कांग्रेस और मजदूर अधिकार

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बचाओया वापस लाओजैसे नारे लोगों का ध्यान खींचने के लिहाज से हमेशा अपर्याप्त साबित हुए हैँ। कांग्रेस की समस्या यह है कि हाल-फिलहाल में वह भविष्य का कोई सपना या लोक-लुभावन कार्यक्रम पेश करने में नाकाम रही है।

मजदूर अधिकार के सवाल पर राष्ट्रीय सम्मेलन का आयोजन कांग्रेस की सही दिशा में पहल है, बशर्ते यह मुद्दा उसकी क्षणिक चिंता बन कर ना रह जाए। कामकाजी वर्ग की बढ़ती मुश्किलें और उसके घटते अधिकार आज असल मुद्दे हैं, जिनकी मुख्यधारा राजनीति में मजबूत वकालत की जरूरत है। मनरेगा खत्म कर उसकी जगह जी राम जी कानून लागू करने के नरेंद्र मोदी सरकार के फैसले के बाद कांग्रेस ने इस पर ध्यान दिया है। चूंकि मनरेगा को कांग्रेस नेतृत्व अपनी बड़ी उपलब्धि मानता था, इसलिए उस पर हुए प्रहार से वह भी विचलित हुआ। तब पार्टी ने ‘मनरेगा बचाओ’ आंदोलन शुरू करने का फैसला किया। अब पार्टी उसे मजदूर अधिकार के बड़े दायरे से जोड़ने का संकेत दे रही है।

इस मसले पर पार्टी समग्र सोच विकसित कर सके और उसके आधार पर संगठन एवं संघर्ष की दीर्घकालिक योजना बनाए, तो उससे कांग्रेस को आज के दौर में एक खास पहचान मिल सकती है। मगर पार्टी नेतृत्व की मुश्किल यह है कि वह संयम के साथ किसी एक मुद्दे पर नहीं टिकता। और जो भी मुद्दा वह उठाता है, उसके पीछे मकसद अपनी पूर्व सरकारों के रिकॉर्ड को मोदी सरकार से बेहतर दिखाने तक सीमित रह जाता है। राफेल से लेकर ए-2 (यानी दो घरानों की मोनोपॉली) पर आक्रामक रुख अपनाने के बाद विपक्ष के नेता राहुल गांधी जातीय जनगणना एवं 1990 के दशक के मंडल-कालीन विमर्श में जा सिमटे।

उसी क्रम में ‘संविधान बचाओ’ का झंडा उन्होंने उठाया। फिर ‘वोट चोरी’ उनका पसंदीदा मसला बना। अब मनरेगा की वापसी उनका प्रिय विषय बना है। जबकि समझने की बात यह है कि ‘बचाओ’ या ‘वापस लाओ’ जैसे नारे लोगों का ध्यान खींचने के लिहाज से हमेशा अपर्याप्त साबित हुए हैँ। कांग्रेस की समस्या यह है कि हाल के दशकों में वह भविष्य का कोई सपना या लोक-लुभावन कार्यक्रम पेश करने में नाकाम रही है। ऐसे में आम जन को उसका एजेंडा नकारात्मक मालूम पड़ता है। पार्टी के मजदूर अधिकार सम्मेलन को इसी पृष्ठभूमि में देखा जाएगा। सवाल यह है कि क्या यहां से कांग्रेस कोई सकारात्मक सोच देश के सामने रख पाएगी?


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