महिला आरक्षण पर इतनी राजनीति क्यों?

Categorized as अजित द्विवेदी कालम

दुनिया में पब्लिक रिलेशन यानी जनसंपर्क के पिता कहे जाने वाले एडवर्ड एल बर्नेस का मानना था कि अगर कोई नेता किसी सार्वजनिक कार्यक्रम में एक बच्चे का माथा चूमता है तो उससे पहले उसके पास चाइल्ड केयर की कोई अच्छी पॉलिसी तैयार होनी चाहिए। अन्यथा उसका एक्शन सिर्फ ऑप्टिक्स बन कर रह जाएगा। उसका कोई राजनीतिक लाभ नहीं होगा। अपनी किसी सैद्धांतिक पहल का राजनीतिक लाभ लेने के लिए जरूरी होता है कि उसके पीछे एक ठोस व्यावहारिक आधार हो। अगर इस बुनियादी और बेहद व्यावहारिक सिद्धांत के आधार पर देखें तो स्पष्ट दिखाई देगा कि महिलाओं को 33 फीसदी आरक्षण देने के नाम पर तीन दिन का जो तमाशा चला उसका कोई राजनीतिक लाभ भारतीय जनता पार्टी को नहीं होगा और इसका एकमात्र कारण यह होगा कि इस सैद्धांतिक पहल के पीछे सिर्फ बातें हैं, दिखावा है, ऑप्टिक्स है, कोई ठोस व्यावहारिक आधार नहीं है।

अगर एडवर्ड एल बर्नेस की बात को यहां व्यवहार रूप में इस्तेमाल करें तो कह सकते हैं कि प्रधानमंत्री मोदी अगर महिला आरक्षण को लेकर एक ऑप्टिक्स क्रिएट करना चाहते थे तो उनके पास पहले से यह आधार तैयार होना चाहिए था कि उन्होंने महिलाओं का प्रतिनिधित्व बढ़ाने के लिए अपनी पार्टी की ओर से बड़ी पहल की है। संसद का तीन दिन का विशेष सत्र 16 से 18 अप्रैल के बीच हुआ। लेकिन इसकी सूचना मार्च के आखिरी दिनों में ही आ गई थी। तभी पता चल गया था कि चार अप्रैल को संसद के बजट सत्र का सत्रावसान नहीं होगा। यह भी स्पष्ट हो गया था कि सरकार महिला आरक्षण लागू करने और परिसीमन के लिए बिल लाने वाली है। जिस समय यह खबर आई और बिल की तैयारी शुरू हुई उस समय तक पश्चिम बंगाल के चुनाव की घोषणा हो गई थी और टिकटों का बंटवारा हो रहा था। अगर उस समय प्रधानमंत्री मोदी ने पहल करके पश्चिम बंगाल की 294 सीटों में से एक सौ सीटें महिलाओं को दे दी होती और उसके बाद महिला आऱक्षण का बिल ले आते तो उसका गजब का असर होता।

उन्होंने ऐसा नहीं किया। पश्चिम बंगाल में भाजपा ने सिर्फ 32 महिला उम्मीदवार उतारे हैं। यह कुल सीटों का 11 फीसदी बनता है। सोचें, एक तरफ महिलाओं को 33 फीसदी आरक्षण जल्दी से जल्दी दिलाने का बिल तैयार हो रहा था और उसी समय भाजपा पश्चिम बंगाल की 294 सीटों में 32 महिला उम्मीदवार उतार रही थी। इसका अर्थ यह हुआ कि विपक्ष सहयोग करके परिसीमन और महिला आरक्षण बिल पास करा दे और सीटों की संख्या 850 हो जाए तब तो महिलाओं को 33 फीसदी सीट देंगे अन्यथा 11 फीसदी से ज्यादा नहीं देगे। सोचें, कानून बना कर जितनी सीटें देने का वादा कर रहे हैं, खुद से देना है तो उसका भी एक तिहाई देंगे! अगर आपका एक्शन ऐसा है तो आपका भाषण कैसा भी उस पर किसी को यकीन नहीं होगा। महात्मा गांधी कहते थे, ‘मेरा जीवन ही मेरा उपदेश है’। यह तय मानें कि देश के मतदाता, जिसमें महिलाएं भी शामिल हैं, आपकी बातों के साथ साथ आपके कार्यों पर भी नजर रखती है। आप जो कह रहे हैं उसका बिल्कुल उलटा कर रहे हैं तो ज्यादा समय तक यह स्थिति नहीं चलती है। इस मामले में कांग्रेस और लेफ्ट दोनों का रिकॉर्ड भी भाजपा से बेहतर नहीं है। लेकिन पश्चिम बंगाल में भाजपा का जिनसे मुकाबला है उनका रिकॉर्ड बहुत अच्छा है। ममता बनर्जी ने इस बार विधानसभा चुनाव में 55 सीटें यानी करीब 17 फीसदी सीटें महिलाओं को दी हैं और पिछले लोकसभा चुनाव में 40 फीसदी सीट महिलाओं को दी थी। लोकसभा में ममता बनर्जी के 29 सांसद हैं, जिनमें से 11 महिलाएं हैं। यानी एक तिहाई से ज्यादा महिला सांसद हैं। सो, कम से कम महिलाओं को राजनीतिक स्पेस और अधिकार देने के मामले में तो ममता बनर्जी बहुत आगे हैं। भाजपा के पास सिर्फ बातें हैं और तृणमूल कांग्रेस के पास दिखाने के लिए महिला प्रतिनिधित्व है।

एक और बहुत हैरान करने वाली बात यह है कि इस बार राजनीति बहुत हो रही है। खुद केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने संसद में बताया कि इससे पहले कितनी बार महिला आरक्षण विधेयक संसद के दोनों सदनों में लाया गया और कैसे हर बार विफल हो गया। इससे पहले संसद में इस मसले पर बहुत सार्थक बहस भी हुई है। शरद यादव के भाषण के अंश अब भी साझा किए जा रहे हैं। महिला आरक्षण पर नीतीश कुमार ने क्या कहा था यह भी साझा किया जा रहा है। संसद में कैसे महिला आरक्षण का बिल फाड़ा गया था उसकी भी चर्चा हो रही है। लेकिन इससे पहले कभी इतनी राजनीति नहीं हुई। सबको पता होता कि किस कारण से बिल पास नहीं हो सका। लेकिन इसका राजनीतिक लाभ लेने के लिए सड़क पर उतर कर प्रदर्शन नहीं होते थे। घर घर जाकर महिलाओं के बीच प्रचार नहीं होता था। सत्ता तंत्र का लाभ उठा कर विपक्ष को इस तरह से कठघरे में खड़ा नहीं किया जाता था। विपक्ष की ओर से भी सरकार पर ऐसे हमले नहीं होते थे।

इस बार गजब हो रहा है। 18 अप्रैल की रात पौने आठ बजे के करीब बिल पर वोटिंग हुई और इसे पास नहीं कराया जा सका। उसके 10 मिनट के अंदर संसद परिसर में एनडीए की महिला सांसदों का जुलूस निकल गया। रात में ही प्रधानमंत्री ने एनडीए की बैठक की। अगले दिन सुबह साढ़े 11 बजे कैबिनेट की बैठक हुई। उसके बाद से राज्यवार प्रदर्शन हो रहे हैं। एक गजब यह भी है कि भाजपा शासित राज्यों में विधानसभा का विशेष सत्र बुलाया जा रहा है ताकि इस मसले पर विपक्ष की निंदा की जा सके। यह सब किसलिए हो रहा है ताकि यह बताया जा सके कि प्रधानमंत्री मोदी महिलाओं को आरक्षण देना चाहते थे लेकिन विपक्ष ने नहीं होने दिया! सवाल है कि क्या विपक्ष प्रधानमंत्री मोदी को भाजपा से 33 फीसदी महिलाओं को टिकट देने से भी रोक देगा? प्रधानमंत्री को संकल्प करना चाहिए कि संशोधन पास नहीं हुआ तो कोई बात नहीं। मूल कानून तो लागू है। उसके मुताबिक काम करेंगे और महिलाओं के लिए 33 फीसदी आरक्षण लागू करेंगे। और जब तक कानून लागू नहीं होता है तब तक हर चुनाव में अपनी पार्टी से 33 फीसदी महिला उम्मीदवार उतारेंगे। अगर वे यह संकल्प जाहिर करते हैं तो अपने आप सारी पार्टियां 33 फीसदी आरक्षण महिलाओं को देंगी। अगर पार्टियां ऐसा करने लगें तो फिर कानून की जरुरत ही नहीं रह जाएगी।


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