सरकार ने बनवा दी विपक्षी एकजुटता

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संसद के बजट सत्र से पहले विपक्ष बिखरा हुआ था। ‘इंडिया’ ब्लॉक पार्टियों में आपसी अविश्वास चरम पर था। समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव कोलकाता गए थे और ममता बनर्जी को विपक्षी गठबंधन का नेता घोषित करके आए थे। उन्होंने कहा था कि सिर्फ ममता ही भाजपा से लड़ सकती हैं। यह राहुल गांधी के नेतृत्व पर बड़ा सवाल था। उधर बिहार विधानसभा चुनाव के नतीजों के बाद से राजद और कांग्रेस में स्थायी दूरी बनी दिख रही है। कांग्रेस के नेता अकेले राजनीति करने के पक्ष में हैं। झारखंड में हेमंत सोरेन की सरकार की केंद्र सरकार से और जेएमएम की भाजपा से बढ़ती नजदीकियों से भी कांग्रेस नेता परेशान हैं। उधर महाराष्ट्र का घटनाक्रम सबके सामने है। शरद पवार की पार्टी किसी तरह से अजित पवार की पार्टी के साथ विलय चाहती है और साथ मिल कर एनडीए में रहना चाहती है। आम आदमी पार्टी वैसे भी विपक्षी गठबंधन से बाहर है और अब तो पंजाब चुनाव एक साल रह गए हैं, जहां कांग्रेस और आप को आमने सामने की लड़ाई लड़नी है तो उसके साथ आने का सवाल ही नहीं है। विपक्ष के ऐसे बिखराव के बीच बजट सत्र शुरू हुआ तो लग रहा था कि कामकाजी एकता दिखेगी लेकिन विपक्ष बिखरा ही रहेगा।

पहले हफ्ते में ऐसा दिखा भी कि विपक्षी पार्टियां कांग्रेस के साथ सिर्फ औपचारिकता का निर्वहन कर रही थीं। लेकिन दूसरे हफ्ते के पहले दिन यानी सोमवार, दो फरवरी को जब राष्ट्रपति के अभिभाषण पर सरकार की ओर से पेश धन्यवाद प्रस्ताव पर चर्चा शुरू हुई तो भाजपा ने कुछ ऐसा किया कि पूरा विपक्ष एकजुट हो गया। विपक्ष के नेता राहुल गांधी को भाजपा यानी सत्तापक्ष के सांसदों ने भाषण नहीं देने दिया। केंद्रीय मंत्रियों ने राहुल के भाषण में बाधा डाली। प्रधानमंत्री के बाद नंबर दो यानी रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने 11 बार खड़े होकर राहुल को बोलने से रोका तो गृह मंत्री अमित शाह ने सात बार खड़े होकर उनको टोका। सत्तापक्ष की वजह से घंटों की कार्यवाही बाधित हुआ तो अपने आप यह मैसेज बना कि राहुल कुछ ऐसा कह रहे हैं, जो सरकार और भाजपा के लिए नुकसानदेह हो सकता है। इसी बीच अमेरिका के साथ व्यापार संधि की घोषणा हुई। सरकार को लग रहा था कि यह इतनी बड़ी घोषणा है कि सारे विवाद दब जाएंगे। लेकिन इसने भी विपक्ष को एकजुट करने में भूमिका निभाई।

असल में राहुल गांधी पूर्व सेना प्रमुख जनरल एमएम नरवणे की अब तक नहीं छपी किताब ‘फोर स्टार्स ऑफ डेस्टिनी’ का एक अंश पढ़ना चाह रहे थे, जिसे एक पत्रिका ने छापा है। इसमें 31 अगस्त 2020 की रात का ब्योरा है, जब चीनी टैंक भारतीय सीमा की ओर बढ़ रहे थे और जनरल नरवणे के बार बार फोन करने के बावजूद कई घंटों तक रक्षा मंत्री, विदेश मंत्री, राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार और सीडीएस की ओर से जवाब नहीं मिला था। राहुल का दावा है कि इससे 56 इंच की छाती की पोल खुलती है। राहुल ने यह मुद्दा उठाया तो साथ ही एपस्टीन फाइल्स और अडानी के खिलाफ मुकदमे का मुद्दा उठा कर यह भी कहा कि इनकी वजह से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अमेरिका के सामने झुके हैं और समझौता किया है। यह ऐसी बात है, जो विपक्ष का दूसरा नेता कहने की हिम्मत नहीं कर पा रहा है। तभी सब राहुल के पीछे खड़े हो गए। सदन के अंदर कमाल की एकजुटता दिखी, जब राहुल की जगह बोलने के लिए स्पीकर ने दूसरे सांसदों को आवाज दी तो तीन विपक्षी पार्टियों के सांसदों ने बोलने से इनकार कर दिया। उन्होंने यह मैसेज दिया कि उनकी ओर से भी राहुल गांधी को बोलने का वक्त दिया जाए। यह बहुत दुर्लभ एकजुटता है तो इस सत्र में दिख रही है।


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