डेटा सेंटर: पानी और पर्यावरण की नई आफत!

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भारत में पानी की कमी पहले से ही कृषि, पीने के पानी और उद्योगों को प्रभावित कर रही है। ऐसे में डेटा सेंटर भूजल निकासी बढ़ाएंगे, जिससे कुओं का स्तर गिरेगा, सूखा बढ़ेगा और किसानों की फसलें प्रभावित होंगी। बिजली की मांग भी बढ़ेगी, जो कोयला-आधारित ग्रिड पर दबाव डालेगी और उत्सर्जन बढ़ाएगी।

डिजिटल दुनिया में डेटा सेंटर अब आधुनिक सभ्यता की रीढ़ बन रहे हैं। ‘क्लाउड कंप्यूटिंग’, ‘आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस’ (AI), सोशल मीडिया और ऑनलाइन सेवाओं का हर क्लिक इन विशाल सुविधाओं पर निर्भर करता है। लेकिन यह ‘क्लाउड’ वास्तव में पानी और ऊर्जा की भारी खपत पर टिका है। वैश्विक स्तर पर डेटा सेंटर पानी के संसाधनों को नष्ट कर रहे हैं, बिजली की भारी मांग पैदा कर रहे हैं और कार्बन उत्सर्जन बढ़ा रहे हैं। भारत, जहां पानी की कमी पहले से ही संकट का रूप ले चुकी है, वहाँ भी नए डेटा सेंटरों का विस्तार, पर्यावरण के लिए घातक साबित हो सकता है।

गौरतलब है कि विश्व स्तर पर डेटा सेंटरों का पानी का उपयोग चौंकाने वाला है। एक मध्यम आकार का डेटा सेंटर रोजाना 3 लाख गैलन (लगभग 11 लाख लीटर) पानी का उपयोग करता है, जबकि बड़े आकर वाले मेगा डेटा सेंटर 50 लाख गैलन (लगभग 1.9 करोड़ लीटर) तक पानी पी जाते हैं। यह पानी मुख्य रूप से कूलिंग टावरों में वाष्पीकरण के लिए इस्तेमाल होता है, क्योंकि इन डेटा सेंटरों में लगे सर्वर निरंतर गर्मी पैदा करते हैं।

अमेरिका में टेक्सास के डेटा सेंटर 2025 में 490 अरब गैलन पानी इस्तेमाल करने वाले हैं, जो 2030 तक 3990 अरब गैलन तक पहुंच सकता है। यह लेक मीड जैसे बड़े जलाशय को 16 फीट तक सूखा सकता है। जॉर्जिया के न्यूटन काउंटी में मेटा का एक डेटा सेंटर पूरे काउंटी के पानी का 10 प्रतिशत उपयोग करता है। गूगल ने 2023 में अपने डेटा सेंटरों के लिए 50 अरब गैलन से ज्यादा पानी इस्तेमाल किया, जिसमें से 31 प्रतिशत पानी-तनाव वाले क्षेत्रों से लिया गया।

पानी की खपत के अलावा, डेटा सेंटर प्रदूषण भी फैलाते हैं। वाष्पीकरण प्रक्रिया में रसायनिक यौगिक, बायोसाइड, भारी धातुएं और नमक का मिश्रण अपशिष्ट जल में मिलता है, जो नदियों, झीलों और भूजल को दूषित करता है। कई मामलों में यह सीधे पर्यावरण में छोड़ा जाता है, मछलियों और जलीय जीवों को नुकसान पहुंचाता है। गर्मी के मौसम में मांग तीन गुना बढ़ जाती है, जब सूखे का खतरा सबसे ज्यादा होता है।

ऊर्जा खपत और कार्बन उत्सर्जन डेटा सेंटरों के दूसरे बड़े खतरे हैं। 2022 में वैश्विक डेटा सेंटर 240-340 टेरावाट-घंटे बिजली इस्तेमाल कर चुके थे, जो वैश्विक बिजली मांग का 1-1.3 प्रतिशत है। AI के उदय से यह आंकड़ा तेजी से बढ़ रहा है। इंटरनेशनल एनर्जी एजेंसी (IEA) के अनुसार, 2024 में डेटा सेंटरों से 18.2 करोड़ टन कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन हुआ। 2023 में, अमेरिका में डेटा सेंटर कुल बिजली का 4.4 प्रतिशत इस्तेमाल कर रहे थे, जो 2028 तक दोगुना या तिगुना हो सकता है। यह बिजली अक्सर कोयला या गैस आधारित प्लांटों से आती है, जो जलवायु परिवर्तन को तेज करती है। इसके अलावा, इन में लगे सर्वरों के नियमित बदलाव से ई-वेस्ट भी बढ़ता है।

डेटा सेंटर भूमि उपयोग पर भी दबाव डालते हैं। आमतौर पर यदि ये डेटा सेंटर जंगलों, कृषि भूमि या संवेदनशील इलाकों में बनाए जाते हैं, तो वे जैव विविधता को नुकसान पहुंचाते हैं। स्थानीय समुदायों में पानी की कमी से दबाव बढ़ता है। इसीलिए जॉर्जिया और अन्य जगहों पर निवासियों ने नए सेंटरों पर प्रतिबंध लगाने की मांग की है।

भारत बात करें तो यहाँ स्थिति और भी चिंताजनक है। देश पहले से ही पानी की गंभीर कमी का सामना कर रहा है। नासा और विश्व संसाधन संस्थान (WRI) की रिपोर्टों के अनुसार, भारत के कई बड़े शहर उच्च जल-तनाव वाले क्षेत्रों में हैं। फ़िलहाल भारत में 278 से ज्यादा डेटा सेंटर हैं, जिनमें से 75 प्रतिशत महाराष्ट्र, तमिलनाडु, दिल्ली-NCR, कर्नाटक और तेलंगाना जैसे जल-तनाव वाले राज्यों में केंद्रित हैं। बेंगलुरु, चेन्नई, हैदराबाद और मुंबई जैसे शहरों में नए सेंटर पानी की मांग बढ़ा रहे हैं।

वहीं AI डेटा सेंटरों के विस्तार से समस्या और गंभीर हो गई है। अनुमान है कि भारत का AI डेटा सेंटर क्षेत्र पूर्ण क्षमता पर 375 अरब लीटर पानी सालाना इस्तेमाल कर सकता है। एक 100 मेगावाट का सेंटर रोजाना 2 घन मीटर पानी इस्तेमाल कर सकता है, जो 6500 घरों की जरूरत के बराबर है। विशाखापट्टनम में प्रस्तावित 15 बिलियन डॉलर का हाइपरस्केल डेटा सेंटर पर्यावरणीय रूप से संवेदनशील क्षेत्र में बन रहा है, जहां भूजल स्तर पहले ही बहुत नीचे है। स्थानीय समुदायों की चिंताओं को नजरअंदाज किया जा रहा है।

भारत में पानी की कमी पहले से ही कृषि, पीने के पानी और उद्योगों को प्रभावित कर रही है। ऐसे में डेटा सेंटर भूजल निकासी बढ़ाएंगे, जिससे कुओं का स्तर गिरेगा, सूखा बढ़ेगा और किसानों की फसलें प्रभावित होंगी। बिजली की मांग भी बढ़ेगी, जो कोयला-आधारित ग्रिड पर दबाव डालेगी और उत्सर्जन बढ़ाएगी। जलवायु परिवर्तन के दौर में, जहां मानसून अनियमित हो रहा है, यह संकट और गहरा जाएगा।

कुछ कंपनियां दावा करती हैं कि लिक्विड कूलिंग या क्लोज्ड-लूप सिस्टम पानी की खपत कम कर सकते हैं, लेकिन ये महंगे हैं और ज्यादातर सस्ते वाष्पीकरण वाले तरीकों का ही इस्तेमाल होता है। पारदर्शिता की कमी भी समस्या है क्योंकि कंपनियां पानी के उपयोग के सटीक आंकड़े छिपाती हैं।

यह संकट अपरिहार्य नहीं है। सरकार को सख्त नियम बनाने चाहिए। जल-तनाव वाले क्षेत्रों में नए सेंटरों पर रोक लगे, पानी पुनर्चक्रण अनिवार्य किया जाए, नवीकरणीय ऊर्जा का अनिवार्य उपयोग और पर्यावरण प्रभाव मूल्यांकन (EIA) में स्थानीय समुदायों की भागीदारी होनी चाहिए। सस्टेनेबल डिजाइन, हीट रीयूज और एयर/इमर्शन कूलिंग को प्रोत्साहन दिया जाए। ऐसे कदम उठाने से पर्यावरण के नुकसान को कुछ हद तक कम किया जा सकता है।

डेटा सेंटर ‘डिजिटल इंडिया’ के सपने को साकार अवश्य कर सकते हैं, लेकिन पर्यावरण की कीमत पर नहीं। अगर हम पानी की लूट और प्रदूषण को अनदेखा करेंगे, तो भविष्य में सूखे, बिजली संकट और पर्यावरणीय विनाश का सामना करना पड़ेगा। विकास और संरक्षण का संतुलन बनाना जरूरी है, वरना ये ‘क्लाउड’ हमारे सिर पर ही टूट पड़ेगा।


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