सांसद, विधायक बढ़ाने से क्या बदल जाएगा?

Categorized as अजित द्विवेदी कालम

इसमें कोई संदेह नहीं है कि संसद में नारी शक्ति वंदन कानून, 2023 में संशोधन का जो विधेयक लाया गया था वह महिला आरक्षण के आवरण में लोकसभा और राज्यों की विधानसभाओं में सीटें बढ़ाने का प्रयास था। इसमें भी कोई संदेह नहीं है कि आने वाले दिनों में सीटें बढ़ेंगी क्योंकि 2023 का कानून लागू हो गया है। सरकार अगर जनगणना और परिसीमन की प्रक्रिया को फास्ट ट्रैक करती है तो 2029 में ही सीटें बढ़ जाएगी और महिला आरक्षण लागू हो जाएगा अन्यथा थोड़े समय और इंतजार करना होगा। लोकसभा और विधानसभाओं में सीटें बढ़ाना इसलिए जरूरी है क्योंकि उसके बगैर किसी भी पार्टी के पुरुष सांसद महिला आरक्षण के लिए तैयार नहीं होंगे।

सबको अपनी सीट गंवा देने का खतरा दिखता है। अगर सीटें बढ़ा कर उसे महिलाओं के लिए आरक्षित किया जाता है तो किसी को कोई समस्या नहीं होगी। इसके अलावा सांसदों और विधायकों की संख्या बढ़ाने का कोई और तर्क समझ में नहीं आता है। संख्या इसलिए बढ़ाई जाएगी ताकि पुरुष सांसदों को अपनी सीट नहीं छोड़नी पड़े।

इस मुख्य उद्देश्य को छिपाने के लिए कई तरह के तर्क दिए जा रहे हैं। जैसे एक तर्क यह है कि जनसंख्या बढ़ी है इसलिए सांसदों और विधायकों की संख्या बढ़ाने की जरुरत है। यह बहुत बिना मतलब का तर्क है। कहा जा रहा है कि देश में एक एक लोकसभा 25 लाख, 30 लाख या उससे भी ज्यादा मतदाताओं की हो गई है। यानी कई जगह का सांसद 30 लाख मतदाताओं का प्रतिनिधि होता है। इस आधार पर दावा किया जाता है कि उस क्षेत्र का प्रतिनिधित्व ठीक से नहीं हो पाता है। तर्क दिया जाता है कि एक सांसद इतने मतदाताओं का ध्यान कैसे रख पाएगा। अब सवाल है कि क्या उस 30 लाख को घटा कर 20 लाख कर देंगे तो क्या सांसद उतने लोगों का ठीक से ध्यान रख पाएगा?

15 लाख भी कर दें तो क्या सांसद इतना सक्षम होगा कि वह इतने लोगों से मिल सके, उनकी समस्या सुन सके और उनका समाधान कर सके? जाहिर है संख्या का इसमें कोई लेना देना नहीं है। लोकसभा क्षेत्र चाहे 10 लाख का हो या 30 लाख का कोई सांसद पांच या 10 हजार से ज्यादा लोगों से नहीं मिल पाता है। वैसे उसका काम भी यह नहीं है कि वह हर मतदाता से मिले और निजी तौर पर उसकी समस्या का निराकऱण करे।

सांसद या विधायक का काम नया विधान बनाने का है। उसे विधायी कार्य करने होते हैं। एक सांसद भले एक लोकसभा क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करता है लेकिन जब वह लोकसभा में बैठता है तो वहां उसकी जिम्मेदारी देश के 140 करोड़ लोगों की होती है। वह कानून बनाने की प्रक्रिया का हिस्सा होता है। उसके वोट से बना कानून देश के हर नागरिक पर लागू होता है। वह हर नागरिक की किस्मत तय करता है। नागरिकों का रोजमर्रा का काम करने के लिए संविधान के जरिए कार्यपालिका की व्यवस्था की गई है। कार्यपालिका के ऊपर विधायिका द्वारा बनाए गए कानूनों को लागू करने की जिम्मेदारी होती है। अगर संसद या विधानसभाएं अच्छे कानून बनाएंगी और कार्यपालिका उसका बेहतर ढंग से क्रियान्वयन करेगा तो नागरिकों की समस्याएं दूर होंगी।

इसलिए संसद में या राज्यों की विधानसभाओं में बनने वाले कानूनों की गुणवत्ता कैसे सुधरे इस पर काम करने की जरुरत है। संसद में या विधानसभाओं में बहस और चर्चा की गुणवत्ता कैसे सुधरे इस पर काम करने की जरुरत है। फिर उन कानूनों पर बेहतर ढंग से अमल कैसे हो इसकी व्यवस्था बनानी होगी। सांसदों या विधायकों की संख्या बढ़ाने से कुछ नहीं बदलेगा।

अगर किसी सांसद के निर्वाचन क्षेत्र में पानी की समस्या है या बिजली की समस्या है या गंदे नाले की समस्या है तो इसका निराकरण स्थानीय प्रशासन को करना है। कानून व्यवस्था की समस्या है तो उसे पुलिस ठीक करेगी, सांसद नहीं। इसलिए जरूरी है कि आबादी बढ़ी है तो उसके अनुपात में थानों की संख्या बढ़ाई जाए, पुलिसकर्मियों की संख्या बढ़ाई जाए और उन्हें बेहतर प्रशिक्षण दिया जाए, नागरिक सेवाएं संभालने वाले कर्मचारियों और अधिकारियों की संख्या बढ़ाई जाए ताकि नागरिकों की समस्या को सुलझाया जा सकता है।

आबादी बढ़ी है तो स्कूलों और शिक्षकों की संख्या बढ़ाई जानी चाहिए। आबादी बढ़ी है तो अस्पतालों और डॉक्टरों की संख्या बढ़ाई जानी चाहिए। आबादी बढ़ी है तो नागरिक सुविधाओं का विकास किया जाना चाहिए। आबादी बढ़ी है तो बुनियादी ढांचे का विकास करना चाहिए। हालांकि ऐसा नहीं है कि इस दिशा में काम नहीं हो रहा है लेकिन जिस अनुपात में आबादी बढ़ी है उस अनुपात में नहीं हो रहा है। इस हकीकत से भी कोई इनकार नहीं कर सकता है कि नागरिक सेवाओं की गुणवत्ता लगातार बिगड़ती जा रही है।

ध्यान रहे सांसदों और विधायकों को कार्यकारी भूमिका नहीं निभानी है। वे अपनी सांसद या विधायक निधि छोड़ कर दूसरा कोई भी आवंटित बजट खर्च करने के लिए अधिकृत नहीं होते हैं। अगर उनके क्षेत्र के किसी मतदाता को आवास प्रमाणपत्र, जन्म प्रमाणपत्र, आय प्रमाणपत्र या जाति प्रमाणपत्र बनाना है तो यह सरकारी कार्यालय में बनेगा। अगर इसके लिए लोगों को सांसद या विधायक के यहां चक्कर काटने पड़े तो यह कार्यपालिका की विफलता है। सांसदों या विघायकों की संख्या बढ़ा देने से यह समस्या दूर नहीं होगी। ऐसे ही अगर नागरिक को एफआईआर दर्ज कराने के लिए या गलत तरीके से दर्ज एफआईआर से मुक्ति के लिए विधायक या सांसद के यहां चक्कर काटना पड़े तो यह पुलिस प्रशासन और देश की अपराध न्याय प्रणाली की विफलता है। सांसद या विधायक की संख्या बढ़ा देने से इस समस्या का भी समाधान नहीं होना है।

इसलिए परिसीमन की पूरी बहस एक ‘मिसप्लेस्ड प्रायोरिटी’ की तरह है। इसे ‘बार्किंग ऑन द रॉन्ग ट्री’ भी कह सकते हैं। इससे देश की मौजूदा विधायी या कार्यकारी व्यवस्था में कोई गुणात्मक परिवर्तन नहीं आएगा। उलटे उत्तर और दक्षिण भारत का विभाजन और गहरा होगा। राजनीति शास्त्र के विद्यार्थी जानते हैं कि अमेरिकी सीनेट दुनिया का सबसे शक्तिशाली उच्च सदन है। वहां सिर्फ अमेरिका के 33 करोड़ लोगों का नहीं, बल्कि दुनिया के आठ सौ करोड़ लोगों की किस्मत से जुड़े फैसले होते हैं। लेकिन सीनेट में सिर्फ एक सौ सांसद हैं। अमेरिका में 50 राज्य हैं और हर राज्य से दो दो सीनेटर चुने जाते हैं। सबसे बड़े राज्य से भी दो और सबसे छोटे राज्य से भी दो।

वहां कभी इस बात की बहस नहीं हुई कि ज्यादा आबादी वाले राज्य का ज्यादा प्रतिनिधि हो। कैलिफोर्निया सबसे बड़ा राज्य है लेकिन दो ही सीनेटर पूरे राज्य के हित का ध्यान रखते हैं। बाकी जनता के कामकाज का निपटारा करने के लिए स्थानीय निकाय की व्यवस्था है, जिसके कर्मचारी और अधिकारी जनता के रोजमर्रा के कामकाज का निपटारा करते हैं। इसलिए भारत में भी आबादी के आधार पर या भौगोलिक क्षेत्र के आधार पर सांसदों व विधायकों की संख्या बढ़ाने की बातों से नागरिकों का कोई खास भला नहीं होने वाला है। हां, कुछ और लोगों को सांसद या विधायक बनने का मौका मिल जाएगा। अगर सीटें बढ़ा कर महिलाओं को आरक्षण दे दिया तो विधायिका में कुछ महिलाओं की संख्या भी बढ़ जाएगी। लेकिन जमीनी स्तर पर इससे कुछ भी नहीं बदलेगा।


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