तार्किक विसंगति के दावे तर्कसंगत नहीं हैं

Categorized as अजित द्विवेदी कालम

चुनाव आयोग ने तार्किक विसंगति के नाम पर पश्चिम बंगाल में 27 लाख 10 हजार लोगों के नाम मतदाता सूची से हटा दिए। इन मतदाताओं की आपत्तियों पर सुनवाई के लिए सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर 19 न्यायाधिकरण बनाए गए हैं। ये सभी न्यायाधिकरण कोलकाता के डॉक्टर श्यामा प्रसाद मुखर्जी इंस्टीट्यूट ऑफ वाटर एंड सैनिटेशन से काम कर रहे हैं। यह कोलकाता के जोका इलाके में स्थित है। एक रिपोर्ट के मुताबिक इस इंस्टीट्यूट के बाहर ऐसी सख्त पहरेदारी है, जैसी अमेरिका को फोर्ट नॉक्स में नहीं होगी, जहां उसका सोने का भंडार रखा हुआ है।

इंस्टीट्यूट के बाहर कई लेयर की केंद्रीय सुरक्षा तैनात है, पुलिस भी है और कई लेयर की बैरिकेडिंग है। अंग्रेजी के प्रतिष्ठित अखबार ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ की 22 अप्रैल की रिपोर्ट में कहा गया है कि 21 अप्रैल को जिस दिन पहले चरण के मतदान के लिए प्रचार बंद होना था और पहले चरण की मतदाता सूची फ्रीज होनी थी उस दिन सुबह साढ़े 10 बजे न्यायाधिकरण के जज इंस्टीट्यूट के अंदर गए और उसके बाद किसी को भी अंदर नहीं जाने दिया गया।

रिपोर्ट के मुताबिक, ‘राम प्रसाद बिस्वास, रूपा सेन, सुखदेब सरकार, हसन खान, अनवरा बेगम, चंदन पुरकायस्थ और सबिदुल मुल्ला वहां से खाली हाथ लौटे, उन्हें कोई जवाब नहीं मिला’। ये सब लोग अपने दस्तावेज लेकर न्यायाधिकरण के सामने अपना पक्ष रखने पहुंचे थे। सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि 21 अप्रैल तक जिन लोगों के नाम न्यायाधिकरण से मंजूर कर लिए जाएंगे, चुनाव आयोग उन्हें मतदाता सूची में शामिल करेगा। तभी लोग आखिरी प्रयास के लिए पहुंचे थे। इनमें कई लोग ऐसे हैं, जिनके परिवार के दूसरे सदस्यों के नाम मतदाता सूची में शामिल कर लिए गए हैं।

कई लोग ऐसे हैं, जिनके नाम 2002 की मतदाता सूची में थे और उस समय हुए एसआईआर के बाद भी उनके नाम मतदाता सूची में बने रहे थे। क्या यह बात तार्किक लगती है कि जिनके नाम पिछली एसआईआर के समय मतदाता सूची में थे, जिनके नाम की मैपिंग हो चुकी थी, जिनके पास पासपोर्ट सहित दूसरे दस्तावेज मौजूद हैं और जिनके परिवार के दूसरे सदस्यों के नाम सूची में शामिल कर दिए गए हैं, उनका नाम काट दिया जाए? यह कितनी अतार्किक बात है, लेकिन तार्किक विसंगति के नाम पर ऐसा किया गया है।

चुनाव आयोग ने अपनी तरफ से तो 60 लाख से ज्यादा लोगों के नाम तार्किक विसंगति के आधार पर काट दिया था। उन्हें विवेचनाधीन श्रेणी में रखा गया था। 16 मार्च को पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव की घोषणा करते हुए मुख्य चुनाव आयुक्त ने बताया था कि पश्चिम बंगाल में सिर्फ छह करोड़ 44 लाख मतदाता हैं। उसने 60 लाख लोगों को इसमें नहीं जोड़ा था। अगर सुप्रीम कोर्ट ने दखल देकर सात सौ से ज्यादा न्यायिक अधिकारियों की नियुक्ति नहीं कराई होती तो आयोग ने 60 लाख लोगों को मताधिकार से वंचित कर दिया था।

न्यायिक अधिकारियों की जांच के बाद 33 लाख लोगों के नाम को मंजूरी दी गई और उन्हें मतदाता सूची में शामिल किया गया। अगर सुप्रीम कोर्ट दखल नहीं देता तो ये 33 लाख लोग वोट नहीं डाल पाते। सवाल है कि क्या संसाधन की कमी के आधार पर चुनाव आयोग को इतनी बड़ी संख्या में लोगों के नाम काटने की इजाजत दी जा सकती है? इसी तरह सुप्रीम कोर्ट ने बचे हुए 27 लाख लोगों के दस्तावेज जांचने के लिए भी न्यायाधिकरण बनाया। लेकिन गिनती के लोगों को ही वहां से राहत मिल पाई।

ऐसा लग रहा है, जैसे चुनाव आयोग ने तय किया हुआ था कि ज्यादा से ज्यादा लोगों के नाम काटने हैं। उसकी मंशा ज्यादा से ज्यादा लोगों को मतदाता सूची में शामिल करने की बजाय उनके नाम हटाने की थी। इसलिए उसने पहले सवा करोड़ लोगों को तार्किक विसंगति का नोटिस दिया। फिर उसमें से 60 लाख लोगों को विवेचनाधीन श्रेणी में रखा और अंत में 27 लाख लोगों के नाम काट दिए।

उसने सुनिश्चित किया कि इन लोगों के नाम मतदाता सूची में नहीं शामिल हो सके। इसके लिए सारे प्रयास किए गए। कई दिनों तक यह कंफ्यूजन बना रहा कि ये 27 लाख लोग कैसे आपत्ति दर्ज कराएंगे? क्या सिर्फ ऑनलाइन आपत्ति दर्ज होगी या कहीं पर ऑफलाइन आपत्ति भी दर्ज कराई जा सकती है? लोग कलेक्टर ऑफिस से लेकर चुनाव आयोग के कार्यालय तक धक्के खाते रहे।

यह कंफ्यूजन भी बना रहा कि इनकी आपत्तियों पर कैसे सुनवाई होगी, क्या वकील पेश होंगे या मतदाता को खुद ही अपनी बात रखनी होगी? सुनवाई की जगह तक लोग कैसे पहुंचेंगे? यह सब कंफ्यूजन आखिरी समय तक बना रहा। कहां तो चुनाव आयोग का काम लोगों को प्रोत्साहित करके और उन्हें सुविधाएं उपलब्ध करा कर मतदाता सूची में उनका नाम शामिल कराने का है तो कहां चुनाव आयोग ने ऐसे सारे उपाय किए, जिनसे ये लोग अपना नाम नहीं शामिल करा पाएं।

तार्किक विसंगति की अतार्किकता सिर्फ इतनी नहीं है। असल में चुनाव आयोग जिसे तार्किक विसंगति कह रहा है उसमें से ज्यादातर को सामान्य बोलचाल की भाषा में टाइपिंग की गलती यानी ‘टाइपो’ कहते हैं। किसी व्यक्ति की उम्र और उसके पिता की उम्र में अगर 15 साल से कम का अंतर है तो इसे चुनाव आयोग तार्किक विसंगति मानता है। बिल्कुल यह तार्किक विसंगति है। लेकिन आमतौर पर ऐसा टाइपिंग की गलती से होता है।

कई बार ऐसे नाम मतदाता सूची में मिल जाएंगे, जिसमें बेटे की उम्र उसके पिता के उम्र से ज्यादा लिखी गई होगी। यह टाइपिंग की गलती है, जिसे व्यक्ति के किसी एक दस्तावेज के जरिए ठीक किया जा सकता है। किसी पुरुष के आगे लिंग महिला लिखा गया होगा तो इसे तार्किक विसंगति माना जाएगा लेकिन यह असल में टाइपिंग की गलती होती है। किसी महिला के नाम के आगे पुरुष की फोटो लगी होगी तो यह तकनीकी गलती है। अगर किसी व्यक्ति नाम और उसकी ओर से जमा किए गए दस्तावेज में दर्ज नाम की स्पेलिंग में अंतर है तो यह तार्किक विसंगति नहीं है, बल्कि टाइपिंग की गलती है। अगर ऐसी टाइपिंग की गलतियों पर मतदाताओं के नाम कटते हैं तो इससे ज्यादा अतार्किकता क्या हो सकती है?

चुनाव आय़ोग ने असल में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के जरिए तार्किक विसंगति तय की। उसने दिशानिर्देश बनाया कि अगर एक व्यक्ति के छह या उससे ज्यादा बच्चे होंगे तो उसको तार्किक विसंगति के आधार पर नोटिस भेजेंगे। सबको पता है कि ‘बेबी बूमर’ जो पीढ़ी थी उसमें शायद ही कोई परिवार होगा, जिसमें छह, सात या उससे ज्यादा भाई बहन नहीं हों। लेकिन मशीन ने छह या उससे ज्यादा लोगों के नाम के आगे पिता का एक जैसा नाम देखा तो नोटिस भेज दिया और उसके बाद लोग दस्तावेज लेकर भटकते रहे।

किसी मतदाता का उपनाम उसके पिता के उपनाम से अलग है तो उसे तार्किक विसंगति माना जा रहा था। सोचें, पश्चिम बंगाल में कितने उपनाम बदले हैं। जो लोग पहले गंगोपाध्याय थे वे गांगुली हो गई, जो मुखोपाध्याय थे वे मुखर्जी, बंदोपाध्याय बनर्जी और चटोपाध्याय चटर्जी हो गए। इसी तरह ठाकुर लोग टैगोर हो गए। कहीं बिस्वास की स्पेलिंग में अंतर है तो कहीं दत्ता की स्पेलिंग में अंतर है। क्या ऐसे बदले हुए उपनाम के आधार पर किसी का नाम काटा जा सकता है?

कुल मिला कर लब्बोलुआब यह है कि चुनाव आयोग ने मतदाता सूची की सफाई के नाम पर नाम काटने का अभियान चलाया, जिसकी अंत परिणति यह है कि तकनीकी व प्रशासनिक विफलता के कारण लाखों लोग वोट डालने से वंचित रह गए। इसकी वजह से चुनाव के बाद नई समस्याएं खड़ी होंगी। सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि अगर जीत हार का अंतर दो फीसदी रहता है और नाम 15 फीसदी कटे हैं तो उसकी नजर इस पर रहेगी। इसका अर्थ है कि कम अंतर से हारने वाले लोग नाम काटे जाने को हार का कारण बता कर नतीजे को अदालत में चुनौती देंगे।


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