‘लालो- कृष्ण सदा सहायते’: आध्यात्म और थ्रिलर का संतुलन

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लालोकृष्ण सदा सहायतेको केवल एक गुजराती फ़िल्म कह देना उसके प्रभाव को सीमित कर देना होगा। यह दरअसल मनुष्य की भीतरी टूटनों, उसके अपराध बोध और ईश्वर से उसके निजी संवाद की कहानी है। फ़िल्म की सबसे बड़ी खूबी यही है कि यह धार्मिकता को किसी शोरगुल वाले चमत्कार में नहीं बदलती, बल्कि उसे एक शांत आत्मिक अनुभव की तरह प्रस्तुत करती है।

सिने -सोहबत

आज के सिने-सोहबत में हाल ही में आई एक गुजराती फ़िल्म पर विमर्श करते हैं। गुजराती सिनेमा के इतिहास में समय-समय पर कुछ ऐसी फ़िल्में आती रही हैं जो अपने सीमित संसाधनों के बावजूद दर्शकों की आत्मा तक पहुंचने की ताक़त रखती हैं। निर्देशक अंकित साखिया की फिल्म ‘लालो– कृष्ण सदा सहायते’ ऐसी ही एक दुर्लभ फ़िल्म है, जो केवल मनोरंजन नहीं करती, बल्कि भीतर एक गहरी हलचल भी पैदा करती है। यह फ़िल्म आध्यात्मिकता, अपराधबोध, आत्मस्वीकृति और मोक्ष की ऐसी यात्रा है, जिसे देखने के बाद दर्शक लंबे समय तक उसके प्रभाव से बाहर नहीं निकल पाता।

‘लालो– कृष्ण सदा सहायते’ को केवल एक गुजराती फ़िल्म कह देना उसके प्रभाव को सीमित कर देना होगा। यह दरअसल मनुष्य की भीतरी टूटनों, उसके अपराध बोध और ईश्वर से उसके निजी संवाद की कहानी है। फ़िल्म की सबसे बड़ी खूबी यही है कि यह धार्मिकता को किसी शोरगुल वाले चमत्कार में नहीं बदलती, बल्कि उसे एक शांत आत्मिक अनुभव की तरह प्रस्तुत करती है। यही वजह है कि यह फ़िल्म दर्शकों और आलोचकों, दोनों के बीच असाधारण रूप से सराही गई।

फ़िल्म का कथानक एक साधारण रिक्शा चालक लालो के इर्द-गिर्द घूमता है। लालो कोई महानायक नहीं है। वह हमारे आसपास दिखाई देने वाला वह आम आदमी है जो जीवन की असफलताओं, अपराधबोध और परिस्थितियों के बोझ तले दबा हुआ है। उसके भीतर अतीत की ऐसी परछाइयां हैं जिनसे वह लगातार भागता रहता है। लेकिन जीवन के एक मोड़ पर उसे अपने ही भीतर उतरने के लिए मजबूर होना पड़ता है। यहीं से फ़िल्म एक साधारण सामाजिक ड्रामा से आगे बढ़कर मनोवैज्ञानिक थ्रिलर और आध्यात्मिक यात्रा का रूप ले लेती है।

कई समीक्षकों ने इस फ़िल्म को ‘ओएमजी’ और ‘द शॉशैंक रिडेम्पशन’ का सम्मिलित अनुभव कहा है। यह तुलना सतही नहीं है। ‘ओएमजी’ की तरह फ़िल्म ईश्वर और आस्था को बाहरी कर्मकांड से अलग कर मनुष्य के भीतर खोजती है, जबकि ‘द शॉशैंक रिडेम्पशन’ की तरह यह मुक्ति और आत्मविश्वास की धीमी लेकिन गहरी यात्रा बन जाती है। फ़र्क़ इतना है कि लालो का संसार पूरी तरह भारतीय मिट्टी से बना है। यहां दर्शन किसी भाषण की तरह नहीं आता, बल्कि पात्रों की सांसों में घुला हुआ महसूस होता है।

फ़िल्म का सबसे मजबूत पक्ष उसका भावनात्मक धरातल है। हाल के वर्षों में गुजराती सिनेमा में शहरी प्रेमकथाओं और हल्की-फुल्की कॉमेडी फिल्मों का प्रभाव अधिक रहा है। ऐसे समय में ‘लालो– कृष्ण सदा सहायते’ का ग्रामीण और टियर-2 भारत की वास्तविकताओं से जुड़ा होना इसे अलग पहचान देता है। यह फ़िल्म उन लोगों की कहानी है, जिन्हें अक्सर मुख्यधारा का सिनेमा नज़रअंदाज़ कर देता है। लालो की बेचैनी, उसकी चुप्पियां और उसकी आत्मग्लानि इतनी वास्तविक लगती है कि दर्शक उससे भावनात्मक रूप से जुड़ जाता है।

अभिनय की बात करें तो करण जोशी ने लालो के किरदार में अद्भुत काम किया है। उनका अभिनय किसी नाटकीयता पर निर्भर नहीं करता। वे बेहद संयमित और सहज तरीके से अपने पात्र की टूटन को सामने लाते हैं। कई दृश्यों में केवल उनकी आंखें ही संवाद बन जाती हैं। एक आम आदमी के भीतर चल रहे मानसिक संघर्ष को जिस सादगी से उन्होंने जिया है, वह फ़िल्म की आत्मा बन जाता है।

वहीं श्रुहद गोस्वामी का दोहरी भूमिका में अभिनय फिल्म को आध्यात्मिक ऊंचाई देता है। वे भगवान कृष्ण और लालो की अंतरात्मा, दोनों रूपों में दिखाई देते हैं। उनका स्क्रीन प्रेज़ेन्स किसी उपदेशक जैसा नहीं, बल्कि एक शांत सहयात्री जैसा है। उनके संवादों में एक अजीब-सी आत्मिक शांति है जो दर्शक को भीतर तक प्रभावित करती है। कई बार लगता है कि वे स्क्रीन पर नहीं, सीधे दर्शक के मन से संवाद कर रहे हों।

निर्देशक अंकित साखिया की सबसे बड़ी सफलता यह है कि उन्होंने फ़िल्म को भारी-भरकम दार्शनिक विमर्श बनने से बचा लिया। फिल्म में आध्यात्मिकता है, लेकिन वह बोझिल नहीं होती। मनोवैज्ञानिक थ्रिलर का तत्व है, लेकिन वह केवल रहस्य पैदा करने के लिए नहीं आता। दोनों का संतुलन बेहद संवेदनशीलता से रचा गया है। यही संतुलन फ़िल्म को विशिष्ट बनाता है।

तकनीकी दृष्टि से देखें तो फ़िल्म में कुछ कमियां भी हैं। बीच के हिस्से में इसकी गति थोड़ी धीमी पड़ती है। कुछ दृश्य लंबे महसूस होते हैं और सीमित बजट का असर सिनेमैटोग्राफी तथा प्रोडक्शन डिज़ाइन पर साफ दिखाई देता है। यह फ़िल्म किसी बड़े व्यावसायिक सिनेमा जैसी चमक-दमक नहीं रखती। लेकिन आश्चर्यजनक रूप से यही उसकी ताकत भी बन जाती है। उसकी खुरदरी बनावट उसे और अधिक वास्तविक बना देती है। दर्शक को लगता है कि वह किसी सजे-संवरे सिनेमाई संसार में नहीं, बल्कि असली ज़िंदगी के बीच मौजूद है।

फ़िल्म का संगीत और बैकग्राउंड स्कोर भी उल्लेखनीय है। यहां संगीत भावनाओं को उभारने के लिए अनावश्यक शोर नहीं करता। कई जगहों पर मौन का इस्तेमाल संगीत से अधिक प्रभावशाली बनकर उभरता है। कृष्ण से जुड़े प्रतीकों और ध्वनियों का प्रयोग बहुत सूक्ष्मता से किया गया है। यह फ़िल्म देखने के बाद दर्शक केवल कहानी नहीं याद रखता, बल्कि उसका भावात्मक वातावरण भी अपने भीतर लेकर जाता है।

सबसे दिलचस्प पहलू इसकी व्यावसायिक सफलता है। एक छोटे बजट की, आध्यात्मिक और मनोवैज्ञानिक विषय पर बनी गुजराती फ़िल्म का सौ करोड़ रुपए से अधिक की कमाई करना भारतीय क्षेत्रीय सिनेमा के लिए एक बड़ी घटना है। यह सफलता हमें यह समझाती है कि दर्शक केवल बड़े सितारों और भारी प्रचार पर निर्भर नहीं है। अगर किसी फ़िल्म में सच्ची भावना, गहरी मानवीय संवेदना और आत्मिक ईमानदारी हो, तो वह सीमित संसाधनों के बावजूद लोगों तक पहुंच जाती है। ‘लालो– कृष्ण सदा सहायते’ की सफलता पूरी तरह ऑर्गेनिक वर्ड-ऑफ-माउथ पर आधारित रही। लोगों ने इसे केवल देखा नहीं, बल्कि दूसरों को देखने के लिए प्रेरित भी किया। आज के समय में जब करोड़ों रुपए मार्केटिंग पर खर्च किए जाते हैं, यह फ़िल्म साबित करती है कि भावनात्मक सच्चाई सबसे बड़ी मार्केटिंग होती है।

यह फ़िल्म परिवार के साथ देखी जा सकने वाली दुर्लभ फिल्मों में शामिल है। इसमें न तो सस्ती उत्तेजना है, न अनावश्यक हिंसा। इसके बावजूद यह दर्शक को लगातार बांधे रखती है। इसकी आध्यात्मिकता किसी धर्म विशेष का प्रचार नहीं करती, बल्कि मनुष्य को स्वयं के भीतर झांकने के लिए प्रेरित करती है। यही वजह है कि यह फ़िल्म केवल धार्मिक दर्शकों को नहीं, बल्कि संवेदनशील सिनेमा पसंद करने वाले हर व्यक्ति को प्रभावित करती है।

भारतीय सिनेमा में अक्सर आध्यात्मिक विषयों को या तो अत्यधिक उपदेशात्मक बना दिया जाता है या पूरी तरह चमत्कारवादी। ‘लालो– कृष्ण सदा सहायते’ इस जाल में नहीं फंसती। यह ईश्वर को किसी बाहरी शक्ति की तरह नहीं, बल्कि मनुष्य की भीतरी चेतना की तरह प्रस्तुत करती है। फ़िल्म का मूल संदेश यही है कि मुक्ति बाहर नहीं, भीतर से आती है।

“सिने सोहबत” के पाठकों के लिए यह फ़िल्म इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह हमें याद दिलाती है कि सिनेमा केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं, आत्मचिंतन का भी माध्यम हो सकता है। ऐसी फ़िल्में बहुत कम बनती हैं जो दर्शक को थिएटर से बाहर निकलने के बाद भी भीतर से बदल दें। ‘लालो– कृष्ण सदा सहायते’ उन्हीं चुनिंदा फिल्मों में शामिल है।

दरअसल, ‘लालो– कृष्ण सदा सहायते’ एक धीमा, शांत, आत्मिक और बेहद मानवीय अनुभव है। इसमें चमकदार सिनेमाई पैकेजिंग नहीं है, लेकिन इसकी संवेदनाएं इतनी प्रामाणिक हैं कि वे सीधे दिल में उतर जाती हैं। यह फ़िल्म हमें यह विश्वास दिलाती है कि भारतीय क्षेत्रीय सिनेमा में अभी भी ऐसी कहानियां कही जा रही हैं जो आत्मा को छूने की क्षमता रखती हैं।

‘लालो– कृष्ण सदा सहायते’ केवल एक सफल गुजराती फ़िल्म नहीं, बल्कि उस संभावना का प्रमाण है जहां सिनेमा मनुष्य को उसके भीतर छिपे ईश्वर से मिलाने की ताक़त रखता है।

सिनेमाघरों से तो उतर चुकी है लेकिन ‘सोनी लिव’ पर है। देख लीजिएगा।  (पंकज दुबे पॉप कल्चर क़िस्सागो, उपन्यासकार और मशहूर यूट्यूब चैट शो ‘स्मॉल टाउन्स बिग स्टोरीज़” के होस्ट हैं।)


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