भाजपा और बंगाल की चारित्रिक भिन्नता

Categorized as अजित द्विवेदी कालम

पश्चिम बंगाल में पहले चरण का मतदान हो गया है और इस चरण के प्रचार में या दूसरे चरण में होने वाले मतदान के लिए चल रहे प्रचार में भाजपा को लगातार सफाई देनी पड़ रही है। ऐसा लग रहा है कि भाजपा के पूरे चुनाव अभियान में कोई बहुत बुनियादी चीज मिसिंग है, जिसकी वजह से उसको इतनी सफाई देनी पड़ रही है। इसमें दो मुद्दे ऐसे हैं, जिन्होंने खासतौर से ध्यान खींचा है। पहला मुद्दा है बंगाली मुख्यमंत्री का और दूसरा है बांग्ला संस्कृति का, जिसमें भाषा-बोली से लेकर पहनावा और खान-पान सब शामिल हैं।

इन दो मुद्दों पर भाजपा को बहुत सफाई देनी पड़ी है। अपनी भाषा और संस्कृति के प्रति अतिशय आसक्ति वाले प्रदेश में अगर सत्तारूढ़ दल को चुनौती दे रही पार्टी को ऐसे मुद्दों पर सफाई देनी पड़ रही है तो समझ में आता है कि उसके पूरे अभियान में कहां कमी रह गई है।

पहले चरण के मतदान से ठीक पहले भाजपा के चुनाव अभियान की कमान संभाल रहे केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने बंगाल के लोगों को गारंटी देते हुए कहा कि चुनाव के बाद कोई ऐसा व्यक्ति राज्य का मुख्यमंत्री बनेगा, जो बंगाल में जन्मा होगा, बंगाल में पढ़ा लिखा होगा और बांग्ला बोलता होगा। दूसरी सफाई खान पान से जुड़ी है। भाजपा के बड़े नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री अनुराग ठाकुर को मंगलवार के दिन मछली खाने की वीडियो साझा करनी पड़ी।

हिमंत बिस्वा सरमा को कहना पड़ा कि वे ममता बनर्जी से ज्यादा मांस खा सकते हैं। भाजपा के कई उम्मीदवार हाथ में मछली लेकर प्रचार करते दिखे। सो, कोई बंगाली मुख्यमंत्री होगा और मांसाहार पर कोई रोक नहीं लगेगी, भाजपा की ओर से यह गारंटी देने की मजबूरी यह दिखाती है कि बुनियादी स्तर पर पश्चिम बंगाल के साथ उसका कनेक्ट कमजोर है।

सोचें, भारतीय जनता पार्टी को जमीनी स्तर से क्या फीडबैक मिली होगी, जो ऐसी सफाई देनी पड़ी? यह भी सवाल है कि भाजपा के प्रति बंगाल के लोगों में कितना अविश्वास है, जो इस तरह का भरोसा दिलाना पड़ रहा है? इस तरह का भरोसा किसी दूसरे राज्य में तो दिलाने की जरुरत नहीं पड़ती है। गुजरात में गुजराती मुख्यमंत्री बनेगा या महाराष्ट्र में मराठी बनेगा यह कहने की जरुरत नहीं पड़ती है। हिंदी पट्टी के राज्यों में भी यह कहना नहीं पड़ता है कि उसी राज्य का व्यक्ति मुख्यमंत्री बनेगा। एकाध अपवाद हो सकते हैं, जब किसी दूसरे राज्य में जन्मा और किसी अन्य राज्य में रहने वाला व्यक्ति किसी अन्य राज्य का मुख्यमंत्री बन जाए। दिल्ली ऐसा ही एक अपवाद है, जहां हरियाणा में जन्मे और उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद में रह रहे अरविंद केजरीवाल मुख्यमंत्री बन गए थे। लेकिन दिल्ली देश की राजधानी है।

अगर मोटे तौर पर या सतही तौर पर देखेंगे तो ऐसा लगेगा कि चूंकि ममता बनर्जी ने बाहरी और भीतरी का चुनाव बना दिया है इसलिए भाजपा को ऐसी सफाई देनी पड़ी है। लेकिन बारीकी से देखेंगे तो इसके व्यापक संदर्भ दिखाई देंगे। असल में यह मामला भाजपा और पश्चिम बंगाल के मूल चरित्र की भिन्नता का है। भारतीय जनता पार्टी हिंदुत्व की जिस धारा की राजनीति करती है, पश्चिम बंगाल का हिंदुत्व उससे कुछ अलग है। बंगाल में हिंदू धर्म की विविधता हर रंग में मौजूद है, जबकि भाजपा का हिंदुत्व एकरूपता वाला है। राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ और भाजपा दोनों का हिंदुत्व प्रोजेक्ट देश को वैष्णव बनाने वाला है, जबकि पश्चिम बंगाल शक्ति की पूजा करने वाला राज्य है। भाजपा प्रोजेक्ट हिंदुत्व के तहत पूरे देश को शाकाहारी बनाने के प्रयास में लगी है तो पश्चिम बंगाल हर धार्मिक मौके पर भी मांसाहार को स्वीकार करने वाला राज्य है। भाजपा जय श्रीराम के नारे पर राजनीति करती है, जबकि बंगाल का मूल चरित्र जय मां काली या जय मां दुर्गा का है। चैतन्य महाप्रभु के असर में कृष्ण भक्ति भी है तो ठाकुरबाड़ियों की अलग कहानियां हैं। वहां वैष्णव भी हैं और सहज रूप से समाज में स्वीकार्य हैं। उन्हें भी शाक्त संप्रदाय के लोगों से समस्या नहीं है।

अगर राजनीतिक स्तर पर देखें तब भी कई बुनियादी अंतर दिखाई देंगे। जम्मू कश्मीर को छोड़ दें तो पश्चिम बंगाल दूसरी सबसे बड़ी मुस्लिम आबादी वाला राज्य है। इसके बावजूद हिंदू और मुस्लिम का विभाजन वैसा नहीं है, जैसा दूसरे राज्यों में है। पश्चिम बंगाल के हिंदुओं का एक बड़ा समूह, खास कर बांग्ला बोलने वाले हिंदुओं का बड़ा हिस्सा सांस्कृतिक रूप से अपने को बांग्ला बोलने वाले मुस्लिमों के ज्यादा नजदीक पाता है। तभी एक निश्चित सीमा से ज्यादा ध्रुवीकऱण नहीं हो पाता है। पिछले तीन चुनावों यानी दो लोकसभा और एक विधानसभा चुनाव में भाजपा को लगभग 40 प्रतिशत वोट मिले हैं। बंगाल में 70 फीसदी से कुछ ज्यादा हिंदू हैं।

अगर भाजपा को 40 फीसदी वोट मिलता है इसका अर्थ है कि उसे सौ में से 60 हिंदू वोट दे रहे हैं। उसे हिंदुओं का 10 फीसदी वोट और मिल जाए तो वह बड़ी जीत हासिल कर ले। लेकिन ऐसा नहीं हो पाता है तो कारण वह बांग्लाभाषी हिंदू है, जो सांस्कृतिक रूप से अपने को बांग्लाभाषी मुस्लिम के ज्यादा नजदीक पाता है। गैर बांग्लाभाषी हिंदुओं का बड़ा हिस्सा भाजपा का समर्थन करता है लेकिन बांग्लाभाषी हिंदुओं में यह समर्थन घट जाता है।

राजनीतिक स्तर पर एक दूसरी भिन्नता यह है कि पश्चिम बंगाल में जातीय समीकरण उस तरह से काम नहीं करता है, जैसे देश के दूसरे राज्यों में करता है। वहां नेता या भावी मुख्यमंत्री की जाति चुनाव नतीजों को किसी भी तरह से प्रभावित नहीं करती है। देश के दूसरे राज्यों के मुकाबले एक तीसरी भिन्नता यह है कि पारंपरिक रूप से पश्चिम बंगाल बाइनरी वाला राज्य है। वहां हर चीज दो की खांचे में बंटी है। वहां फुटबॉल क्लब भी दो ही हैं। पूरी आबादी मोहन बागान या ईस्ट बंगाल में बंटी है। ऐसे ही पार्टियां भी दो ही होती हैं। अगर तीसरी पार्टी या कोई तीसरा मोर्चा मजबूत होता तो मुस्लिम या दूसरे वोट का बंटवारा भाजपा को मदद पहुंचा सकता था।

वैचारिक स्तर पर भी इस बाइनरी का अस्तित्व है। इसलिए 40 फीसदी वोट हासिल करने के बावजूद भाजपा बंगाल में सहज रूप से फिट नहीं हो पा रही है। अगर वह चुनाव जीत जाए और उसका स्थानीय नेतृत्व मजबूत हो जाए तब संभव है कि वह बंगाल की राजनीति में रच बस जाए। लेकिन उससे पहले हकीकत यह है कि उसका चरित्र मूल बांग्ला चरित्र से मेल नहीं खाता है। यह उसकी सबसे बड़ी कमजोरी है। जब भाजपा इस कमजोरी से पार पा लेगी तभी वह बंगाल को और बंगाल उसे आत्मसात करेगा।


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