जाति आधारित पार्टियां लोकतंत्र का भविष्य हैं!

Categorized as अजित द्विवेदी कालम

क्या इसे भारत में अपनाई गई बहुदलीय लोकतंत्र के मजबूत होने का संकेत मानें या कुछ और कि भारत में लगातार राजनीतिक दलों की संख्या बढ़ रही है? हर चुनाव से पहले राज्यों में कई नई पार्टियां बनती हैं। हर पार्टी को कोई न कोई गठबंधन मिल जाता है। राष्ट्रीय स्तर पर दो बड़े गठबंधन पहले से मौजूद हैं, एनडीए और ‘इंडिया’ ब्लॉक। नई पार्टियों को इनमें भी जगह मिल जाती है तभी इन गठबंधनों का आकार लगातार बढ़ता जा रहा है। पिछले लोकसभा चुनाव के समय पता चला कि भाजपा के नेतृत्व वाले एनडीए में 38 पार्टियां हैं तो कांग्रेस के नेतृत्व वाले ‘इंडिया’ ब्लॉक में भी करीब 28 पार्टियां हैं। हालांकि अब इस संख्या में कुछ घट बढ़ हुई है। इसी तरह राज्यों के स्तर पर भी पक्ष और विपक्ष के दो स्पष्ट गठबंधन हैं और उनके अलावा भी छोटे छोटे गठबंधन हैं, जिनमें कई कई पार्टियां हैं। प्रदेश के स्तर पर देखें तो सबसे बड़ा गठबंधन तमिलनाडु में डीएमके का और केरल में सीपीएम का है। तमिलनाडु के सत्तारूढ़ गठबंधन का नाम सेकुलर प्रोग्रेसिव अलायंस नाम है, जिसमें कुल 12 पार्टियां हैं और केरल में लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट में भी 12 पार्टियां हैं।

जनता पार्टी के प्रयोग को छोड़ दें तो पार्टियों के अलग अलग लड़ने की बजाय गठबंधन बना कर लड़ने की सबसे व्यवस्थित मिसाल कम्युनिस्ट पार्टियों ने बनाई थी। पश्चिम बंगाल में वाम मोर्चा बना था, जो लंबे समय तक सत्ता में रहा था। उसका नेतृत्व सीपीएम करती थी और उसमें सीपीआई के साथ साथ रिवोल्यूशनरी सोशलिस्ट पार्टी, फॉरवर्ड ब्लॉक आदि पार्टियां होती थीं। यह प्रयोग केरल में आज भी सफलतापूर्वक चल रहा है, जहां लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट यानी एलडीएफ है, जिसमें 12 पार्टियां हैं। इन सभी पार्टियों का कम से कम एक विधायक है और इनके अलावा दो निर्दलीय विधायकों का समर्थन भी गठबंधन को है। केरल में विपक्षी मोर्चा कांग्रेस के नेतृत्व वाला है, जिसका नाम यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट यानी यूडीएफ है और इसमें छह पार्टियां हैं। कुछ अपवादों को छोड़ दें, जहां कांग्रेस और भाजपा की सीधी लड़ाई होती है तो ज्यादातर राज्यों में इसी तरह के गठबंधन बने हुए हैं और उनके बीच ही मुकाबला होता है।

बिहार विधानसभा चुनाव में भाजपा के नेतृत्व वाले गठबंधन यानी एनडीए में पांच पार्टियां शामिल हैं। भाजपा के अलावा उसके बराबर की पार्टी नीतीश कुमार की जनता दल यू है। इनके अलावा चिराग पासवान की लोक जनशक्ति पार्टी रामविलास, जीतन राम मांझी की हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा और उपेंद्र कुशवाहा की राष्ट्रीय लोक मोर्चा है। इसके जवाब में राष्ट्रीय जनता दल और कांग्रेस ने जो गठबंधन बनाया उसमें एक एक करके नौ पार्टियां शामिल हो गईं। राष्ट्रीय जनता दल और कांग्रेस के अलावा इसमें तीन कम्युनिस्ट पार्टियां सीपीआई माले, सीपीआई और सीपीएम शामिल हैं तो मुकेश सहनी की वीआईपी, पशुपति पारस की राष्ट्रीय लोक जनशक्ति पार्टी, हेमंत सोरेन की झारखंड मुक्ति मोर्चा और आईपी गुप्ता की इंडियन इन्क्लूसिव पार्टी भी शामिल है। असदुद्दीन ओवैसी, चंद्रशेखर आजाद और स्वामी प्रसाद मौर्य ने तीन पार्टियों का अलग गठबंधन बनाया है। इसके अलावा प्रशांत किशोर की जनसुराज पार्टी और मायावती की बसपा अकेले चुनाव लड़ रहे हैं। लालू प्रसाद यादव के बड़े तेज प्रताप यादव ने जनशक्ति जनता दल बना कर पांच पार्टियों का गठबंधन चुनाव में उतारा है। पूर्व आईपीएस अधिकारी शिवदीप लांडे हिंद सेना पार्टी बना कर चुनाव लड़ रहे हैं।

इतनी बड़ी संख्या में नई पार्टियों का जन्म लेना और गठबंधन बना कर या अकेले चुनाव लड़ना निश्चित रूप से भारत के राजनीतिक स्पेस के ज्यादा से ज्यादा लोकतांत्रिक होने का संकेत है। लेकिन इसके अलावा अगर देश के अलग अलग राज्यों में बन रही पार्टियों और उनके नेताओं के सामाजिक प्रोफाइल को देखें तो एक ट्रेंड साफ दिख रहा है कि ज्यादातर पार्टियां जातियों पर आधारित हैं। क्या इसे राजनीति में जातिवाद के तौर पर देखें? महान समाजशास्त्री रजनी कोठारी इसे जातियों का राजनीतिकरण कहते थे। उनका मानना था कि समाज में जाति एक सचाई है और अगर राजनीति पर इसका साया दिख रहा है तो यह कोई अनहोनी बात नहीं है। लेकिन जब तक रजनी कोठारी जीवित थे तब तक चुनिंदा पार्टियां जातीय समीकरण बना कर लड़ती थीं और जाति आधारित पार्टी बनाने का चलन इतना नहीं बढ़ा था।

हालांकि तमिलनाडु में थेवर आधार वाली अन्ना डीएमके और ओबीसी आधार वाली डीएमके का जन्म हो गया था। बाद में वनियार आधार वाली पीएमके और दलित आधार वाली वीसीके भी बनी और उसके बाद तो यह चलन ही चल पड़ा। सो, इस ट्रेंड को इस रूप में परिभाषित किया जा सकता है कि राष्ट्रीय पार्टियों के लिए बंधुआ वोटर के तौर पर काम कर रही जातियों में राजनीतिक जागरूकता बढ़ी और मंडल के बाद की राजनीति में उनका सशक्तिकऱण हुआ तो उन्होंने अपनी पार्टी बना कर सत्ता की संरचना में हिस्सेदारी के लिए प्रतिस्पर्धा करना शुरू कर दिया।

अगर जातियों की सत्ता संरचना में हिस्सेदारी की प्रतिस्पर्धा के आधार पर राजनीतिक दल बनाए जाने की परिघटना को देखें तो यह कहने में कोई हिचक नहीं है कि आने वाले दिनों में राजनीतिक दलों का विस्फोट होने वाला है। बिहार में जाति गणना के बाद हो रहे पहले विधानसभा चुनाव में हर पार्टी के टिकटों में जबरदस्त विविधता देखने को मिल रही है और इसका कारण यही है कि जातियां अपने वोट की संख्या पहचान रही हैं और उस हिसाब से सत्ता में हिस्सेदारी मांग रही हैं। आने वाले दिनों में यह हिस्सेदारी पार्टी बना कर मांगी जाएगी। फिर चूंकि देश भर में जाति गणना होनी है तो यह परिघटना पूरे देश में दोहराई जाएगी। अभी सिर्फ बिहार में इस ट्रेंड को देखें और आगे का अंदाजा लगाएं।

बिहार में यादव वोट आधार वाली पार्टी लालू प्रसाद की राजद है तो कुर्मी, कोईरी यानी लव कुश समीकरण वाली पार्टी नीतीश कुमार की जनता दल यू है, कोईरी वोट आधार वाली पार्टी उपेंद्र कुशवाहा की राष्ट्रीय लोक मोर्चा है, मल्लाह वोट आधार वाली मुकेश सहनी की विकासशील इंसान पार्टी है, तांती ततवा यानी पान समाज के वोट आधार पर आईपी गुप्ता की इंडियन इन्क्लूसिव पार्टी है, दलित समुदाय में पासवान वोट आधार वाली दो पार्टियां हैं, चिराग पासवान की लोक जनशक्ति पार्टी रामविलास और पशुपति पारस की राष्ट्रीय लोक जनशक्ति पार्टी, मुसहर वोट आधार वाली पार्टी जीतन राम मांझी की हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा है तो रविदास आधार वाली मायावती की बसपा और चंद्रशेखर आजाद की आसपा भी चुनाव मैदान में है। उत्तर प्रदेश के दो नेताओं ओमप्रकाश राजभर और स्वामी प्रसाद मौर्य की जाति आधारित पार्टियां भी बिहार में चुनाव लड़ रही हैं।

उत्तर प्रदेश और झारखंड का राजनीतिक स्पेस भी इसी तरह की जाति आधारित पार्टियों से भरा हुआ है। तभी आने वाले दिनों में एक परिघटना के रूप में जाति आधारित राजनीतिक दलों की बाढ़ आने वाली है। देश में जातीय जनगणना के बाद यह प्रक्रिया तेज होगी। इसे सिर्फ राजनीतिक परिघटना के तौर पर देखने से वास्तविक तस्वीर सामने नहीं आएगी। यह एक सामाजिक परिघटना भी है, जिसमें हाशिए पर की जातियां अपने लिए स्पेस बना रही हैं और उनका सामाजिक, आर्थिक व राजनीतिक सशक्तिकरण हो रहा है। कांग्रेस के कमजोर होने से प्रादेशिक पार्टियों का तेजी से उदय हुआ था। इसी तरह जब भी भाजपा कमजोर होगी तब भी पार्टियों की संख्या में कुछ और बढ़ोतरी होगी। बहरहाल, एक तरफ भाजपा और कांग्रेस जैसी पार्टियां दो दलीय व्यवस्था आ जाए इसके प्रत्यक्ष या परोक्ष प्रयास में लगी हैं तो दूसरी ओर देश का राजनीतिक स्पेस अलग तरह से लोकतंत्रीकरण हो रहा है।


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