जन मानस पर कैसे छा गए कॉकरोच?

सही वक्त है, जब सरकार को ऐसे तरीके छोड़ कर विरोधियों की बात भी सुननी चाहिए। सोशल मीडिया से हैंडल या पोस्ट हटवाने के तरीके से उसे बाज आना चाहिए। वरना, जिस घुटन और आक्रोश ने कॉकरोचों को अपनी पार्टी बनाने पर मजबूर किया है, वो उनके विरोध को और भी धारदार रूप प्रदान कर… Continue reading जन मानस पर कैसे छा गए कॉकरोच?

बंगाल हर तरह से बदल रहा

घुसपैठियों की पहचान करके उन्हें भारत की सीमा से निकालने का काम युद्धस्तर पर चल रहा है। सिर्फ पश्चिम बंगाल में नहीं, बल्कि बिहार से लेकर राजस्थान तक यह अभियान चल रहा है। पाकिस्तान और बांग्लादेश की सीमा जिन राज्यों के साथ मिलती है वहां बाड़ लगाई जा रही है और सीमा की सुरक्षा को… Continue reading बंगाल हर तरह से बदल रहा

‘सिस्टम’: न्याय, सत्ता और संवेदनाओं के बीच की बेचैनी

भारतीय सिनेमा में अदालतों और न्याय व्यवस्था पर आधारित फ़िल्में हमेशा से दर्शकों को आकर्षित करती रही हैं। ऐसी फ़िल्मों की सबसे बड़ी चुनौती यह होती है कि वे केवल कानूनी बहसों तक सीमित न रह जाएं, बल्कि इंसानी भावनाओं, सामाजिक यथार्थ और सत्ता की जटिलताओं को भी अपने भीतर समेट सकें। अश्विनी अय्यर तिवारी… Continue reading ‘सिस्टम’: न्याय, सत्ता और संवेदनाओं के बीच की बेचैनी

वीआईपी अपराधियों के लिए जेल मानो होटल?

सवाल है कि पैरोल का सिलसिला कानून है या विशेषाधिकार? हरियाणा गुड कंडक्ट प्रिजनर्स एक्ट के तहत कैदियों को पैरोल और फरलो का प्रावधान है। इस कानून के अनुसार, एक साल की सजा पूरी करने के बाद कोई भी कैदी प्रति वर्ष 10 सप्ताह की पैरोल और 21 दिन की फरलो का हकदार है। राम… Continue reading वीआईपी अपराधियों के लिए जेल मानो होटल?

मातृभाषा का हक और लोकतंत्र की कसौटी

राजस्थानी के संदर्भ में सुप्रीम कोर्ट ने जो कहा, वही बात भोजपुरी पर और भी अधिक तीव्रता से लागू होती है। अगर बच्चों को मातृभाषा में शिक्षा का अधिकार है, तो भोजपुरी बोलने वाले करोड़ों बच्चों को यह अधिकार क्यों नहीं मिलना चाहिए? क्या वे कम भारतीय हैं? क्या उनकी भाषा कम समृद्ध है?… सुप्रीम… Continue reading मातृभाषा का हक और लोकतंत्र की कसौटी

इस भीषण गर्मी में सोचे पारंपरिक उपाय

हर पर्यावरणविद् मानता है कि पारंपरिक जलाशयों को सुधार कर उनकी जल संचय क्षमता को बढ़ा कर और सघन वृक्षावली तैयार करके मौसम के मिज़ाज को कुछ हद तक बदला भी जा सकता है। प्रधान मंत्री मोदी का जल शक्ति अभियान और बरसों से चले आ रहे वृक्षारोपण के सरकारी अभियान अगर ईमानदारी से चलाए… Continue reading इस भीषण गर्मी में सोचे पारंपरिक उपाय

बुरी दशा भारतीय मेधा की

एआई के इस दौर में, जहां मशीनें इंसानों की तरह सोचने लगी हैं, इंसानों को उनसे अधिक रचनात्मक और मौलिक बनना होगा। यदि हम राजनीति को संकीर्णता से ऊपर उठाकर राष्ट्र निर्माण की दिशा में ले जा सकें, राष्ट्रीय शिक्षा नीति को सही अर्थों में लागू कर सकें और युवाओं को भयमुक्त वातावरण दे सकें,… Continue reading बुरी दशा भारतीय मेधा की

चीन ने नहीं किया है कोई चमत्कार!

भारत में आज मायूसी है और अब एक बड़ा आर्थिक संकट देश पर मंडरा रहा है, तो कारण 1991 के बाद पूंजी के सामने राज्य का पूर्ण समर्पण में तलाशने की जरूरत है। साथ ही इन प्रश्नों पर विचार की आवश्यकता है कि नेहरूवादी नीतियों के दौर में भारत में सार्वजनिक उद्यम लगाए गए, लेकिन… Continue reading चीन ने नहीं किया है कोई चमत्कार!

सुवेंदु के लिए सनातन प्रथम

सुवेंदु की सरकार ने सभी शिक्षण संस्थानों, जिनमें मदरसे भी शामिल हैं उनमें ‘वंदे मातरम’ का गायन अनिवार्य किया है। ध्यान रहे ‘वंदे मातरम’ कोई धार्मिक गीत नहीं है और अगर इसमें कुछ धार्मिक संदर्भ हैं भी तो वह बंगाल की संस्कृति से जुड़े हैं। बंकिम चंद्र चटोपाध्याय बांग्ला संस्कृति के प्रतिनिधि थे। उनकी रचना… Continue reading सुवेंदु के लिए सनातन प्रथम

‘चांद मेरा दिल’: प्रेम की बदलती भाषा

‘चांद मेरा दिल’ कोई कालजयी प्रेमकथा नहीं है, लेकिन यह पूरी तरह खोखली भी नहीं है। यह सुंदर है, ईमानदार है, संवेदनशील है, और कई क्षणों में प्रभावशाली भी। यह चांद तक पहुंचने वाली फ़िल्म नहीं, लेकिन उसकी रोशनी में बैठकर कुछ देर अपने पुराने प्रेम, अपनी असुरक्षाओं और अपने अधूरे संवादों को याद करने… Continue reading ‘चांद मेरा दिल’: प्रेम की बदलती भाषा

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