राजीव से राहुल: कांग्रेस भूल गई हिंदू को पढ़ना

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राजीव गांधी का शासन पुराने ढर्रे की कांग्रेस के बुजुर्ग नेताओं के घेरे से नहीं हुआ। वे नई पीढ़ी ( अरूणसिंह, अरूण नेहरू, सतीश शर्मा दून स्कूल की मित्र मंडली) को लिए हुए थे। कंप्यूटर, टेलीकॉम, विज्ञान, आधुनिक प्रशासन और इक्कीसवीं सदी की बात करते थे। पुराने समाजवादी सत्ता-संसार से अलग दिखाई देते थे। युवा थे। नए थे। भारत को आधुनिक बनाने की बेचैनी थी। दलालों और बिचौलियों पर चोट करते थे। गांवों में जाकर गरीबी देखते थे। सोनिया गांधी के साथ झोपड़ियों के चेहरे देखते, बूझते थे। दिल्ली से भेजे सौ रुपये में गरीब तक पंद्रह रुपये पहुंचने की बात उन्होंने ही सार्वजनिक रूप से कही।

कांग्रेस (राहुल) की दीमक है लेफ्ट3

यानी समस्या राजीव गांधी की नीयत में नहीं थी।

समस्या यह थी कि आधुनिक भारत बनाने निकले राजीव गांधी के पास असल भारत की धडकन धर्म, जाति, समुदाय और सामाजिक स्मृतियों को समझने का अपना राजनीतिक विवेक, दर्शन नहीं था।

सो धीरे-धीरे पुराने लेफ्ट-सेकुलर, प्रगतिशील अर्जुन सिंह, मणिशंकर अय्यर, गोपी अरोड़ा, आर. के. मिश्रा, और दिल्ली के सेकुलर-प्रगतिशील सत्ता-बौद्धिक संसार का प्रभाव बढ़ा। पुराने खांटी कांग्रेसी नेताओं और जमीन से राजनीति बूझने वालों की जगह सत्ता के नए चेहरे आए। राजीव की अपनी सहज भाषा कंप्यूटर और इक्कीसवीं सदी थी; धर्म, जाति, अल्पसंख्यक और बहुसंख्यक के प्रश्नों पर वे अलग-अलग सलाहों और दबावों के बीच झूलते थे। एक तरफ अरूण नेहरू ने उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री वीरबहादुरसिंह, अदालत-प्रशासन से अयोध्या में रामजन्मभूमि का ताला खुलवा दिया वही वीपीसिंह ने बतौर वित्त मंत्री ने उदयोगपतियों पर छापों का वह खौफ बनाया जिसने धीरे-धीरे राजीव गांधी की जगह वीपीसिंह की उजली इमेज की बवा बनाई। प्रधानमंत्री को ही कटघरे में ला खड़ा किया।

और राजमजन्मभूमि की बाबरी मसजिद के केंद्र में ऱखी तालाबंद मूर्तियों के ताला खुलने से वामपंथी मुस्लिम नेताओं का भौकाल थमता उससे पहले ही सुप्रीमकोर्ट में एक मुस्लिम महिला शाहबानो का मामला सामने आ गया। एक तलाकशुदा महिला के गुजारा-भत्ते का केस। सुप्रीम कोर्ट का महिला के पक्ष में फैसला। सरकार को सुधार करने का आदेश इस सपाट सवाल के साथ कि आधुनिक भारत में अंतिम कसौटी व्यक्ति के नागरिक अधिकार होंगे या समुदाय की धार्मिक स्वायत्तता?

यह सवाल अचानक पैदा नहीं हुआ था।

स्वतंत्रता के तुरंत बाद नेहरू सरकार ने हिंदू समाज के विवाह, उत्तराधिकार और पारिवारिक कानूनों में हस्तक्षेप किया था। हिंदू कोड से जुड़े अलग-अलग कानून बने। हिंदू समाज में स्त्री के अधिकार और पारिवारिक संबंध बदले गए। यह सुधार जरूरी था। विधवा, बेटी, पत्नी, विवाह, तलाक और उत्तराधिकार में आधुनिक कानून की आवश्यकता से आखिर कोई इनकार नहीं कर सकता। हिंदूओं ने उसे स्वीकार किया। वह अमल में आया।

मतलब सरकार में सामाजिक सुधार का साहस बहुसंख्यक के लिए वही धार्मिक स्वायत्तता की सावधानी अल्पसंख्यक के लिए! आखिर क्यों?

यदि स्त्री की बराबरी आधुनिक भारत का मूल्य है तो हिंदू स्त्री और मुस्लिम स्त्री के लिए उसकी कसौटी अलग कैसे हो सकती है? यदि संविधान अंततः व्यक्ति को नागरिक मानता है तो राजनीति उसे बार-बार धार्मिक समुदाय का सदस्य बनाकर क्यों देखे?

यहीं स्वतंत्र भारत के सेकुलर राज्य का वह अंतर्विरोध बना जिसका राजनीतिक हिसाब कई दशक बाद खुला। और राजनीति में मोड आया।

वामपंथी और उसके प्रभाव के नेहरू आईडिया ऑफ इंडिया से पले-पोष-बड़े हुए स्वतंत्र भारत के राष्ट्रीय-लुटियन मीडिया ने मुस्लिम पर्सनल लॉ को जस का तस रखने, मुस्लिम भावना की चिंता करने की आवश्यकता का भौकाल बनाया। राजीव गांघी घबराए। सरकार ने 1986 में कानून बनाया और सुप्रीम कोर्ट के फैसले, उसके कहे को खारिज किया। और लुटियन दिल्ली के बाहर का हिंदू दिल-दिमाग में ऐसा खदबदाया कि जहां धर्मनिरपेक्षता ने तुष्टीकरण का अर्थ पाया। भाजपा और संघ परिवार के दिन फिरने शुरू हुए।

लोकमानस में संदेश सरल था— सरकार हिंदू समाज पर हथौड़ा चला सकती है, वही मुस्लिम रूढ़िवाद को छूने में डरती है। धारणा पूरी हो या अधूरी, राजनीति में संघ-भाजपा का तुष्टीकरण शब्द सेलुकर शब्दावली को खाने लगा।

वह शब्द अगले चार दशकों की राजनीति का ब्रह्मास्त्र बना।

और आज भी, राहुल गांधी की कांग्रेस, कथित प्रगतिशील उसका संतोषजनक जवाब हिंदूमानस को  नहीं दे पाई।

राजीव गांधी और उनके मणिशंकर अय्यर, अर्जुनसिंह, गोपी अरोड़ा, अमिताभ बच्चन, डीपी त्रिपाठी, बूटासिंह ने तब शायद माना था कि एक तरफ झुके संतुलन को दूसरी तरफ से साधा जा सकता है। हिंदुओं के लिए अयोध्या में ताला खुला है। दूरदर्शन पर भारत खोच, रामायाण, महाभारत दिखा रहे है तो सरकार की सर्वधर्म समधाव इमेज खिलेगी। तभी अरूण नेहरू, वीपीसिंह जैसे मंत्रियों के अलग होने के बावजूद राममंदिर के शिलान्यास की विश्वहिंदू परिषद् को अनुमति दी गई। इतना ही नहीं 1989 के राजीव गांधी ने लोकसभा चुनाव अभियान की शुरुआत भी अयोध्या के निकट फैजाबाद से की। उसमें रामराज्य की बात थी। यानी एक तरफ मुस्लिम धार्मिक नेतृत्व को संतुष्ट करने की कोशिश, दूसरी तरफ हिंदू भावना को साधने की कोशिश।

कांग्रेस ने इसे संतुलन समझा। पर इस सबसे हिंदू और मुसलमान दोनों भावनाओं के बहे। राजीव गांधी, कांग्रेस दोनों की निगाह में उतरे। हिंदू और मुसलमान दोनों में कांग्रेस का ग्राफ डाउन हुआ। यही राजीव गांधी की राजनीतिक त्रासदी थी। वे भारत को आधुनिक बनाना चाहते थे, लेकिन आधुनिकता को भारतीय समाज की अपनी जटिलताओं में उतारने की खुद की स्वतंत्र राजनीतिक दृष्टि नहीं बना सके। तभी शाहबानो में एक संदेश गया, अयोध्या में दूसरा। न आधुनिक नागरिकता की एक समान कसौटी बनी, न गांधी की वह पुरानी सभ्यतागत सहजता बची जिसमें अपने धर्म में खड़े होकर दूसरे धर्म से बराबरी का रिश्ता संभव था। वजह फिर वही लेफ्ट की खमीर। वामपंथी दिमागों की हवाबाजी। सरकार के आखिर में मणिशंकर अय्यर ने पंचायती राज कानून पास करला कर हवा बनाई  कि अब असली भारत, भारत के गांव-कस्बे झूमते हुए राजीव गांधी के तराने गाएंगे। वैसा ही ख्याली पुलाव था जैसा 2014 से ठिक पहले मनरेगा से ले कर रेहडी-थेला लगाने वालों को अधिकार देने के कानून बना कर अहमद पटेल, सोनिया गांधी, राहुल गांधी. चिंदबर, सुशीलकुमार शिंदे और दिल्ली का पूरा लेफ्ट, मीडिया मानता था कि नरेंद्र मोदी का प्रधानमंत्री पद तक पहुंचना संभव ही नहीं है। और दिल्ली के तालकटोरा स्टेडियम में कांग्रेस सम्मेलन में प्रगतिशील बौद्धिकों के गुरू (जैसे आज राहुल गांधी के लिए जयराम रमेश!) मणिसंकर अय्यर ने सत्ता के अंहकार में हुंकारा मारा था- “I promise you in 21st Century Narendra Modi will never become the Prime Minister of the country… But if he wants to distribute tea here, we will find a place for him.” (वे यहां आकर चाय बेच सकते है प्रधानमंत्री कतई नहीं बन सकते)

जाहिर है राजीव गांधी के 1989 से 2014 में सोनिया गांधी और 2026 में राहुल गांधी से लगातार साबित होता हुआ है कि भारत के समाज को पढ़ने की अपनी मौलिक पुरानी क्षमता (मोतीलाल नेहरू से गांधी और कुछ हद तक जवाहरलाल नेहरू की भी) लगातार खोते हुए है।

सोचे, वजह कौन? क्या थी कांग्रेस की ऐतिहासिक ताकत?

क्या यह कि वह भारत की सबसे कुशल जातीय प्रबंधक पार्टी थी?

नहीं।

यह कि वह मुसलमानों की पार्टी थी?

नहीं।

यह कि वह हिंदुओं की पार्टी थी?

वह भी नहीं।

उसकी ताकत ठीक उलटी थी। ब्राह्मण उसमें था और दलित भी। मुसलमान था और हिंदू भी। व्यापारी था, किसान था, आदिवासी था, मजदूर था। हर आदमी अपनी पहचान लेकर कांग्रेस में आता था, लेकिन कांग्रेस का काम उसकी पहचान को और छोटा करना नहीं, उसे एक बड़े राष्ट्रीय छाते में जोड़ना था।

कांग्रेस हिस्से गिनने वाली पार्टी नहीं थी। हिस्सों को जोड़कर पूरा बनाने वाली पार्टी थी।

गांधी इसका सबसे बड़ा उदाहरण थे। वे घोषित आस्थावान हिंदू थे। रामराज्य कहते थे। गीता पढ़ते थे। प्रार्थना करते थे। मगर उनकी राजनीति हिंदुओं की पार्टी की राजनीति नहीं थी। अपने हिंदू होने को छिपाए बिना वे मुसलमान से बराबरी की बात करते थे। यानी धर्म से भागे बिना सेकुलर। अपनी पहचान छोड़े बिना भारतीय।

कांग्रेस का स्वाभाविक मैदान कभी यही था।

तब सवाल उससे अपना यह मैदान छूटा कैसे?

मेरा मानना है, एक हिसाब से राजीव गांधी के बाद कांग्रेस के पास इस प्रश्न पर लौटने के अवसर थे। नरसिंह राव का दौर आया। आर्थिक दिशा बदली। अयोध्या का विस्फोट हुआ। नरसिंहराव ने उसे अपने मौन, अपनी समझादरी से निपटा। पर कांग्रेसी ही, सीताराम केसरी, सोनिया गांधी, अहमद पटे, फोतेदार एंड पार्टी उन्ही पर पिल पड़े। अर्जुनसिंह-वामपंथियों ने वैसा ही भौकाल बनाया जैसे बहुत बाद में 2013-14 में प्रगतिशीलों- एक्टिविस्टो- वामपंथियों ने अलग-अलग कारणों से मनमोहनसिंह की समझदारी को तरह-तरह से बदनाम किया। नरसिंहराव के बाद सीताराम केसरी, सोनिया गांधी को आर्थिक सुधारों, मंदिर-मसजिद मामले में समझदारी दिखानी थी। लेकिन उलटा हुआ। कम्युनिस्ट हरकिशनसिंह सुरजीत सहित सभी वामपंथियों-प्रगतिशीलों ने एक सुर में जैसे भी हो अटलबिहारी वाजपेयी को प्रधानमंत्री नहीं बनने देना है, का राग बनाया। उसका जनमानस में गहरा असर हुआ। कांग्रेस समर्थक कम्युनिस्ट, समाजवादियों, क्षेत्रिय दलों ने मिल कर संयुक्त मोर्चे की वह खिचड़ी सरकार बनाई जिससे भाजपा, अटलबिहारी वाजेपयी की हवा को और बल मिला।

संयुक्त मोर्चे की एचडी देवगौडा, आईके गुजराल की गठबंधन सरकार का मेरा राजनैतिक हिसाब है कि इन दो सरकारों ने अटलबिहारी वाजपेयी की वह स्वीकार्यता बनाई, भाजपा का वह अवसर बनाया जिससे उसका भी रूपांतरण आजादी से पहले की सर्वजनीय मंच के रूप में कांग्रेस की स्वीकार्यता बनी थी।

मेरा मानना है कि अटलबिहारी वाजयेपी की तेरह दिनों की सरकार को गिरा कर संयुक्त मोर्चे से हरकिशनसिंह सुरजीत, सीताराम केसरी, लालू यादव, मुलायमसिंह यादव की सरकार बनाने की राजनीति नेहरू के आईडिया ऑफ इंडिया की सर्वाधिक बड़ी ऐतिहासिक गलती थी। और कांग्रेस ने

जहा अपना पुराना व्यापक भारतीय छाता खो दिया वही कम्युनिस्ट याकि सीपीआई, सीपीएम का प्रदेशों में भी सिमटना शुरू हुआ।

मेरा मानना है कि वाजपेयी सरकार 2004 में कांग्रेस के जिंदा होने से, सोनिय गांधी की लीडरशीप के कऱिश्में से नहीं हारे। प्रधानमंत्री वाजपेयी की हार के दो कारण जिम्मेवार थे। एक ‘शाईनिंग इडिया’ की गलतफहम। और दूसरा कारण अंहकार था। कथित आत्मविश्वास अंहकारों की बदौलत था। खास तौर पर मंत्रियों व जनता की नब्ज जानने की हवाबाजी करने वाले नेताओं ने वाजपेयी को खारिज कराया।

बहरहाल फिर सोनिया गांधी आईं।

और वे राजीव के समय के अनुभव से सीख लेने के बजाय कांग्रेस के एक नए सत्ता-बौद्धिक घेरे में फंसती गई।

2004 में कांग्रेस सत्ता में लौटी तो अहमद पटेल सोनिया गांधी के राजनीतिक सलाहकार और कांग्रेस-सरकार के बीच महत्वपूर्ण सेतु बने। दूसरी ओर राष्ट्रीय सलाहकार परिषद यानी एनएसी के माध्यम से अधिकार-आधारित कल्याण, नागरिक समाज और एक्टिविस्ट राजनीति का प्रभाव बढ़ा। रोजगार, सूचना, भोजन और वन अधिकार जैसे कानूनों ने शासन को नया रूप दिया। इनमें सूचना के अधिकार, मनरेगा, वन अधिकार, भोजन सुरक्षा जैसे कदमों का अपना सामाजिक महत्व था। लेकिन इसका एक असर यह भी हुआ कि कांग्रेस के राजनीतिक दिमाग में धीरे-धीरे यह गलतफहमी बनी कि यदि राज्य गरीब को अधिक अधिकार देगा, योजनाएं देगा, अल्पसंख्यक को सुरक्षा का भरोसा देगा और सामाजिक गठबंधन जोड़ लेगा तो उसका पुराना राष्ट्रीय आधार लौटेगा या बना रहेगा।

हकीकत में तब जमीन पर, जनमानस में दो प्रक्रियाएं चल रही थीं। गरीब अधिकार पा रहा था, लेकिन आकांक्षा भी बढ़ रही थी। वही हिंदू अपनी जाति में बंटा था, लेकिन धार्मिक पहचान का भगवा रंग भी पकता हुआ था। उसमें इस्लामी आतंकी घटनाओं, भूमंडलीकृत गांव में पर्दे पर दिखती तस्वीरों का गहरा असर था। कांग्रेस ने अधिकारों, आकांक्षाओं की भूख बना कर सोचा उससे वोट पक्के होंगे वही दूसरी तरफ भाजपा, संघ, नरेंद्र मोदी ने गुजरात दंगों से हिंदूओं की मजबूत नेतृत्व की आवश्यकता बनी। गर्व से कहों हम हिंदू है का हुंकारा बना।

यहीं 2014 हुआ।

गुजरात में नरेंद्र मोदी की कहानी को भी इस थीम को बदल दिया। दरअसल 2002 के बाद दिल्ली की लेफ्ट, सेकुलर-प्रगतिशील जमात ने मोदी को जितना सांप्रदायिकता के कटघरे में खड़ा किया मोदी, संघ ने चुपचाप उसी घेरेबंदी को हिंदू अस्मिता की राजनीति में बदला। एक तरफ कांग्रेस-एनएसी का अधिकारवादी और अल्पसंख्यक-संवेदनशील नैरेटिव था। दूसरी तरफ भाजपा-संघ-मोदी का हिंदू गौरव और कांग्रेस के कथित तुष्टीकरण के विरुद्ध प्रतिवाद।

दोनों एक-दूसरे को खाद-पानी देते गए।

दिल्ली का मीडिया बताता—मोदी से हिंदू बहुसंख्यकवाद का खतरा है। मतलब इंडिया टुडे की कवर स्टोरी- MODI: Master Divider

कांग्रेस ने फिर वही गलती की जो राजीव के समय हुई थी। वह भारतीय समाज की प्रतिक्रिया को अपनी आंख से पढ़ने के बजाय अपने वैचारिक घेरे की भाषा में समझती रही।

और फिर 2014 आया। नरेंद्र मोदी सत्ता के बाद उससे हिंदुओं के अवतार की तरह प्रतिष्ठित है।

यहां से कहानी राहुल गांधी की है। (जारी)


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