क्या नए बिल और निलेकणी समिति के गठन से समस्याएं दूर हो जाएंगी? संभवतः नहीं, क्योंकि वजह तकनीकी कमजोरियां नहीं हैं। इसके कुछ कारण नीतिगत हैं, तो कुछ सिस्टम में अंदर तक पहुंचा कथित भ्रष्टाचार।
नरेंद्र मोदी सरकार ने परीक्षा व्यवस्था में उभरी खामियों का तकनीकी समाधान पेश करने की कोशिश की है। इसके अलावा कानूनी उपाय के जरिए अपने सख्त इरादे का संदेश देने का प्रयास उसने किया है। मगर अंदाज वही पुराना हैः मीडिया में मोटी सुर्खियां बनाने वाली घोषणाएं करना, जिससे लोग मानने लगें कि सरकार सब कुछ दुरुस्त करने के लिए सचमुच दृढ़-संकल्प है! इस साल नीट पेपर लीक होने के बाद ऐसी ही धारणा बनाने के लिए निर्णय लिया गया था कि दोबारा होने वाली नीट परीक्षा के प्रश्नपत्र वायु सेना के विमान से भेजे जाएंगे! उसी राह पर चलते हुए अब केंद्र ने पेपर लीक से संबंधित कानून को पहले से ज्यादा सख्त बनाने का बिल पेश किया है।
मगर सख्त कानून, अत्यधिक कड़ी सज़ा के प्रावधान, और फास्ट ट्रैक कोर्ट जैसी बातें विभिन्न मामलों में इतनी बेअसर साबित हुई हैं कि उनसे युवा वर्ग को संतुष्ट करना अब कठिन हो सकता है। परीक्षा तंत्र को तकनीकी रूप से दुरुस्त करने के उपाय सुझाने के लिए नंदन निलेकणी की अध्यक्षता में बनी समिति उपजी शिकायतों को दूर कर पाएगी, इसकी संभावना भी कम ही है। इसलिए कि पेपर लीक या शिक्षा व्यवस्था में उभरी खामियों की वजह तकनीकी कमजोरियां नहीं हैं। इसकी कुछ वजहें नीतिगत हैं, जबकि ज्यादा दिक्कत सिस्टम में फैले कथित भ्रष्टाचार से उभरी है।
यहां इसे अवश्य ध्यान में रखना चाहिए कि कितना भी दोषमुक्त डिजिटल सिस्टम कायम कर लिया जाए, वह संदिग्ध नियुक्तियों, संस्थाओं की कमजोरी, और शासन-तंत्र में नैतिकता के ह्रास से उत्पन्न होने वाली समस्याओं की भरपाई नहीं कर सकता। ना ही उससे शिक्षा को मुनाफे के कारोबार में तब्दील करने वाली नीतियों से बनी स्थिति का समाधान ढूंढा जा सकता है। पेपर लीक के हालिया मामलों में अंदर तक पहुंच रखने वाले लोगों, कोचिंग संस्थानों, और लीक पेपर खरीदने को तैयार लोगों के बाजार की मिलीभगत के गंभीर आरोप लगे हैं। नीलेकणी समिति इसका क्या समाधान पेश करेगी? अतः मामला व्यवस्थागत है, जिसका सीधा संबंध राजनीतिक इच्छाशक्ति से है। इस स्थिति को सरकार सचमुच बदलना चाहती है, इसके विश्वसनीय संकेत अभी नहीं मिले हैं।
