नया साल, पुरानी चुनौतियां

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नव वर्ष में प्रवेश के अवसर पर सचमुच संकल्प लिया जाए, तो अमन-चैन का लक्ष्य असंभव नहीं है। यह तो अवश्य सुनिश्चित किया जा सकता है कि जब 2026 विदा लेगा, तब हम आज से बेहतर एवं अधिक स्थिर हाल में हों!

नव वर्ष के आरंभ पर यह कामना स्वाभाविक है कि 2026 भारत के लिए खुशहाली एवं अमन- चैन का साल हो। नव वर्ष में प्रवेश के अवसर पर इस दिशा में बढ़ने का सचमुच संकल्प लिया जाए, तो यह लक्ष्य असंभव नहीं है। कम-से-कम यह तो अवश्य सुनिश्चित किया जा सकता है कि 12 महीनों के बाद जब यह साल विदा लेगा, तब हम आज की तुलना में बेहतर एवं अधिक स्थिर स्थिति में हों! लेकिन ऐसा होने की पहली शर्त मौजूद चुनौतियों के साथ-साथ अपनी कमजोरियों को भी स्वीकार करना होगा। नए साल का आगमन उस समय हुआ है, जब आर्थिक एवं सुरक्षा संबंधी एवं भू-राजनीति से जुड़ी समस्याएं बेहद गंभीर हो गई मालूम पड़ती हैं।

गुजरा साल यह अहसास कराते हुए गया कि सीमापार प्रायोजित आतंकवाद के साथ-साथ देश के अंदर भी दहशतगर्दी की प्रवृत्तियां हमला करने की फिराक में हैं। पास-पड़ोस की हालिया घटनाओं ने इस रुझान को ताकत दी है। खासकर बांग्लादेश में जिस तरह की अस्थिरता बनी है और वहां जिस तरह के सियासी हालात हैं, उन्होंने उस सीमा पर भी सतर्कता की जरूरत बढ़ा दी है, जिसको लेकर कुछ समय पहले तक भारत आश्वस्त रहने की स्थिति में था। पाकिस्तान के साथ जुड़ी सरहद पर चुनौतियां और बढ़ी हैं। चीन के साथ संबंध भले कुछ सुधरे हों, मगर रिश्तों की जमीन भुरभुरी ही है। इन सबके ऊपर बनी वैश्विक परिस्थितियां हैं, जिनमें भारत अब संकट के मौके पर अमेरिका से मदद की उम्मीद शायद ही रख सकता है।

ऐसी परिस्थितियों में भारत के पास आंतरिक शक्ति के अलावा भरोसे का कोई और विकल्प नहीं है। दुर्भाग्यपूर्ण है कि देश में अविश्वास, सामुदायिक दुराव, क्षेत्रीय तनाव आदि के कारण साझा मकसद, संपूर्ण एकजुटता, एवं दृढ़ संकल्प को हासिल करना पहले की तुलना में अधिक कठिन हो गया नजर आता है। अतः नव वर्ष का इससे बड़ा संकल्प संभवतः और कुछ नहीं हो सकता कि इन चुनौतियों से पहले पार पाने की तरफ बढ़ा जाए। इसके लिए पहल की स्वाभाविक अपेक्षा राजनीतिक नेतृत्व से ही होगी। क्या वह इस चुनौती के अनुरूप नव वर्ष में आचरण कर पाएगा?


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