‘जब खुली किताब’: रिश्तों के अनकहे पन्ने

पंकज कपूर का किरदार इस कहानी का भावनात्मक केंद्र है। उनका चरित्र एक ऐसे व्यक्ति का है, जो जीवन भर अपने भीतर बहुत कुछ दबा कर जीता रहा है। उसके व्यक्तित्व में एक गहरी चुप्पी है।.. डिंपल कपाड़िया का किरदार इस कहानी में स्मृतियों और भावनाओं की एक महत्वपूर्ण धुरी बनकर उभरता है।  उनके और… Continue reading ‘जब खुली किताब’: रिश्तों के अनकहे पन्ने

अपने गुदगुदे गद्दों की लिप्सा में

युद्ध तीन हफ़्ते चले या तीन महीने, जब ख़त्म होगा तो ईरान अगर हारा तो हार कर भी जीत जाएगा और इज़राइल-अमेरिका जीते भी तो जीत कर हार जाएंगे। इस युद्ध का नतीजा कुछ भी निकले, एक बात तय है कि इस के बाद किसी भी देश पर आक्रमण करने की हिम्मत अमेरिका बरसों-बरस नहीं… Continue reading अपने गुदगुदे गद्दों की लिप्सा में

कबूतरी संचार की पुरानी व्यवस्था

ओडिशा पुलिस की यह सेवा अनूठी है। 1946 में, द्वितीय विश्व युद्ध के ठीक बाद, ओडिशा पुलिस ने इसे शुरू किया। सबसे पहले नक्सल प्रभावित कोरापुट जिले में प्रयोग किया गया। धीरे-धीरे यह 38 स्थानों (जिलों, सब-डिवीजनों, सर्कलों और पुलिस स्टेशनों) तक फैल गई। इस सेवा के चरम पर 19 ‘पिजन लॉफ्ट’ सक्रिय थे, जहां… Continue reading कबूतरी संचार की पुरानी व्यवस्था

दुनिया जलाने का कौन करेंगा फैसला?

सबसे चिंताजनक बात सिर्फ बमबारी नहीं, बल्कि नियमों का कमजोर होना है। जब नागरिक संविधान पर भरोसा खोने लगें, जब अंतरराष्ट्रीय कानून वैकल्पिक लगे, जब संस्थाएं निष्पक्ष फैसले न दे सकें, तब ताकत का सिद्धांत हावी होने लगता है। लोकतंत्र का उद्देश्य यही था कि युद्ध जैसे फैसले जनता की सहमति से हों। नेता शक्ति… Continue reading दुनिया जलाने का कौन करेंगा फैसला?

मुसलमानों को हिन्दू कहना

मोहन भागवत की बातों पर मौलाना मदनी और ओवैसी जरूर हँसे होंगे। जबकि जानकार हिन्दू अपना माथा ठोकते होंगे — यह ऐसा विचित्र है।… संघ नेता अपने कथन के झूठ से परिचित हैं। वरना, इन सौ सालों में उन का कोई सरकार्यवाह या संघचालक कोई भारतीय असदुद्दीन या शहाबुद्दीन भी होता। क्योंकि आर.एस.एस. के अनुसार… Continue reading मुसलमानों को हिन्दू कहना

दिल्ली कुछ काठमांडू से सीखे!

ऐसी कई बाते हैं जो काठमांडू को दिल्ली से बेहतर बनाती हैं। मिसाल के तौर पर यहाँ क़ानून व्यवस्था, दिल्ली की तुलना में काफ़ी व्यवस्थित है। यहाँ के नागरिक बताते हैं कि आधी रात को भी यहाँ महिलाएँ बेझिझक अकेली निकल सकती हैं। किसी भी तरह की छीना-झपटी नहीं होती। न ही महिलाओं के साथ… Continue reading दिल्ली कुछ काठमांडू से सीखे!

होलिका और फाल्गुन का पटविलासिनी रूप

फाल्गुन की मादकता, सौंदर्य और प्रकृति के श्रृंगार को प्राचीन संस्कृत ग्रंथों में “फाल्गुन पटविलासिनी” कहा गया है। ‘पट’ का अर्थ है वस्त्र और ‘विलासिनी’ का अर्थ है क्रीड़ा करने वाली या सजी-धजी नायिका। पटविलासिनी का मतलब है — वह जो सुंदर वस्त्र पहनकर सबको मोहित कर ले। फाल्गुन को पटविलासिनी कहने का अर्थ है… Continue reading होलिका और फाल्गुन का पटविलासिनी रूप

खुद को बेपर्दा करती कांग्रेस

यह सम्मेलन कोई रस्मी जमावड़ा नहीं, बल्कि विश्व की तकनीकी व्यवस्था में भारत की बढ़ती ख्याति का ऐलान था। लेकिन भारत मंडपम के भीतर युवा कांग्रेस कार्यकर्ताओं द्वारा किया गया ‘अर्धनग्न प्रदर्शन’ वैमनस्य का भद्दा प्रदर्शन था। स्वयं राहुल गांधी ने अपने आरोपी कार्यकर्ताओं को ‘बब्बर शेर’ कहकर यह स्पष्ट संदेश दिया है कि प्रधानमंत्री… Continue reading खुद को बेपर्दा करती कांग्रेस

इस तरह बिखरा मोदी का मायाजाल

विडंबना ही कहा जाएगा कि जिन दो शिखर सम्मेलनों से प्रधानमंत्री की वैश्विक या विश्व-गुरु की छवि चमकाने की कोशिश हुई, वे दोनों ही मौके विपरीत परिणाम देने वाले साबित हुए। ऐसा क्यों हुआ, इसे समझना महत्त्वपूर्ण है। मगर उसके पहले इस पर ध्यान देना उचित होगा कि आखिर ये मायाजाल था क्या और इसे… Continue reading इस तरह बिखरा मोदी का मायाजाल

रोशनी की तलाश में भटकते ‘दो दीवाने शहर में’

आज के ‘सिने-सोहबत’ में जो फ़िल्म चर्चा का विषय है वो है ‘दो दीवाने शहर में’ जिसके निर्देशक हैं रवि उद्यावर और लिखा है अभिरुचि चांद ने। मौजूदा दौर में जब हिंदी सिनेमा का बड़ा हिस्सा हिंसा, प्रतिशोध और अंधेरे मनोविज्ञान से भरा हुआ है, दर्शक स्वाभाविक रूप से एक हल्की-फुल्की, संवेदनशील और मुस्कुराहट से… Continue reading रोशनी की तलाश में भटकते ‘दो दीवाने शहर में’

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