चुनाव जीतने का बारीक प्रबंधन

Categorized as अजित द्विवेदी कालम

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने अपने को बिहार की राजनीति के लिए तो अपरिहार्य बनाया ही है साथ ही उन्होंने बिहार की दोनों बड़ी राजनीतिक शक्तियों भारतीय जनता पार्टी और राष्ट्रीय जनता दल के लिए भी अपने को अपरिहार्य बनाया। उन्होंने बिहार की राजनीति को वह रूप दिया है, जिसमें किसी भी पार्टी की सरकार उनको बगैर नहीं बन पाती है। इस बात को इस तथ्य से समझें कि वे सबसे बड़ी पार्टी रहे तब भी मुख्यमंत्री बने और तीसरे नंबर की पार्टी रह गए तब भी मुख्यमंत्री बने। उन्होंने एक समय 243 के सदन में सिर्फ 22 सीटों पर सिमट गए राजद को पुनर्जीवन दिया तो नरेंद्र मोदी को उस समय हराया, जिस समय वे अपनी लोकप्रियता के शिखर पर थे। आज अगर भाजपा 240 लोकसभा सांसदों वाली पार्टी बनी है तो इसकी कहानी भी नीतीश से शुरू होती है। जिस समय चंद्रशेखर राव, ममता बनर्जी और अरविंद केजरीवाल सब विफल हो गए उस समय नीतीश ने विपक्षी गठबंधन बनवा दिया, जिसकी पहली बैठक जून 2023 में पटना के मुख्यमंत्री आवास एक, अणे मार्ग में हुई थी। यह अलग बात है कि बाद में नीतीश खुद ही भाजपा के साथ चले गए। फिर भी यह बंदोबस्त करके गए कि भाजपा पूर्ण बहुमत नहीं हासिल कर सके। इसका मतलब है कि वे मारना भी जानते हैं और बचाना भी। उन्होंने नरेंद्र मोदी के साथ वही किया, जो लालू प्रसाद के साथ किया।

बहरहाल, अगर 2025 के चुनाव के बंदोबस्तों की बात करें तो नीतीश कुमार ने इसकी बिसात 2022 में बिछा दी थी, जब वे भाजपा से अलग होकर राजद के साथ गए थे। राजद के साथ मिल कर उन्होंने जाति गणना कराई। पहले से जाति में बंटे बिहार के समाज में जातियों का और बारीक बंटवारा कर दिया। उन्होंने व्यापक हिंदू एकता बनाने के भाजपा के प्रयास को तो पंक्चर किया ही साथ ही बहुत कम संख्या वाली जातियों को भी सत्ता में हिस्सेदारी के लिए प्रतिस्पर्धा करने को प्रेरित किया। इन जातियों की प्रतिस्पर्धा का नतीजा है कि बिहार की पार्टियों के टिकट बंटवारे में इतनी विविधता देखने को मिल रही है। इससे पहले लोकसभा चुनाव में दिखा कि कैसे राजद के नेतृत्व वाले महागठबंधन ने अपने मुस्लिम और यादव समीकरण से बाहर कुशवाहा और भूमिहार या ब्राह्मण उम्मीदवार उतारे। विधानसभा चुनाव में टिकट बंटवारे में यह विविधता और ज्यादा देखने को मिल रही है।

नीतीश कुमार ने सबसे पहले यह प्रयोग किया इसलिए सत्ता में हिस्सेदारी के लिए प्रतिस्पर्धा कर रही बहुत कम संख्या वाली जातियों के नेता के रूप में वे ही स्थापित हुए। भाजपा उनके इस प्रयोग को देख रही थी और इसको काउंटर करने का प्रयास भी किया लेकिन कामयाबी नहीं मिली। देर से ही सही लेकिन उसने कम आबादी वाली जातियों का नेतृत्व उभारने का प्रयास किया। इसी प्रयास के तहत 2020 के चुनाव के बाद जब जनता दल यू 43 सीट की पार्टी रह गई थी तब भाजपा ने उनके साथ तारकिशोर प्रसाद और रेणु देवी को उप  मुख्यमंत्री बनाया। लेकिन इस प्रयोग में कामयाबी इसलिए नहीं मिली क्योंकि भाजपा के पास जातियों के प्रतिनिधि चेहरे नेता बनने लायक नहीं थे। उस मामले में नीतीश पहले ही भाजपा को कमजोर कर चुके थे। दूसरा कारण यह हुआ कि दो साल बाद ही नीतीश कुमार भाजपा को छोड़ कर राजद के साथ चले गए और वहां जाकर जाति गणना करा दी। उसके बाद वे फिर भाजपा के साथ तभी लौटे, जब उन्होंने यह सुनिश्चित कर दिया कि विपक्षी एकता के सामने भाजपा मजबूर है और उनके हिसाब से काम करेगी। तभी 2024 के जनवरी में जब नीतीश वापस लौटे तो भाजपा को कुशवाहा और भूमिहार उप मुख्यमंत्री बनाना पड़ा।

जाति साधने के साथ साथ नीतीश ने इस हकीकत को पहचाना कि पलायन के कारण बिहार में महिलाएं, बच्चे और बुजुर्ग सबसे ज्यादा हैं। तभी उन्होंने देश में सबसे पहले महिला मतदाता समूह को खुश करने और अपने साथ जोड़ने की राजनीति शुरू की। स्थानीय निकाय में 50 फीसदी आरक्षण से लेकर, बालिका साइकिल योजना, पोशाक योजना, जीविका दीदी, शराबबंदी से लेकर नौकरियों में 35 फीसदी डोमिसाइल और अब महिला उद्यमी योजना तक उनकी योजनाओं ने महिलाओं को उनके साथ स्थायी रूप से जोड़ दिया। इस बार चुनाव में मुख्यमंत्री महिला उद्यमी योजना के तहत महिलाओं के खाते में 10 हजार रुपए भेजने को गेमचेंजर के रूप में देखा जा रहा है। इसकी तुलना शिवराज सिंह चौहान की लाड़ली बहना योजना या एकनाथ शिंदे की लड़की बहिन योजना या हेमंत सोरेन की मइया सम्मान योजना से की जा रही है। लेकिन यह योजना असर के मामले में इसलिए भिन्न है क्योंकि इसके तहत जिन महिलाओं को लाभ मिल रहा है उनके साथ नीतीश का एक भावनात्मक जुड़ाव उस समय से है, जब उन्होंने उनको साइकिल देकर उनका स्कूल जाना सुनिश्चित किया था। आज वही लड़कियां गृहिणी हैं, उद्यमी हैं या कहीं छोटे मोटे काम कर रही हैं। उनको नकद पैसा मिलना उनके साइकिल के दिनों की याद ताजा करेगा।

नीतीश कुमार ने इसके साथ ही पिछले 20 वर्षों के अपने शासनकाल में 2005 से पहले के बिहार की यादों को भी जीवित रखा और बिहार की जनता के बीच यह नैरेटिव स्थापित किया कि उनकी कमीज सबसे उजली है। उन्होंने कर्पूरी ठाकुर की तरह अपने परिवार को राजनीति से दूर रखा और भ्रष्टाचार का एक भी आरोप अपने ऊपर नहीं लगने दिया। यह मामूली बात नहीं है कि थोड़े समय की सत्ता भी नेताओं को व्यापक रूप से भ्रष्ट बना रही है तो नीतीश कुमार 20 साल मुख्यमंत्री रहने और उससे पहले कई बार केंद्रीय मंत्री रहने के बावजूद ईमानदार बने रहे। उन्होंने सामाजिक समीकरण, 2005 से पहले के शासन की बुरी यादों और अपनी ईमानदार छवि के आधार पर अपने को अपरिहार्य बनाया। तभी आज भाजपा की मजबूरी है कि वह नीतीश कुमार का चेहरा दिखाए। अगर नहीं दिखाती है तो इसका फायदा तेजस्वी यादव को हो सकता है। इसी दिन के लिए तो नीतीश ने राजद को पुनर्जीवन देकर तेजस्वी यादव को राजनीति और शासन दोनों का अनुभव दिया। दूसरे, मंडल से उभरे सभी नेताओं के हाशिए पर जाने के बाद मंडल की राजनीति के स्वाभाविक उत्तराधिकारी भी तेजस्वी ही हैं। यह एक अलग विश्लेषण का विषय है।

अंत में चुनाव जीतने वाले आधुनिक बंदोबस्तों की बात करें तो इस बार के चुनाव में नीतीश कुमार की सरकार ने भी खुल कर पैसा बांटा। इस तात्कालिक दांव ने नीतीश के दीर्घकालिक राजनीति के साथ मिल कर एनडीए की जीत की संभावना को बढ़ाया है। उनकी सरकार ने सामाजिक सुरक्षा की पेंशन चार सौ से बढ़ा कर 11 सौ रुपए महीना कर दी। हर महीने 125 यूनिट बिजली मुफ्त कर दी। महिला उद्यमी योजना के तहत महिलाओं के खाते में 10-10 हजार रुपए डाले। स्नातक बेरोजगारों को एक एक हजार रुपया महीना देने का ऐलान किया तो नए वकीलों को तीन साल तक पांच पांच हजार रुपए की राशि देनी शुरू की। आशा दीदी, जीविका दीदी, ममता दीदी से लेकर स्कूलों के नाइट गार्ड्स, पीटी टीचर्स आदि का मानदेय बढ़ा दिया। ध्यान रहे नीतीश के खिलाफ कोई ऐसा गुस्सा जमीन पर नहीं दिख रहा है कि उनको उखाड़ फेंकना है। उनके खिलाफ सिर्फ यह बात है कि वे 20 साल से मुख्यमंत्री हैं। इससे थोड़ी ऊब और थकान लोगों में दिख रही है, जिसे पैसे बांट कर दूर किया जा रहा है।

सो, नीतीश की राजनीति, उनके व्यक्तित्व और सरकार के कामकाज की जड़ें इतनी गहरी हैं कि आसानी से नहीं उखड़ने वाली है। तभी भाजपा की मजबूरी है कि वह उनकी पार्टी को महत्व दे और उनका चेहरा दिखा कर चुनाव में जाए। उसको पता है कि नीतीश का चेहरा दिखाए बगैर चुनाव जीतना मुमकिन नहीं है। उनकी पुण्यता ने ही पहले भी भाजपा को सत्ता दिलाई और इस बार भी दिला सकती है। जहां तक चुनाव जीतने के बाद उनको हाशिए में डालने की रणनीति का सवाल है तो भाजपा को यह भूल जाना चाहिए। चुनाव से पहले नीतीश और उनकी पार्टी के नेताओं का जो रुख है वह चुनाव के बाद भी वैसा ही नहीं रहने वाला है। चुनाव में अगर एनडीए जीतता है तो नीतीश की पार्टी किसी भी हाल में ऐसी स्थिति में रहेगी कि उसके बगैर किसी की सरकार न बने। अंत में नीतीश कुमार के लिए हिंदी के महानतम कवि महाप्राण निराला की पंक्तियाः मेरे अविकसित रागों से ही विकसित होगा बंधु दिगंत, अभी न होगा मेरा अंत!


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