साल पश्चिम बंगाल और असम के साथ साथ पांच राज्यों के चुनाव हैं। लेकिन केरल छोड़ कर राहुल गांधी का भी कहीं का दौरा नहीं हुआ है। ध्यान नहीं आ रहा है कि वे आखिरी बार पश्चिम बंगाल कब गए थे। असम गए हए भी उनको कितना समय हो गया यह शायद उनको भी ध्यान नहीं होगा। एक तो वे खुद भी मोदी और शाह की तरह मेहनत नहीं कर पाते हैं और न 365 दिन 24 घंटे राजनीति में रमे रहते हैं और दूसरे उनकी पार्टी बिना उनके किसी राजनीतिक अभियान की कल्पना ही नहीं करती है। विपक्ष को जिस तरह से आक्रामक और सक्रिय रहना चाहिए वैसी आक्रामकता और सक्रियता सत्तारूढ़ दल में दिखती है, जबकि मुख्य विपक्षी पार्टी आलस की मारी दिखाई देती है। इसके बाद अगर चुनाव हार जाते हैं तो चुनाव आयोग, मतदाता सूची, ईवीएम, ‘वोट चोरी’ आदि की कहानी शुरू हो जाती है।


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