उनको ‘सर’ कहा जाता है। लद्दाख की अपनी भाषा में ‘कागा ली’ यानी ‘सर’। वे अभी 59 साल के हैं, लेकिन जब 30 साल के थे तब भी लद्दाख के ज्यादातर लोग उनको ‘एचो’ यानी बड़ा भाई कहते थे। वे अपनी उम्र के आधार पर बड़ा भाई नहीं कहे जाते हैं और न किसी स्कूल का अध्यापक होने के नाते ‘सर’ कहे जाते हैं। ‘बड़ा भाई’ औऱ ‘सर’ ये दोनों उपाधियां उन्हें लद्दाख के लोगों ने देश, समाज और मानवता के प्रति उनके योगदान को देखते हुए उनके प्रति सहज स्नेह में दी है।
तभी जब शुक्रवार की रात को सोनम वांगचुक का एक वीडियो देखा, जिसमें वे इस बात की सफाई दे रहे थे कि उन्होंने किसी के साथ कोई डील नहीं की है और उन्हें किसी से अपनी पवित्रता का प्रमाणपत्र नहीं लेना है, तो बड़ी तकलीफ हुई। लगा कि हम कितने कृतघ्न लोग हैं, जिन्होंने एक ऐसे व्यक्ति को, जो बौनों की जमात में ‘पूरा आदमकद’ है, उसको ऐसी स्थिति में डाल दिया है!
फिर प्रोमिथियस की कहानी याद आई और मनुष्यों का उसके प्रति व्यवहार ध्यान आया। प्रोमिथियस को जब इंसानों की तकलीफ नहीं देखी गई तो उसने स्वर्ग से आग चुरा कर इंसानों को दिया था। इस काम से नाराज होकर जब स्वर्ग के देवताओं ने प्रोमिथियस को सलीब पर लटकाया तो इंसान उसकी तकलीफों पर ताली बजा रहे थे। यह इंसानी कृतघ्नता चिरंतन है। तभी सोनम वांगचुक के प्रति हमारी कृतघ्नता अपवाद नहीं हैं। परंतु वे ईसा मसीह की तरह इतने उदार तो हैं ही कि इंसानों के लिए कह सकें, ‘हे प्रभु इन्हें माफ करना, ये नहीं जानते कि ये क्या कर रहे हैं’।
सचमुच जो लोग सोनम वांगचुक के लिए कह रहे हैं कि वे सरकार से मिले हुए थे, उन्होंने सरकार से समझौता कर लिया, वे सरकार के एजेंट हैं, उन्होंने कांग्रेस और दूसरी विपक्षी पार्टियों के आंदोलन को कमजोर किया और अंत में सरकार से डील कर ली आदि आदि उनको नहीं पता है वे क्या कह रहे हैं। उनके नेता जिस समय यूरोप में छुट्टी मना रहे थे उस समय सोनम वांगचुक दिल्ली की 45 डिग्री की गर्मी में भूख हड़ताल पर बैठे। उन्होंने अच्छा कहा कि लद्दाख की कड़ाके की ठंड छोड़ कर वे दिल्ली की भीषण गर्मी में अनशन पर बैठे थे। क्या उस समय उद्धव ठाकरे की पार्टी के संजय राउत और राहुल गांधी की पार्टी के इमरान मसूद को समझ में आया था कि सोनम वांगचुक सरकार के एजेंट हैं?
अगर उनको समझ में आ गया था कि सोनम वांगचुक सरकार के एजेंट हैं और एक समय आने पर वे समझौता कर लेंगे तो उसी समय उन्होंने खुद का आंदोलन क्यों नहीं शुरू कर दिया? क्यों नहीं संजय राउत या इमरान मसूद भूख हड़ताल पर बैठ गए? सबसे बड़ा सवाल तो यह है कि सोनम वांगचुक ने जो किया उसमें कांग्रेस या किसी दूसरी विपक्षी पार्टी का क्या योगदान है? क्या किसी ने उनका सहयोग किया, कोई उनके साथ बैठने गया, किसी ने उनका समर्थन किया? जब कुछ किया ही नहीं तो यह हिसाब किताब लेने का अधिकार किसने दे दिया कि वे किसके एजेंट हैं और क्यों समझौता कर लिया? क्या आपकी मंशा यह थी कि वे भूख हड़ताल पर मर क्यों नहीं गए?
ध्यान रहे सोनम वांगचुक किसी विपक्षी नेता के गुलाम नहीं हैं कि उनसे पूछ कर भूख हड़ताल शुरू करेंगे और उनसे पूछ कर हड़ताल समाप्त करेंगे। वे एक गांधीवादी सामाजिक कार्यकर्ता हैं, एक श्रेष्ठ शिक्षक हैं, एक अनुसंधानकर्ता हैं, एक प्रयोगशील व्यक्ति हैं और सबसे ऊपर उनके अंदर बुद्ध की करुणा है। जिस समय कांग्रेस और दूसरी विपक्षी पार्टियों के नेताओं ने छात्रों को उनके हाल पर छोड़ दिया था उस समय सोनम वांगचुक को लगा कि देश के छात्र और युवा आक्रोश से भरे हैं और उनके गुस्से को एक सही दिशा देने की आवश्यकता है।
इसलिए वे कॉकरोच जनता पार्टी के प्रदर्शन में शामिल हुए और आठ दिन तक हालात का आकलन करने के बाद 28 जून से भूख हड़ताल शुरू की। वे छात्रों और युवाओं के आंदोलन की नैतिक शक्ति थे। उनकी भूख हड़ताल ने देश भर के छात्रों को किसी न किसी रूप में इस आंदोलन का हिस्सा बनने के लिए प्रेरित किया। युवाओं में यह धारणा बनी कि लद्दाख से आकर एक व्यक्ति बिना किसी स्वार्थ के उनके लिए अपनी जान दांव पर लगा रहा है इसलिए उनको भी कुछ करना चाहिए।
अगर किसी को लग रहा है कि सोनम वांगचुक भूख हड़ताल नहीं करते तब भी ‘जेन जी’ इतना बड़ा आंदोलन कर देता तो वह मूर्खों के स्वर्ग में रह रहा है। उसे पता नहीं है कि इस देश में युवाओं के हर आंदोलन को नैतिक शक्ति वाले किसी बुजुर्ग ने ही दिशा दी है। आजादी की लड़ाई को गांधी ने, दूसरी आजादी की लड़ाई को जेपी ने और भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई को अन्ना हजारे ने दिशा दी थी। ध्यान रहे ‘जेन जी’ के इस आंदोलन में भी किसी अभिजीत दिपके या आशुतोष रांका या सौरव दास का कोई मतलब नहीं है।
ये सब छह जून को जंतर मंतर पर प्रदर्शन करके जा चुके थे और उसके बाद दिपके ने जयपुर में प्रदर्शन किया था, जहां उनके ऊपर हमला भी हुआ था। उसके बाद वे नागपुर गए थे। कहीं भी कोई ऐसा रिस्पांस नहीं मिला, जिससे लगे कि देश के युवा उनके साथ जुड़ रहे हैं। देश के छात्र और युवा सोनम वांगचुक की नैतिक आभा से इस आंदोलन से जुड़े। यह आंदोलन इतना बड़ा इसलिए हुआ क्योंकि सोनम वांगचुक ने सत्य और अहिंसा के रास्ते पर चल कर अपना जीवन होम करने का निर्णय किया था।
इसलिए यह देखना तकलीफदेह है कि उनके इस महान योगदान पर सवाल उठाए गए और उनको सफाई देनी पड़ी। सोनम वांगचुक सही अर्थों में गांधीवादी हैं। गांधी की तरह उनका जीवन ही उनका उपदेश है। दिल्ली में एक केंद्रीय विद्यालय से पढ़ाई और श्रीनगर एनआईटी से मैकेनिकल इंजीनियर की डिग्री लेकर अच्छी जगह नौकरी करने की बजाय वांगचुक 1988 में लद्दाख लौटे थे। उस समय सरकारी स्कूलों में पढ़ाई की जो व्यवस्था थी और तरीका था उसमें सिर्फ पांच फीसदी लद्दाखी बच्चे बोर्ड की परीक्षा पास करते थे।
वहां सोनम वांगचुक ने ‘स्टूडेंट्स एजुकेशनल एंड कल्चरल मूवमेंट ऑफ लद्दाख’ शुरू किया। उन्होंने पढ़ाई का तरीका और शिक्षा की माध्यम भाषा दोनों को बदल दिया। उन्होंने परीक्षा में फेल हुए छात्रों के लिए ‘स्कूल फॉर फेल्योर्स’ शुरू किया। इसके बाद की कहानी लद्दाख के इतिहास के सबसे चमकदार अध्याय के रूप में दर्ज है। सोनम वांगचुक ने हजारों छात्रों का जीवन बदल दिया। जैसे गांधी की बुनियादी शिक्षा थी, वैसे सोनम ने लद्दाख की शिक्षा को लोगों की भाषा, उनकी संस्कृति और उनकी आवश्यकताओं से जोड़ दिया।
बाद में उन्होंने ‘ऑपरेशन न्यू होप’ शुरू किया और फिर अपनी पत्नी गीतांजली जे आंगमो के साथ मिल कर ‘हिमालयन इंस्टीट्यूट ऑफ ऑल्टरनेटिव लद्दाख’ यानी एचआईएएल शुरू किया। उन्हें टिकाऊ विकास और टिकाऊ आवास की अवधारणा विकसित की और ऐसे घर बनाए, जो लद्दाख की जमा देने वाली ठंड में भी 15 डिग्री तक गर्म रहें। यह चमत्कार उन्होंने सौर ऊर्जा के इस्तेमाल से किया। उन्होंने ‘कॉनिकल आर्टिफिशयल ग्लेशियर’, जिसे आम बोलचाल में ‘हिम स्तूप’ कहा जाता है उसे विकसित किया। इससे सर्दियों में बर्फ को इकट्ठा करके गर्मियों में पीने और सिंचाई के लिए पानी का बंदोबस्त किया जाता है। उन्होंने अपनी शिक्षा और ज्ञान से लद्दाख के लोगों का जीवन बदल दिया।
उन्होंने शिक्षा को पाठ्यक्रम और किताबों से निकाल कर लोगों के जीवन का हिस्सा बना दिया। अगर ऐसा व्यक्ति छात्रों और युवाओं के आंदोलन का नेतृत्व नहीं करता तो भला कौन करता! उन्होंने अपनी नैतिक जिम्मेदारी निभाई।
आंदोलन सफल हुआ तो सब उसका श्रेय ले रहे हैं। फिल्मों वाले सोशल मीडिया पर पोस्ट कर रहे हैं। लेकिन जब लग रहा था कि सरकार दमन करके आंदोलन खत्म कर देगी तो आमिर खान और राजकुमार हिरानी ने इस बात से इनकार कर दिया था कि ‘थ्री इडियट्स’ फिल्म सोनम वांगचुक के जीवन पर आधारित है या उससे प्रेरित है। फिर लद्दाख, इनोवेटिव स्कूल, रैंचो और फुंगशुक वांगड़ू की सोनम वांगचुक से समानता क्या सिर्फ संयोग है? इतने संयोग कहीं एक साथ होते हैं! खैर, माफ करना ‘एचो’ यह कृतघ्न लोगों का देश है! आप स्वस्थ रहें और इस अंधकारमय समय में एक प्रकाश पुंज की तरह मार्गदर्शन करते रहें।
