बेमतलब की होड़ है

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प्रगति का एकमात्र सार्थक पैमाना लोगों के जीवन स्तर में सुधार है। साफ हवा, पानी, पर्याप्त भोजन, वस्त्र, आवास, शिक्षा और चिकित्सा मुहैया कराने के लिहाज से अर्थव्यवस्था का आकार महत्त्वपूर्ण है, लेकिन यह निर्णायक पहलू नहीं है।

सकल घरेलू उत्पाद के लिहाज से भारत उदय के कथानक को फिर झटका लगा है। चौथे स्थान पर पहुंचने के बाद भारत अब फिसल कर छठे नंबर पर जा गिरा है। जब भारत ने जीडीपी मापने की नई शृंखला अपनाई, तो उसके तहत हुई गणना में वह जापान से पिछड़ कर पांचवें नंबर पर दर्ज हुआ। अब अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के 2025 के आंकड़ों के मुताबिक वह ब्रिटेन से भी नीचे हो गया है। ऐसा रुपये की कीमत में भारी गिरावट के कारण हुआ है। जीडीपी का आकलन देशों की अपनी मुद्रा में होता है। फिर तत्कालीन विनिमय दर के आधार पर अमेरिकी डॉलर में उसका मूल्य आंका जाता है।

2024 के अंत में एक डॉलर की कीमत 84.6 रुपये थी, जो 2025 के अंत में 88.5 रुपये हो गई। इस तरह डॉलर में भारत के जीडीपी का मूल्य घट गया। ताजा आंकड़ों के मुताबिक 2025 के अंत में भारत की जीडीपी 3.92 ट्रिलियन डॉलर थी, जबकि ब्रिटेन की चार ट्रिलियन और जापान की 4.44 ट्रिलियन डॉलर थी। तीसरे नंबर स्थित जर्मनी की अर्थव्यवस्था 4.7 ट्रिलियन रही, जबकि 19.6 ट्रिलियन के साथ चीन दूसरे और 30.8 ट्रिलियन डॉलर के साथ अमेरिका पहले नंबर पर रहा। डॉलर की आज की कीमत पर गणना की जाए, तो भारत के जीडीपी का मूल्य संभवतः और भी कम होगा। यानी पांच ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनने और तीसरे नंबर पर पहुंचने की दौड़ फिलहाल उलटी दिशा में मुड़ गई है।

बहरहाल, ये दौड़ बेमतलब है। ऐसे आंकड़ों के आधार पर बनाए गए कथानक असल में अर्थव्यवस्था की मूलभूत कमियों पर परदा डालने के लिए तैयार किए गए हैं। आर्थिक प्रगति का एकमात्र सार्थक पैमाना लोगों के जीवन स्तर में सुधार ही हो सकता है। लोगों को साफ हवा, पानी, पर्याप्त भोजन, वस्त्र, आवास, शिक्षा और चिकित्सा मुहैया कराने के लिहाज से अर्थव्यवस्था का आकार महत्त्वपूर्ण हो सकता है, लेकिन यह निर्णायक पहलू नहीं है। असल में प्रति व्यक्ति जीडीपी का पैमाना भी नाकाफी है, क्योंकि इस औसत में आर्थिक विषमता की वास्तविक स्थिति की झलक नहीं मिलती। वैसे इस कसौटी पर भारत दुनिया 140वें नंबर पर है।


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