कांग्रेस आलाकमान के पुराने दिन लौटे!

Categorized as अजित द्विवेदी कालम

कर्नाटक में डीके शिवकुमार का मुख्यमंत्री बनना सिर्फ एक राज्य में सत्ता परिवर्तन नहीं है। यह कांग्रेस आलाकमान के कमान में लौटने का भी संकेत है। असल में 2014 में कांग्रेस जब लोकसभा चुनाव हार कर सत्ता से बाहर हुई तब से लगातार कांग्रेस आलाकमान यानी सोनिया और राहुल गांधी की शक्ति का क्षरण हो रहा था। कांग्रेस सिर्फ चुनाव नहीं हार रही थी, बल्कि पार्टी के ऊपर नेहरू गांधी परिवार की कमान भी ढीली पड़ रही थी। क्षत्रप बेलगाम हो रहे थे और खुलेआम पार्टी आलाकमान के निर्देशों की अनदेखी कर रहे थे या उल्लंघन कर रहे थे। जब कांग्रेस के नेता पार्टी आलाकमान की बातों को महत्व नहीं दे रहे थे तो जाहिर है कि सहयोगी पार्टियों के नेताओं का भी रवैया बदल गया था।

अगर कांग्रेस आलाकमान कमजोर नहीं हुआ होता तो ऐसा नहीं होता कि तेजस्वी यादव कांग्रेस के प्रभारी से न मिलते और अशोक गहलोत को भेजना पड़ता कि वे सीटों का बंटवारा कराएं। अगर कांग्रेस आलाकमान कमजोर नहीं हुआ होता तो यह भी नहीं होता कि सोनिया गांधी खुद बुला कर राज्यसभा की सीट के लिए अनुरोध करें और हेमंत सोरेन उसे ठुकरा कर अपना उम्मीदवार घोषित कर दें। लेकिन अब स्थितियां बदल गई हैं। बिहार में राजद बुरी तरह हारी तो तमिलनाडु में डीएमके और बंगाल में टीएमसी चुनाव हार गए। टीएमसी में तो बड़ी टूट हो रही है। आम आदमी पार्टी में भी टूट हुई है।

तभी ऐसा लग रहा है कि समय का चक्र दूसरी दिशा में घूमने लगा है। एक तरफ भाजपा विरोधी प्रादेशिक पार्टियां कमजोर हो रही हैं तो दूसरी ओर केरल की जीत से कांग्रेस मजबूत हुई है। कांग्रेस आलाकमान खास कर राहुल गांधी ने अपनी शक्ति को पहचाना है और उसका इस्तेमाल भी उन्होंने शुरू कर दिया है। राष्ट्रीय स्तर पर भी हालात ऐसे बने हैं, जिनसे राहुल के नेतृत्व और सर्वोच्च नेता की उनकी हैसियत को स्वीकार किया जाने लगा है। यह पिछले लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के अच्छे प्रदर्शन और भाजपा के अपना बहुमत गंवाने के बाद से शुरू हुआ।

उस समय नेता के तौर पर राहुल मजबूत हुए और यह मैसेज भी गया कि राहुल का बनाया राजनीतिक नैरेटिव देश में स्वीकार किया जा रहा है। संविधान बचाने, आरक्षण बढ़ाने, जाति गणना कराने जैसी बातें राहुल कर रहे थे और देश में उसकी चर्चा हो रही थी। जब केंद्र सरकार ने जाति जनगणना कराने का ऐलान किया तो सोच नहीं सकते हैं कि उससे राहुल की राजनीति को कितनी ताकत मिली। सोशल मीडिया के जरिए यह नैरेटिव बनाया गया कि राहुल जो कह रहे हैं उसको देर सबेर भाजपा को स्वीकार करना पड़ रहा है।

सो, एक नेता के तौर पर राहुल गांधी की हैसियत बढ़ी, उनके नैरेटिव को देश की राजनीति में जगह मिली और साथ ही राहुल को यह समझ में आया कि उनको अपनी शक्ति का प्रदर्शन करके ऐसे राजनीतिक फैसले करने चाहिए, जो उनकी नजर में कांग्रेस के लिए जरूरी हैं। इससे पहले भी सोनिया और राहुल गांधी ने पार्टी के लिहाज से जरूरी फैसले करने की कोशिश की थी लेकिन क्षत्रपों ने उसे नाकाम कर दिया था। राजस्थान में खुले तौर पर अशोक गहलोत ने पार्टी नेतृत्व के निर्देश का उल्लंघन किया था। नेतृत्व परिवर्तन की बात के लिए कांग्रेस आलाकमान ने जो पर्यवेक्षक भेजे थे वे जयपुर में बुरी तरह से अपमानित हुए थे। कांग्रेस नेतृत्व ने गहलोत को राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाना चाहा, जिसके लिए उन्होंने मना कर दिया और अपना संख्या बल दिखा कर मुख्यमंत्री बने रहे।

उससे पहले कांग्रेस ने कैप्टेन अमरिंदर सिंह को मुख्यमंत्री पद से हटाया तो वे और सुनील जाखड़ सहित कई नेता पार्टी छोड़ कर चले गए। ऐसे ही छत्तीसगढ़ में सोनिया और राहुल गांधी भूपेश बघेल व टीएस सिंहदेव का विवाद नहीं सुलझा सके, जिसका खामियाजा कांग्रेस को 2023 के चुनाव में भुगतना पड़ा। राजस्थान और छत्तीसगढ़ दोनों राज्यों में क्षत्रपों को नहीं संभाल पाने का नुकसान कांग्रेस को हुआ। उससे पहले मध्य प्रदेश में भी दिग्विजय सिंह बनाम ज्योतिरादित्य सिंधिया का मामला कांग्रेस आलाकमान नहीं सुलझा सका था। हरियाणा में भूपेंद्र सिंह हुड्डा के सामने आलाकमान की कुछ नहीं चल पाई। अगर कांग्रेस आलाकमान की चलती तो हो सकता था कि 2024 का चुनाव कांग्रेस जीत जाती।

बहरहाल, अब हालात बदल गए हैं। राहुल गांधी ने अपनी शक्ति संचित की है और उसका इस्तेमाल करके अपनी पसंद के फैसले लागू कराना शुरू किया है। केरल में वीडी सतीशन का मुख्यमंत्री बनना भी राहुल के ऐसे ही फैसले की एक कड़ी है। सोचें, कैसे कांग्रेस के बड़े नेताओं ने केसी वेणुगोपाल के लिए माहौल बनाया था। यह अनायास नहीं था कि जो पर्यवेक्षक भेजे गए थे उनकी रिपोर्ट का पहला पन्ना मीडिया को दिख गया और उसको पता चल गया कि कांग्रेस के 63 में से 43 विधायक चाहते हैं कि वेणुगोपाल सीएम बनें। लेकिन राहुल गांधी इस दबाव में नहीं आए।

उन्होंने सतीशन को सीएम बनवाया। इसी तरह सिद्धारमैया को जब सत्ता परिवर्तन की बात करने के लिए दिल्ली बुलाया गया तो वे 93 विधायकों की सूची लेकर पहुंचे। कांग्रेस के 135 में से 93 विधायक साथ होने का उन्होंने दावा किया और इस आधार पर दबाव बनाया कि उनको नहीं हटाया जाए। लेकिन राहुल गांधी इस दबाव में नहीं आए। उन्होंने सिद्धारमैया को हटाया और डीके शिवकुमार को पूरी ताकत देकर मुख्यमंत्री बनाया। जिस तरह से तीन साल सिद्धारमैया ने अपने हिसाब से सरकार चलाई वैसे ही अगले दो साल शिवकुमार चलाएंगे और उनकी कमान में, उनके चेहरे पर कांग्रेस चुनाव लड़ेगी।

अब तक कांग्रेस पार्टी का इकोसिस्टम यह नैरेटिव बनाता था कि राहुल गांधी इकलौते साहसी नेता हैं, जो सरकार पर खुल कर हमला करते हैं। उन्होंने सर्वशक्तिशाली प्रधानमंत्री और सर्वशक्तिशाली कॉरपोरेट को टारगेट करके अपनी एक छवि बनाई थी। लेकिन साथ ही यह भी छवि बनी थी कि पार्टी में अपने हिसाब से फैसले नहीं करा पाते हैं। अब वह छवि बदली है। हालांकि अब भी तमाम मीडिया और राइटविंग इकोसिस्टम दिन भर राहुल गांधी बनाम प्रियंका गांधी वाड्रा कराने की कोशिश करता रहता है।

यह भी कहा जा रहा है कि डीके शिवकुमार प्रियंका की पसंद हैं या सतीशन को बनाने में प्रियंका की भूमिका थी। लेकिन यह ध्यान रखना चाहिए कि प्रियंका कांग्रेस आलाकमान का हिस्सा हैं। सोनिया व राहुल गांधी और प्रियंका गांधी वाड्रा को मिला कर ही कांग्रेस आलाकमान बनता है और इस आलाकमान ने अपनी ताकत दिखानी शुरू कर दी है। अगर अगले साल के सात राज्यों के चुनावों में कांग्रेस उत्तराखंड, पंजाब, गोवा, मणिपुर, हिमाचल प्रदेश आदि में अच्छा प्रदर्शन करती है तो आलाकमान की स्थिति और मजबूत होगी।


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