तो अब सोने पर सरकारी नजर?

यह बहस सिर्फ सोने की नहीं, बल्कि व्यक्तिगत स्वतंत्रता और सरकारी नियंत्रण की है। वायरल पोस्ट और उसके कमेंट्स ने आम आदमी की चिंता को आवाज दी है। सरकार को इस पर खुली बहस करनी चाहिए। सोना भारत की सांस्कृतिक धरोहर है, इसे सिर्फ वित्तीय संपत्ति बनाकर आम आदमी का भरोसा न खोया जाए। जब… Continue reading तो अब सोने पर सरकारी नजर?

कक्षा में बच्चे हैं पर शिक्षा अनुपस्थित!

पूरी शिक्षा व्यवस्था कक्षा में “उपस्थिति” के उत्पादन पर केंद्रित हो गई, “सीखने” पर नहीं। बच्चा स्कूल में है—यह पर्याप्त माना जाने लगा, चाहे वह कुछ भी सीख रहा हो या नहीं। यह साधारण भ्रष्टाचार नहीं है। यह एक नीति-तर्क है जो कागज़ पर ठीक दिखता है, लेकिन व्यवहार में राष्ट्र की सीखने की क्षमता… Continue reading कक्षा में बच्चे हैं पर शिक्षा अनुपस्थित!

ध्वंस के पार खड़ा सोमनाथ

आक्रमणकारियों ने धन के लोभ में मंदिर को लूटा, लेकिन वे उस श्रद्धा को नहीं लूट सके जो लोगों के हृदय में थी। सोमनाथ का पुनरुत्थान भारत की सांस्कृतिक संप्रभुता की पुनर्स्थापना है। सोमनाथ की यह गाथा केवल एक मंदिर का इतिहास नहीं, बल्कि आर्यावर्त की उस जिजीविषा का जीवंत प्रमाण है, जिसने समय के… Continue reading ध्वंस के पार खड़ा सोमनाथ

शब्दवीर (डींग) हिन्दू परंपरा

अतः यह क्लासिक हिन्दू विकत्थन परंपरा है। बड़े-बड़े शब्द, छोटे-छोटे कर्म। मजबूत से बचना, कमजोर पर चढ़ना। वफादार मजमे में उपदेशना। जहाँ कठिन सवालों का अंदेशा हो, वहाँ गायब रहना। …हिन्दी लेखक निर्मल वर्मा ने पचास वर्ष पहले कहा था: ‘हम सांस्कृतिक रूप से इतने असहाय अंग्रेजों के काल में भी नहीं थे।‘ आज वे… Continue reading शब्दवीर (डींग) हिन्दू परंपरा

जनता की जान की क़ीमत पर वीआईपी सुरक्षा क्यों?

भारतीय मूल का 38 वर्षीय हिमांशु गुलाटी नॉर्वे का तीसरी बार सांसद है और वहाँ का उप-कानून मंत्री भी। उसे कोई वीआईपी सुरक्षा नहीं मिली हुई। उसने मुझे बताया कि नॉर्वे की पिछली प्रधानमंत्री एर्ना सोलबर्ग जब एक बार उसके घर रात्रि भोज पर आईं तो वे बिना किसी सुरक्षा बंदोबस्त के स्वयं कार चला… Continue reading जनता की जान की क़ीमत पर वीआईपी सुरक्षा क्यों?

सीपीएम के सामने है जो असल सवाल

1967 के बाद ऐसी स्थिति आई है, जब देश के किसी भी राज्य में ऐसी सरकार नहीं है, जिसमें कोई कम्युनिस्ट पार्टी शामिल हो। ।।।हाल के वर्षों में वर्ग दृष्टिकोण से हट कर अस्मिता के प्रश्नों को तरहीज देने की प्रवृत्ति अपने को कम्युनिस्ट कहने वाले अनेक दलों/ गुटों में भी बढ़ती चली गई है।… Continue reading सीपीएम के सामने है जो असल सवाल

बंगाल में सुवेंदु युग का आरंभ

संगठन के स्तर पर तृणमूल को चुनौती देना आसान नहीं था। सुवेंदु अधिकारी ने वह चुनौती भी दी और वैचारिक स्तर पर सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की अवधारणा को मजबूती से स्थापित किया।  सुवेंदु अधिकारी ने पश्चिम बंगाल के हिंदू मतदाताओं को यह भरोसा दिलाया कि इस बार भाजपा चुनाव जीतने जा रही है। इसके साथ ही… Continue reading बंगाल में सुवेंदु युग का आरंभ

एक थीं ममता और एक हैं राहुल

राहुल गांधी के फ़राख़-दिल मिज़ाज की बलैयां लेने का मन कर रहा है। पश्चिम बंगाल के चुनाव में राहुल कह रहे थे कि ममता बनर्जी के पिछले पांच बरस का राजकाज एकदम चैपट था, क़ानून-व्यवस्था चरम बदहाली का शिखर छू रही थी और उन्हीं की वज़ह से भारतीय जनता पार्टी को राज्य में अपनी जड़ें… Continue reading एक थीं ममता और एक हैं राहुल

बंगाल में आखिर हुआ क्या?

चुनाव का नैतिक सवाल आंकड़ों से बड़ा है। भाजपा के अनेक आलोचकों का प्रश्न यह नहीं कि ममता बनर्जी हार की हकदार थीं या नहीं? उनकी चिंता कुछ और है—क्या भारत में चुनाव अब ऐसे मुकाबले बनते जा रहे हैं जहां भारी वित्तीय शक्ति, मीडिया प्रभुत्व, केंद्रीय संस्थागत प्रभाव और सामाजिक ध्रुवीकरण मतदान से बहुत… Continue reading बंगाल में आखिर हुआ क्या?

नेहरू निन्दा की इन्तिहा!

मिर्जा गालिब ने कहा था: “गर्मी सही कलाम में लेकिन न इस कदर / की जिस से बात उसने शिकायत जरूर की।” सो, किसी की निन्दा भी अगर बेतरह करते रहो, तो निन्दक की ही शिकायत होने लगती है। हाल के वर्षों में, संसद से‌ लेकर सार्वजनिक भाषणों में भाजपा के बड़े नेता जिस तरह… Continue reading नेहरू निन्दा की इन्तिहा!

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