बुलाया है, तो जाइए

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कांग्रेस ने नरेंद्र मोदी सरकार पर भारत को अमेरिका का पिछलग्गू बना देने का इल्जाम लगाया है। ऐसे में यह अपेक्षित होगा कि मल्लिकार्जुन खड़गे अपनी पार्टी के नेताओं के साथ ईरान जाएं।

ईरान ने अपने दिवंगत सर्वोच्च धार्मिक नेता अयातुल्लाह अली खामेनई की अंत्येष्टि में भाग लेने के लिए अब भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष नितिन नबीन, कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे, और कांग्रेस नेताओं पवन खेड़ा एवं सलमान खुर्शीद को आमंत्रित किया है। इसके पहले ईरान ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को न्योता दिया था, लेकिन खबरों के मुताबिक उन्होंने ना जाने का फैसला किया। भारत सरकार ने अपेक्षाकृत निम्न-स्तरीय प्रतिनिधिमंडल को तेहरान भेजने का निर्णय लिया है, जिसकी अगुआई बिहार के राज्यपाल सईद अता हसनैन करेंगे।

यह ईरान के साथ संबंध का दर्जा गिराने जैसा फैसला है। मई 2024 में जब ईरान के राष्ट्रपति इब्राहीम रईसी की हेलीकॉप्टर हादसे में मौत हुई, तो उनकी अंत्येष्टि में गए भारतीय दल का नेतृत्व तत्कालीन उप-राष्ट्रपति ने किया था। उसके बाद से वैश्विक समीकरण काफी बदल चुके हैं। पिछले 13 महीनों में अमेरिका और इजराइल दो बार ईरान पर हमले किए, जिनमें भारत की नीति स्पष्टतः इन दोनों देशों की तरफ झुकी रही। ऐसे में अयातुल्लाह खामेनई की अंत्येष्टि में प्रतिनिधित्व के मामले में मोदी सरकार का रुख अपेक्षित दिशा में ही है। बहरहाल, इस बीच कांग्रेस भारतीय विदेश नीति के इस बदलाव का विरोध करती रही है। उसने मोदी सरकार पर भारत को अमेरिका का पिछलग्गू बना देने का इल्जाम लगाया है। ऐसे में यह अपेक्षित होगा कि खड़गे अपनी पार्टी के नेताओं के साथ ईरान जाएं।

इससे यह संदेश जाएगा कि ईरान से संबंध के मामले में भारत में अलग-अलग पक्ष हैं। इससे यह धारणा पुष्ट होगी कि भारतीय जनमत का एक बड़ा हिस्सा वैदेशिक मामलों में रणनीतिक स्वतंत्रता का पैरोकार है। यह भारत के दीर्घकालीन हित में होगा। हाल के युद्ध ने ईरान को पश्चिम एशिया में एक महत्त्वपूर्ण ताकत के रूप में स्थापित कर दिया है। इससे वहां के समीकरण बदल रहे हैं। सऊदी अरब, कतर, और ओमान जैसे देशों ने ईरान से अपने संबंध को पुनर्निर्धारित करने के संकेत दिए हैँ। यानी संभव है कि भविष्य में ईरान की अनदेखी कर उस क्षेत्र में अपना प्रभाव बनाए रखना कठिन हो जाए। ऐसे में कांग्रेस नेताओं के ऊपर एक बड़ी जिम्मेदारी आ गई है।


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