आंदोलन को अपमानित न करें

Categorized as अजित द्विवेदी कालम

आपदा को अवसर बनाने की कला में माहिर राइटविंग के कई इन्फ्लूएंसर और हर घटनाक्रम में साजिश का पहलू खोजने वाले मोदी विरोधी दोनों एक साथ दावा कर रहे हैं कि जंतर मंतर पर हुआ आंदोलन प्रायोजित था और इस आंदोलन से सरकार को बहुत फायदा हुआ है। कहा जा रहा है कि सरकार बड़ी सफलता के साथ राममंदिर के चढ़ावा चोरी और इथेनॉल मिश्रित पेट्रोल का मुद्दा लोगों के जेहन से निकालने में कामयाब हो गई। सोचें, यह कितना बेसिरपैर का तर्क है?

चढ़ावा चोरी अब भी लोगों के जेहन में है और ई-20 पेट्रोल का मामला लोगों के अपने जीवन और उनकी जेब से जुड़ा है इसलिए वह भी ध्यान से नहीं निकलने वाला है। ई-20 पार्टी नाम से एक संगठन बन गई है, जिसकी ओर से आंदोलन की तैयारी की जा रही है। फिर भी अगर यह प्रायोजित आंदोलन था तो कह सकते हैं कि सरकार ने सिर दर्द से छुटकारा पाने के लिए गर्दन कटवाने का काम किया है।

असल में आंदोलन को प्रायोजित बताने वाले लोग छात्रों और युवाओं के इस आंदोलन का अपमान कर रहे हैं। वे छात्रों और युवाओं को सरकार या किसी और के हाथ का प्यादा साबित करने में लगे हैं। हकीकत यह है कि इस तरह की बात करने वालों को अपनी नई पीढ़ी के बारे में कोई अंदाजा नहीं है और वे उन्हें समझने का प्रयास भी नहीं कर रहे हैं। उनको पता नहीं है कि जितना बड़ा आंदोलन जंतर मंतर पर था उससे कितना बड़ा आंदोलन पूरे देश में चल रहा था। युवाओं ने इंस्टाग्राम को ही जंतर मंतर बना दिया था, जहां वे अपनी लड़ाई लड़ रहे थे।

उन्हें और उनके आंदोलन को डिमीन करने या अपमानित करने से पहले उन्हें समझने की कोशिश करनी चाहिए। यह ध्यान रखना चाहिए कि उन्हें पुराने मुहावरों या मूल्यों के आधार पर नहीं समझा जा सकता है। उनके सभी बुनियादी मूल्य बदल गए हैं, उन्हें पुराने फॉर्मूले से आप पहचान नहीं पाएंगे। उनके लिए कमाई और सफलता की धारणा बदल गई है। वे बिना ऑफिस स्पेस के ऑफिस चलाते हैं, बिना पारंपरिक मुद्रा के कमाई करते हैं, उनकी सफलता उम्र और अनुभव का इंतजार नहीं करती है। जन्म के साथ मिली पहचान की धारणा को उन्होंने काफी हद तक तोड़ दिया है। इस रूप में उन्हें स्वीकार कीजिए और उन्होंने जो हासिल किया है उसका उत्सव मनाइए।

इसके उलट यह प्रचार करना मूर्खता है कि सरकार ने या किसी और ने आंदोलन को प्रभावित किया। वास्तविकता यह है कि इस आंदोलन से सरकार को कुछ भी हासिल नहीं हुआ है। उलटे सरकार ने अपनी साख, अपनी लोकप्रियता और अपना समर्थन गंवाया है। एक पूरी पीढ़ी की स्मृतियों में दशकों तक जंतर मंतर की तस्वीरें रहेंगी। उनको याद रहेगा कि जब वे अपनी तकलीफों का समाधान मांगने जंतर मंतर पर गए थे तब सरकार ने उनके ऊपर लाठियां चलवाई थीं, आंसू गैस के गोले छोड़े थे, उनको घायल करने के लिए पैलेट गन का इस्तेमाल किया गया था। उन्हें याद रहेगा कि उनकी रचनात्मकता और लोकप्रियता से घबराई सरकार ने इंटरनेट बंद कर दिया था। उनके सहयोग के लिए बढ़े हाथों को कानूनी दांव पेंच के जरिए रोका था। जंतर मंतर की तरफ बढ़ने वाले कदमों की रफ्तार रोकने के लिए कई दिन तक मेट्रो बंद रखे गए थे। फूड डिलीवरी ऐप्स को रोका गया था। जंतर मंतर के आसपास के दुकानदारों को धमकाया गया था। छात्रों के ऊपर मुकदमे किए गए थे।

ये तमाम बातें नई पीढ़ी के युवाओं की स्मृति में स्थायी रूप से दर्ज रहेंगी। जिस तरह से आजादी के बाद की पीढ़ी की यादों में आजादी की लड़ाई के मूल्य दर्ज थे उसी तरह इस पीढ़ी की यादों में पेपर लीक से लेकर पुलिस के लाठी चलाने तक की घटना दर्ज रहेगी। उनका राजनीतिक और मतदान व्यवहार इससे प्रभावित होगा। राजनीतिक पार्टियां आमतौर पर मानती हैं कि एक बार आंदोलन खत्म होने के बाद सब कुछ बदल जाता है और पुराने ढर्रे पर लौट आता है। याद करें कैसे किसान आंदोलन खत्म होने के बाद वापस लौटे किसानों ने अपनी किसान वाली अस्मिता छोड़ दी थी और घर में खूंटी पर टंगी जाति औऱ धर्म वाली अस्मिता ओढ़ ली थी।

वैसे ही भाजपा को लग रहा होगा कि छात्र और युवा भी घर लौटेंगे तो प्रदर्शनकारी ‘जेन जी’ वाली अस्मिता खूंटी पर टांग देंगे और जाति व धर्म वाली अस्मिता ओढ़ लेंगे। हो सकता है कि कुछ युवाओं के साथ ऐसा हो लेकिन व्यापक रूप से उनके व्यवहार में बदलाव होने की संभावना कम है।

ऐसा होने के कई कारण हैं। एक, युवाओं ने बहुत ठोस कारण से आंदोलन शुरू किया था। जब उनकी पीड़ पर्वत सी हो गई थी तब वे सड़क पर उतरे थे। अभी तुरंत उनकी इस पीड़ा का समाधान नहीं होने जा रहा है। दो, डिजिटली कनेक्टेड इस दौर में उनके आंदोलन की यादें हमेशा उनके साथ रहेंगी। वे इसकी सफलता को लंबे समय तक याद रखना चाहेंगे। तीन, उनका परिवार भी किसी न किसी रूप में इस आंदोलन से जुड़ा था। इसलिए अपनी अस्मिता बदलने के लिए उनके ऊपर अब कोई बाहरी दबाव नहीं होगा। चार, संसदीय लोकतंत्र में संविधानेत्तर उपकरणों से जो बदलाव होते हैं उनसे उम्मीदें तो बहुत बड़ी होती हैं लेकिन उनके पूरा नहीं होने पर निराशा भी उतनी ही बड़ी होती है। इसलिए युवाओं का उत्साह जिन उम्मीदों से बढ़ा है अगर वो निराशा में बदलती हैं तो ज्यादा मुश्किल होगी। नेपाल में सबने देखा है कि कैसे छह महीने से भी कम समय में ‘जेन जी’ का अपनी ही बनाई सरकार से मोहभंग हुआ।

सरकार को भी इसका अंदाजा है तभी उसने तात्कालिक उपाय और दीर्घावधि के लिए जरूरी उपाय एक साथ शुरू किए हैं। एक तरफ पेपर लीक रोकने के लिए 2024 में लाए गए कानून को दो साल के अंदर ही संशोधित किया जा रहा है और ज्यादा सख्त कानून बनाया जा रहा है। इसका मकसद युवाओं को तात्कालिक संतोष देना है। लेकिन साथ ही एक उच्चाधिकार प्राप्त कमेटी बना कर परीक्षा व्यवस्था की संस्थागत और संरचनागत समस्याओं को दूर करने की पहल भी की गई है। सरकार ने बहुत सोचे समझे तरीके से इस कमेटी की अध्यक्षता के लिए नंदन नीलेकणी का नाम तय किया है। सरकार को पता था कि उनको बनाए जाने पर यह सवाल उठेगा कि कांग्रेस के नेता रहे व्यक्ति को सरकार ने इतनी बड़ी जिम्मेदारी दी है। लेकिन इसी से इस पूरी पहल की विश्वसनीयता भी बनेगी। सरकार की पहली चिंता परीक्षा व्यवस्था में सुधार के प्रयासों की विश्वसनीयता बहाल करने की है। वह नंदन नीलेकणी के नाम से होगा। सरकार को धारणा के स्तर पर इसका लाभ मिल सकता है।

परंतु अभी अगर कोई कहता है कि यह आंदोलन सरकार या किसी और द्वारा प्रायोजित किया गया था या कॉकरोच जनता पार्टी भी भाजपा का उपक्रम है या सोनम वांगचुक सरकार के एजेंट थे और इन सबको आगे कर सरकार ने राम मंदिर चढ़ावा चोरी या पेट्रोल में इथेनॉल मिश्रण के मामले को सार्वजनिक विमर्श से हटा दिया है तो उसे वास्तविक हालात की जानकारी नहीं है। वास्तविक स्थिति यह है कि सरकार को ‘जेन जी’ के इस आंदोलन से बड़ा नुकसान हुआ है। नरेंद्र मोदी बतौर प्रधानमंत्री अपनी जो विरासत बना रहे थे उस पर संकट आया है। अच्छी बात यह है कि प्रधानमंत्री मोदी इस बात को समझ रहे हैं। वे किसी भ्रम में नहीं हैं। इसलिए इसको ठीक करने के प्रयास कर रहे हैं। कामयाबी कितनी मिलेगी, कह नहीं सकते हैं।


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