प्रश्न-फुहार को रोकती मुंह-मोड़ू छतरी

सोचे कि एक हेले और एक अभिजित का छोटा-सा कंकर भी हमारे संसार के समंदर में ऐसा अंधड़ पैदा कैसे कर देता है? इस के बीज कहीं तो हमारी ही शुष्क प्रणालीगत धरती में दफ़्न हैं। ज़रा-सी नमी मिलते ही वे फरफरा कर अंकुरित हो जाते हैं। नहीं क्या? भारत की सियासत आजकल बहुत ही… Continue reading प्रश्न-फुहार को रोकती मुंह-मोड़ू छतरी

सरकार आखिर क्या चाहती बच्चों से?

सोचें, इस साल 18 साल की उम्र के आसपास के जिन बच्चों ने 12वीं की परीक्षा दी थी और साथ ही मेडिकल में दाखिले के लिए नीट की परीक्षा में भी शामिल हुए थे उनकी क्या मनोदशा होगी? यह कितना हृदयविदारक है कि तीन मई को परीक्षा देकर खुशी मना रहे बच्चे फिर से परीक्षा… Continue reading सरकार आखिर क्या चाहती बच्चों से?

लोग अब मोदी को गलत मान रहे राहुल को नहीं

एक साल पहले अहमदाबाद के कांग्रेस अधिवेशन में राहुल ने चेतावनी दी थी कि आर्थिक तूफान आने वाला है। और एक साल जब सरकार ने कुछ नहीं किया केवल बातें, राहुल को गलत साबित करना तो राहुल ने फिर कहा कि आर्थिक तूफान आ गया। और अब खुद प्रधानमंत्री मोदी को मानना पड़ा कि हां… Continue reading लोग अब मोदी को गलत मान रहे राहुल को नहीं

इस शिक्षा प्रणाली से मुक्ति जरूरी!

शिक्षा की मौजूदा व्यवस्था में रचनात्मकता को कुचला जा रहा है। उदाहरण के लिए अधिकतर कक्षाओं में बच्चों को सरल दृश्य बनाने या मानकीकृत उत्तर लिखने को कहा जाता है, न कि स्वतंत्र सोच विकसित करने को। परिणामस्वरूप, वे किसी बड़े कारखाने की असेंबली लाइन से निकलने वाले उत्पादों की तरह एक जैसे बन जाते… Continue reading इस शिक्षा प्रणाली से मुक्ति जरूरी!

रिश्तों की खामोशी, अवसाद की चीख

हमें फिर से ‘ठहरना’ सीखना होगा। बिना मोबाइल के, बिना किसी एजेंडा के। हमें फिर से पूछना होगा, “कैसे हो?” …रिश्ते समय मांगते हैं, उपस्थिति मांगते हैं, और सबसे बढ़ कर। साथ मांगते हैं। समय भी। यदि हम यह नहीं कर पाए, तो आने वाले समय में अवसाद केवल एक चिकित्सकीय समस्या नहीं रहेगा, बल्कि… Continue reading रिश्तों की खामोशी, अवसाद की चीख

उपजाऊ भूमि का विनाश क्यों ?

अणुबम से भी घातक कैमिकल्स, कीटनाशक दवाएं, रासायनिक खाद व जहरीली दवाओं के अमर्यादित प्रयोग से भूमि बंजर बन रही हैं। साथ ही साथ उद्योगों से निकला प्रदूषित जल वाष्पित होकर ऊपर जाता है। फिर प्रदूषित एवं क्षारीय जल की वर्षा से भूमि पूर्णतया बंजर बन रही है। इसी प्रकार इन दवाओं का प्रयोग होता… Continue reading उपजाऊ भूमि का विनाश क्यों ?

बीजिंग में बदल चुकी दुनिया का नज़ारा

फिलहाल चीन ने टकराव को एक सीमा के अंदर रखने और उसे यथासंभव संभालने के लिए आपसी संबंध में ‘रचनात्मक रणनीतिक स्थिरता’ का फॉर्मूला भर दिया है। ये फॉर्मूला तभी तक कारगर रहेगा, जब तक अमेरिका चीन की लक्ष्मण रेखाओं का पालन करे। मगर, अमेरिका के लिए भी लंबे समय तक ऐसा करना कठिन होगा,… Continue reading बीजिंग में बदल चुकी दुनिया का नज़ारा

सुवेंदु सरकार का आगाज तो अच्छा है

शपथ ग्रहण के एक हफ्ते के अंदर सुवेंदु अधिकारी की सरकार ने जो फैसले किए हैं अगर उनको थोड़ी बारीकी से देखें तो उसमें एक तारतम्य नजर आएगा। ऐसा नहीं लगेगा कि फैसले रैंडम हो रहे हैं। वे चूंकि खुद लंबे समय तक सरकार में भी रहे हैं और सरकार के कामकाज को करीब से… Continue reading सुवेंदु सरकार का आगाज तो अच्छा है

‘लालो- कृष्ण सदा सहायते’: आध्यात्म और थ्रिलर का संतुलन

‘लालो– कृष्ण सदा सहायते‘ को केवल एक गुजराती फ़िल्म कह देना उसके प्रभाव को सीमित कर देना होगा। यह दरअसल मनुष्य की भीतरी टूटनों, उसके अपराध बोध और ईश्वर से उसके निजी संवाद की कहानी है। फ़िल्म की सबसे बड़ी खूबी यही है कि यह धार्मिकता को किसी शोरगुल वाले चमत्कार में नहीं बदलती, बल्कि… Continue reading ‘लालो- कृष्ण सदा सहायते’: आध्यात्म और थ्रिलर का संतुलन

केरल को ले कर मीडिया का रोना धोना

कितनी टीवी डिबेटें हुईं इस पर कि पांच दिन हो गए, छह हो गए। अब तो सात हो गए। एंकरों को ऐसा लग रहा था कि वे सख्त से सख्त भाषा में बोलकर कांग्रेस का मुख्यमंत्री बनने को ही रोक देंगे या रोक देंगी! कांग्रेस बना ही नहीं सकती। फैसला लेना ही नहीं आता। अभी… Continue reading केरल को ले कर मीडिया का रोना धोना

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