ट्रंप ने जो चाहा

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प्रस्तावित समाधान ट्रंप के खास अंदाजसे मेल खाता है। बीते एक साल में ट्रंप की यह शैली सामने आई है। किसी मुद्दे पर वे अधिकतम दबाव बनाते हैं। फिर अनुकूल शर्तों पर बीच के किसी बिंदु पर समझौता कर लेते हैं।

ग्रीनलैंड पर डेनमार्क की प्रतीकात्मक संप्रभुता बनी रहेगी, लेकिन वहां के संसाधनों एवं सुरक्षा का भार अमेरिका को सौंप दिया जाएगा। दावोस में डॉनल्ड ट्रंप की आक्रामक मुद्रा देखने के बाद ग्रीनलैंड के मसले का यह समाधान यूरोपीय नेताओं ने सोचा है। नाटो के महासचिव मार्क रूटे इसे लेकर ट्रंप से मिले। शुरुआती संकेतों के मुताबिक अमेरिकी राष्ट्रपति को प्रस्ताव अपने माफिक लगा। तो उन्होंने ग्रीनलैंड मुद्दे पर कुछ देशों पर लगे अतिरिक्त टैरिफ को वापस ले लिया है। उन्होंने कहा- ‘हमने ग्रीनलैंड, दरअसल पूरे आर्कटिक क्षेत्र के बारे में भविष्य में होने वाले डील का ढांचा तैयार किया है।’ रूटे के मुताबिक प्रस्ताव यह है कि पूरा नाटो- खासकर सात आर्कटिक सहयोगी देश आर्कटिक क्षेत्र की सुरक्षा करेंगे।

प्रस्तावित समाधान ‘ट्रंप के खास अंदाज’ से मेल खाता है। बीते एक साल में ट्रंप की यह शैली सामने आई है कि किसी मुद्दे पर वे अधिकतम दबाव बनाते हैं, और फिर अनुकूल शर्तों पर बीच के किसी बिंदु पर समझौता कर लेते हैं। इसमें ध्यान इस पर रहता है कि अमेरिकी कंपनियों और निवेशकों के लिए मुनाफे के नए अवसर खुलें। यहां तक कि वेनेजुएला में भी राष्ट्रपति निकोलस मदुरो का अपहरण करने के बाद उन्होंने पुराने शासन ढांचे को इस शर्त पर बने रहने दिया कि अमेरिका वहां के तेल भंडार का फायदा उठा सकेगा।

उसी तर्ज पर ग्रीनलैंड पर भी सहमति बनी है। मगर इस क्रम में ट्रंप ने सहयोगी देशों में अमेरिका के प्रति अविश्वास को और गहरा बना दिया है। इसकी अभिव्यक्ति दावोस में कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी के इन शब्दों से हुई कि नियम आधारित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था भंग हो चुकी है और अब वक्त इसे स्वीकार कर आगे बढ़ने का है। उन्होंने कहाः ‘ताकतवर देशों के पास शक्ति है। लेकिन हमारे पास भी भ्रम में ना रहने, यथार्थ को स्वीकार करने, अपने-अपने देश में अपनी शक्ति विकसित करने और मिल-जुल कर काम करने की क्षमता है।’ ये बातें ट्रंप को नागवार गुजरीं। लेकिन संदेश साफ हैः ट्रंप फौरी लड़ाइयां भले जीत रहे हों, लेकिन बड़ा युद्ध उनके देश के हाथ से निकल रहा है।


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