जन मानस पर कैसे छा गए कॉकरोच?

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सही वक्त है, जब सरकार को ऐसे तरीके छोड़ कर विरोधियों की बात भी सुननी चाहिए। सोशल मीडिया से हैंडल या पोस्ट हटवाने के तरीके से उसे बाज आना चाहिए। वरना, जिस घुटन और आक्रोश ने कॉकरोचों को अपनी पार्टी बनाने पर मजबूर किया है, वो उनके विरोध को और भी धारदार रूप प्रदान कर सकता है।

कॉकरोच विमर्श ने जिस तरह देश के युवाओं के मन को आंदोलित किया, वह जन मानस के एक बड़े हिस्से में बढ़ रही दिमागी खलबली का संकेत है। भारत के प्रधान न्यायाधीश जस्टिस सूर्य कांत की टिप्पणी से (जिस बारे में बाद उन्होंने स्पष्टीकरण दिया) पैदा हुए आक्रोश को जताने के लिए अमेरिका की बॉस्टन यूनिवर्सिटी में पढ़ रहे एक छात्र ने व्यंग्य की शैली में ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ नाम से सोशल मीडिया का हैंडल बनाया। उस छात्र- यानी अभिजित दीपके- ने खुद कहा है कि तब उन्हें अहसास नहीं था कि उनकी ये पहल एक गंभीर परिघटना बन जाएगी।

परिघटना ने इतना व्यापक रूप लिया कि एक समूह ने सोशल मीडिया पर कॉकरोच जनता पार्टी के समानांतर ‘कॉकरोच पार्टी ऑफ इंडिया’ की शुरुआत की। उस समूह ने सबसे पहले अपने निशाने पर कॉकरोच जनता पार्टी को ही लिया, तो स्वाभाविक रूप से यह शक पैदा हुआ कि यह उन शक्तियों की तरफ से हुई पहल है, जो कॉकरोच विमर्श से विचलित हुई हैं। बात यहीं तक नहीं रुकी। कांग्रेस की युवा शाखा ने ‘मैं भी कॉकरोच’ नाम से अपना अलग सोशल मीडिया अभियान शुरू किया। यानी कॉकरोच जमात के कई संस्करण देखते-देखते अस्तित्व में आ गए। यह दीगर बात है, जैसाकि अक्सर होता है, डुप्लीकेट प्रयास ज्यादा कामयाब नहीं होते।

दरअसल, इस परिघटना के संदर्भ को ध्यान में रखें, तो अभिजित दीपके या एक पहल के रूप में कॉकरोच जनता पार्टी अपने-आप में कोई मुद्दा नहीं हैं। इसलिए ये बात अप्रसांगिक हो जाती है कि दीपके की पृष्ठभूमि क्या रही है अथवा क्या उनकी मुहिम के पीछे किसी राजनीतिक दल (आम आदमी पार्टी) या किसी समूह का हाथ है? जिन यूट्यूबर्स, कथित विश्लेषकों, या पार्टी विशेष के एजेंडे को आगे बढ़ाने वाले पत्रकारों ने इस बात पर ध्यान केंद्रित करने की कोशिश की, उन्होंने असल में समाज में उभर रही एक बड़ी परिघटना पर परदा डालने की कोशिश की है।

  • कॉकरोच जनता पार्टी सोशल मीडिया पर सुपर-डुपर हिट रही, तो उसकी वजह यह है कि ये पहल एक वैसी आक्रोश भरी प्रतिक्रिया का परिणाम है, जिस मानसिकता से देश के लाखों नौजवान/ नागरिक इस वक्त गुजर रहे हैं।
  • बढ़ती अवसरहीनता से युवा वर्ग में असहाय होने के गहराते जा रहे भाव के बीच चीफ जस्टिस ने बेरोजगार नौजवानों को ऐसा परजीवी और कॉकरोच बताया, जो मीडिया एवं सोशल मीडिया के जरिए अथवा आरटीआई एक्टिविस्ट बन कर ‘सिस्टम पर हमला’ करते हैँ। (बाद में जस्टिस सूर्य कांत ने सफाई दी कि उन्होंने ये शब्द उन लोगों के लिए बोले, जो फर्जी डिग्रियां हासिल करने के बाद मीडिया अथवा सोशल मीडिया के जरिए या आरटीआई एक्टिविस्ट बन कर ‘सिस्टम पर हमला’ करते हैँ। मगर इससे इस तथ्य का खंडन नहीं हुआ कि सर्वोच्च पदों पर बैठे लोग अवसर-विहीनता के शिकार व्यक्तियों की मानवीय गरिमा से इनकार करते हुए उन्हें कॉकरोच समझने लगे हैं।)
  • इस टिप्पणी से आहत नौजवान/ नागरिकों के मन में इस पर नाराजगी पैदा हुई, तो वह एक स्वाभाविक प्रतिक्रिया है। अभिजित दीपके ने अपनी सोशल मीडिया पहल से उन लोगों को अपनी भावना को व्यक्त करने का मंच प्रदान किया, जो इसी तरह की प्रतिक्रिया से उबल रहे थे। इसीलिए देखते-देखते एक्स (ट्विटर) से लेकर इंस्टाग्राम तक कॉकरोच जनता पार्टी के हैंडल्स को करोड़ों नौजवानों/ नागरिकों ने अपना लिया।
  • वहां जिस तरह के रील, पोस्ट एवं अन्य कंटेंट डाले गए हैं, उनका गंभीर अध्ययन करने की जरूरत है। उनमें इन नौजवानों के मन में मौजूद निराशा, आक्रोश, असहाय होने के बोध, तथा इन सबसे जनित एक खास किस्म के विद्रोह की झलक मिलती है।
  • ये बात ध्यान खींचती है कि राम जन्मभूमि- बाबरी मस्जिद आंदोलन के दौर में जब भारतीय जनता पार्टी उभार शुरू हुआ, तब से इस पार्टी और इसके सर्वोच्च नेतृत्व के प्रति गैर-दलीय युवा वर्ग में इस तरह का अपमान का भाव पहले कभी देखने को नहीं मिला था। शासक वर्ग के भाजपा पर अपना पूरा दांव लगाने और इसके परिणास्वरूप इस दल के नेताओं के मीडिया का डार्लिंग बने रहने के पूरे दौर में अपमान, मखौल, और गुस्से का केंद्र विपक्ष- खासकर कांग्रेस के नेता रहे हैं। ये बात उस दौर पर भी लागू होती है, जब कांग्रेस नेतृत्व वाली यूपीए सरकार सत्ता में रही।
  • इस सिलसिले में यह देखना भी महत्त्वपूर्ण है कि कॉकरोच जनता पार्टी के समर्थक युवा मोटे तौर पर उच्च मध्य वर्ग एवं मध्य वर्ग से संबंधित हैं। ये वो तबका है, जिसके पास स्मार्ट फोन और तीव्र रफ्तार का इंटरनेट उपलब्ध है तथा जो राजनीतिक व्यंग्य या कथानक गढ़ने की योग्यता रखता है। कॉकरोच जनता पार्टी हैशटैग (#CJP) के साथ पोस्ट किए गए कंटेन्ट का बहुत बड़ा हिस्सा अंग्रेजी में है। वह भी उस कंटेन्ट को तैयार करने वाले युवाओं के सामाजिक वर्ग का संकेत है।
  • उल्लेखनीय है कि कॉकरोच जनता पार्टी ने अपना पहला सोशल मीडिया अभियान नीट परीक्षा के पेपर लीक के सिलसिले में शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के लिए चलाया। नीट मेडिकल कॉलेजों में दाखिले का इम्तहान है, जिसमें मोटे तौर पर उच्च मध्य और मध्य वर्गीय परिवारों के बच्चे हिस्सा लेते हैं। लाजिम है कि नीट पेपर लीक का मसला उन तबकों को ज्यादा उद्वेलित करता है।
  • वैसे, पेपर लीक का पैटर्न अब आम हो चुका है। विपक्ष का आरोप है कि 2014 के बाद से प्रवेश परीक्षा या नौकरी भर्ती के लिए होने वाले इम्तहान में 80 से ज्यादा बार पेपर लीक की घटनाएं हुई हैं। प्रवेश या भर्ती परीक्षाओं के आयोजन में कुव्यवस्था, उनकी साख पर संदेह, परीक्षा होने के बाद रिजल्ट आने में अनपेक्षित देर और रिजल्ट आने के बाद भी नौकरी ज्वाइनिंग का लंबित रहना- ऐसी आम हो चुकी घटनाएं हैं, जो संबंधित समूहों में या तो घुटन पैदा करती हैं, या नाराजगी।
  • पृष्ठभूमि ऐसे ही अहसासों से बनी। उसी बीच चीफ जस्टिस की टिप्पणी आई। और फिर नीट पेपर के लीक होने से व्यग्रता फैली। इसी बीच सीबीएसई की 12वीं की परीक्षा के ऑन स्क्रीन मार्किंग सिस्टम में जाहिर हुई गड़बड़ियों ने युवा वर्ग में अविश्वास और आक्रोश को और बढ़ाया है।
  • सोशल मीडिया पर कॉकरोच जनता पार्टी को मिली सफलता के पीछे ऐसी घटनाओं की प्रमुख भूमिका है।

वैसे, घुटन के माहौल का संबंध सिर्फ पेपर लीक या बढ़ती जा रही बेरोजगारी से नहीं है। बल्कि इसमें उतना ही योगदान करने वाला पहलू यह गहराता अहसास है कि देश में जो हो रहा है, उसके लिए कोई जवाबदेह नहीं है! जनमत के एक बड़े हिस्से में धारणा बनी है कि जवाबदेही तय करने वाली संस्थाओं पर “कब्जा” कर लिया गया है।

लोकतंत्र में जवाबदेही तय करने का आखिरी माध्यम चुनाव होते हैं, लेकिन चुनावों को लेकर जनता के एक बड़े हिस्से में अविश्वास भर गया है। इसके बीच लोग अक्सर यह कहते सुने जाते हैं कि सत्ता के शिखर पर बैठे लोगों ने सत्ता में बने रहने का अचूक फॉर्मूला ढूंढ लिया है!

अभिजित दीपके के साथ एक मीडिया इंटरव्यू में एंकर ने उन्हें इस सवाल से काउंटर किया कि लोग भाजपा को वोट दे रहे हैं, भाजपा लगातार चुनाव जीत रही है। तो इस पर दीपके ने चुनौती दी- तो आइए, पहले इस पर ही चर्चा करते हैं कि भाजपा चुनाव कैसे जीतती है! स्पष्टतः इस चुनौती में चुनाव प्रक्रिया को लेकर गहरे अविश्वास का भाव छिपा हुआ है।

न्यायपालिका और निर्वाचन प्रक्रिया की साख अक्षुण्ण रहे, इस बात को लेकर लंबे समय से चेतावनी दी जा रही थी। बार-बार उल्लेख किया गया कि न्याय का ना सिर्फ होना जरूरी है, बल्कि न्याय होते हुए दिखना भी अनिवार्य है। इसी तरह चुनाव प्रक्रिया में सबका भरोसा बने रहना राजनीतिक एवं सामाजिक स्थिरता के लिए अनिवार्य है। आज मुद्दा यह नहीं है कि क्या न्याय करने की कसौटी पर न्यायपालिका कहीं कमजोर पड़ी है या क्या सचमुच भारत में चुनाव नतीजे जनमत को प्रतिबिंबित नहीं कर रहे हैं। मुद्दा यह है कि इनको लेकर समाज के एक हिस्से में संदेह पैदा हो गया है। जब न्यायालयों के बाहर विरोध प्रदर्शन होने लगें, अदालतों में याचिका देकर न्यायाधीशों से मुकदमा विशेष से अलग होने की गुजारिश की जाने लगे, विपक्ष के नेता वोट चोरी के इल्जाम लगाने लगें, और मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण की खामियां मीडिया की सुर्खियों में हों, तो संदेह का माहौल स्वाभाविक रूप से बनता है।

एक तरफ यह माहौल है, तो दूसरी तरफ ढहते हुए वे कथानक हैं, जिनके जरिए भारतवासियों के एक बहुत बड़े हिस्से को यह बताया गया था कि आखिरकार अब भारत का वक्त आ गया है। इस धारणा के पीछे एक तरफ देश की तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था से जुड़ी कहानियां थीं, तो दूसरी ओर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की गढ़ी गई यह छवि कि दुनिया में बिना उनसे पूछे कोई बड़ा काम नहीं होता। ये धारणा भी बनाई गई कि मोदी के प्रधानमंत्री बनने के पहले जहां भारत को कोई पूछता नहीं था, वहीं अब इस देश की हर जगह इज्जत हो रही है! रुतबा इतना है कि जब मोदी ने चाहा तो रूस और यूक्रेन युद्ध रोकने तक के लिए राजी हो गए!

इन कहानियों ने देश के अंदर सघन होते प्रदूषण, जर्जर होते इन्फ्रास्ट्रक्चर, हंगर इंडेक्स में गिरावट से लेकर फ्रीडम, हैप्पीनेस और अभिव्यक्ति की आजादी पर कसते शिकंजे, राजनीतिक ध्रुवीकरण और कुल मिलाकर बदहाल होती आम जन की हालत पर से लोगों का ध्यान हटाए रखा।

  • मगर अब सामने यह है कि इनमें से बहुत-सी कहानियों को गढ़ने में खास योगदान रखने वाले अर्थशास्त्री सुरजीत भल्ला मीडिया के सामने आकर बता रहे हैं कि भारत के ‘सबसे तेज गति से बढ़ रही अर्थव्यवस्था’ होने का दावा बेबुनियाद है।
  • उनकी तरह ही इस सरकार के महिमामंडन में जुटे रहे अर्थशास्त्री अशोक गुलाटी अब कह रहे हैं कि देश 1991 के जैसे भुगतान संतुलन के संकट का सामना कर रहा है।
  • अंग्रेजी के अखबार ग्राफ और सारणियों के साथ बता रहे हैं कि भले ये संकट ईरान युद्ध से गहरा गया हो, लेकिन इसकी जड़ें कई वर्ष पहले तक जाती हैं।
  • मोदी सरकार के पूर्व मुख्य आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रह्मण्यम ने तो उन लोगों को बदल देने की वकालत की है, जो अर्थव्यवस्था के “प्रभारी” हैं। उन्होंने प्रभारियों की पहचान नहीं की है, इसलिए ये साफ नहीं है कि उनका निशाना किस पर है, लेकिन आम समझ यह है कि बीते 12 साल से आर्थिक समेत तमाम प्रमुख फैसले प्रधानमंत्री कार्यालय में होते हैं!
  • अजीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी की State of Working India 2026 रिपोर्ट ने बताया भारत अपने डेमोग्राफिक डिविडेंड के शिखर पर पहुंच रहा है और पर्याप्त रोजगार सृजन नहीं हुआ, तो यह अवसर आर्थिक लाभ में नहीं बदल पाएगा।
  • और जो बेरोजगारी है, वह तो इस देश की सबसे भीषण समस्या है। उसके ही शिकार नौजवानों को कॉकरोच कहा गया और वही कॉकरोच सोशल मीडिया पर विद्रोही तेवर में सामने आए हैं।

डॉनल्ड ट्रंप के दोबारा राष्ट्रपति बनते ही उनके प्रशासन ने भारत पर ऐसे तीर दागने शुरू किए, जिससे विश्व गुरु वाली छवि लहूलुहान होती चली गई है। इसके पहले भी हरदीप सिंह निज्जर और गुरपतवंत सिंह पन्नू के मामले में कनाडा और अमेरिका ने भारत पर जैसे इल्जाम लगाए और अमेरिका के आरोपों पर भारत सरकार ने जैसी चुप्पी साधी, उससे रसूख की मनोगत धारणा पर गहरी चोट हो चुकी थी। दरअसल, ट्रंप प्रशासन के आगे साधी गई चुप्पियों, रूस से तेल खरीदने के लिए उसकी ‘इजाजत’ पर निर्भरता, और अमेरिका से असमान व्यापार समझौते की जाहिर हुई मजबूरी ने देशवासियों के मनोबल पर प्रहार किया है।

इस बीच पश्चिम एशिया युद्ध में लगभग अप्रासंगिक भूमिका और इस दौरान पाकिस्तान की बढ़ी कूटनीतिक हैसियत ने भी विश्व गुरु की छवि पर सवाल खड़े किए हैं। इसके पहले ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भारत के अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जाहिर हुए अलगाव ने कूटनीतिक मोर्चे पर भारत की वास्तविक स्थिति को लेकर लोगों के मन में उद्वेलन पैदा किया था।

इन सूरतों से देश का वर्तमान चुनौती भरा नजर आने लगा है, तो भविष्य को लेकर आशान्वित होने का आधार भी कमजोर पड़ता मालूम पड़ा है। स्पष्टतः इन स्थितियों के लिए लोग वर्तमान सरकार को जवाबदेह मानते हैं। मगर मोदी सरकार अपनी कोई जवाबदेही नहीं मानती। वह किसी समस्या या चुनौती पर देश से संवाद नहीं करती। वह अपने अलावा किसी और को भरोसे में लेने की जरूरत नहीं समझती। उलटे खामियों को उजागर करने या जवाबदेही की मांग करने वालों को ‘देशद्रोही, पाकिस्तान समर्थक, जॉर्ज सोरोस का एजेंट’ आदि बता देने का उसका नाकाम होता हुआ टूलकिट है, जो अभी कुछ वर्ष पहले तक काफी कारगर रहता था।

कॉकरोचों का उठ खड़ा होना भी यही बताता है कि ऐसे टूलकिट अब नाकाम हो रहे हैं। अब वो सही वक्त है, जब सरकार को ऐसे तरीके छोड़ कर विरोधियों की बात भी सुननी चाहिए। सोशल मीडिया से हैंडल या पोस्ट हटवाने के तरीके से उसे बाज आना चाहिए। वरना, जिस घुटन और आक्रोश ने कॉकरोचों को अपनी पार्टी बनाने पर मजबूर किया है, वो उनके विरोध को और भी धारदार रूप प्रदान कर सकता है।


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