कभी-कभी कोई फ़िल्म बॉक्स ऑफिस पर नहीं चलती, वह समाज के भीतर चलती है। ‘हनुमान अंश’ के साथ कुछ ऐसा ही होता हुआ दिखाई देता है। लगभग दो करोड़ की लागत से बनी यह फ़िल्म तीन सौ करोड़ से ज़्यादा का वैश्विक कारोबार कर चुकी है। लेकिन इस वाक्य में सबसे महत्वपूर्ण शब्द दो करोड़ या तीन सौ करोड़ नहीं है। सबसे महत्वपूर्ण शब्द है, दर्शक।
‘हनुमान अंश’ की तीन सौ करोड़ से ज़्यादा की यात्रा को सिर्फ़ एक फ़िल्म की सफलता की तरह देखना शायद उसके साथ नाइंसाफ़ी होगी। यह उस दर्शक की कहानी भी है जो तेज़ी से बदलती दुनिया में किसी स्थिर, भरोसेमंद और आत्मीय चीज़ की तलाश में है। लेकिन क्या सिनेमा उसे सिर्फ़ विश्वास दे या विश्वास के भीतर सवाल करने की जगह भी?
कभी-कभी कोई फ़िल्म बॉक्स ऑफिस पर नहीं चलती, वह समाज के भीतर चलती है। ‘हनुमान अंश’ के साथ कुछ ऐसा ही होता हुआ दिखाई देता है। लगभग दो करोड़ की लागत से बनी यह फ़िल्म तीन सौ करोड़ से ज़्यादा का वैश्विक कारोबार कर चुकी है। लेकिन इस वाक्य में सबसे महत्वपूर्ण शब्द दो करोड़ या तीन सौ करोड़ नहीं है। सबसे महत्वपूर्ण शब्द है, दर्शक। वह दर्शक, जिसने शुरुआत में इस फ़िल्म को शायद कोई बड़ी सिनेमाई घटना नहीं माना। जिसने फिर किसी दोस्त से इसके बारे में सुना। किसी परिवार के सदस्य ने कहा, “एक बार देखना”। किसी सोशल मीडिया पोस्ट ने उत्सुकता जगाई। किसी ने फ़िल्म देख कर अपनी अनुभूति साझा की। और धीरे-धीरे एक फ़िल्म, फ़िल्म से बढ़ कर एक अनुभव बन गई।
यही सिनेमा की सबसे पुरानी और सबसे ताक़तवर मार्केटिंग है, किसी दूसरे इंसान का विश्वास। और इसलिए ‘हनुमान अंश’ को समझने के लिए हमें आज से नहीं, 1975 से शुरुआत करनी चाहिए। ‘जय संतोषी मां’। एक ऐसी फ़िल्म, जिसने उस दौर में धार्मिक सिनेमा को सिर्फ़ एक जॉनर नहीं रहने दिया, बल्कि उसे सामूहिक आस्था के अनुभव में बदल दिया। कई जगह दर्शक सिनेमाघर में फ़िल्म देखने नहीं, मानो दर्शन करने जाते थे। फूल चढ़ते थे, आरती होती थी, और फ़िल्म का पर्दा कुछ समय के लिए पूजा और सिनेमा के बीच की सीमा को धुंधला कर देता था।
सोचिए, 1975 का भारत। न सोशल मीडिया था, न इंस्टाग्राम, न यूट्यूब, न डिजिटल मार्केटिंग। लेकिन वर्ड ऑफ़ माउथ था। मोहल्ला था। परिवार था। भरोसा था। आज 51 साल बाद तकनीक बदल गई है। दर्शक की जेब में पूरा मीडिया संसार आ गया है। लेकिन मनुष्य की कुछ ज़रूरतें शायद उतनी नहीं बदलीं। उसे अभी भी उम्मीद चाहिए। उसे अभी भी किसी ऐसी कहानी की ज़रूरत है जो कहे कि अंधेरे के बाद उजाला होता है। उसे अभी भी किसी ऐसे पात्र की तलाश होती है जिसके सामने वह अपने निजी दुःख, अपनी असुरक्षा और अपनी असमर्थता रख सके। और शायद यही वह जगह है जहां आस्था सिनेमा से मिलती है।
हम अक्सर पूछते हैं कि लोग धार्मिक फ़िल्में क्यों देख रहे हैं? मुझे लगता है, हमें इसके उलट सवाल पूछना चाहिए। आज के समय में लोगों को ऐसी फ़िल्मों की ज़रूरत क्यों महसूस हो रही है? हम एक ऐसे समय में हैं जहां जानकारी की कोई कमी नहीं है, लेकिन निश्चितता की बहुत कमी है। हमारे पास हर सवाल का उत्तर खोजने के लिए गूगल है, लेकिन हर बेचैनी का उत्तर नहीं है। हमारे पास दुनिया से जुड़े रहने के लिए सोशल मीडिया है, लेकिन अपने भीतर टिके रहने का हुनर कम होता जा रहा है। हमारे पास विकल्प बहुत हैं, लेकिन शांति कम है। ऐसे समय में आस्था एक भावनात्मक आश्रय बन सकती है। इसमें कुछ भी असामान्य नहीं है।
मनुष्य जब अनिश्चितता से घिरता है, तो वह अर्थ खोजता है। कभी दर्शन में। कभी प्रेम में। कभी कला में। कभी राजनीति में। और कभी ईश्वर में। इसलिए किसी धार्मिक फ़िल्म के दर्शक को पिछड़ा हुआ, अंधविश्वासी या अविवेकी मान लेना शायद सबसे आसान और सबसे ग़लत रास्ता होगा। वह दर्शक भी हमारी तरह ही जटिल है। वह मंदिर भी जाता है और अस्पताल भी। वह भगवान से प्रार्थना भी करता है और डॉक्टर की रिपोर्ट भी देखता है। वह अपने बच्चे को विज्ञान पढ़ाता है और घर में पूजा भी करता है। भारत की असली कहानी शायद इसी सह अस्तित्व में है। और इसलिए असली सवाल यह नहीं है कि आस्था हो या तर्क। सवाल यह है कि क्या आस्था और तर्क साथ रह सकते हैं? मेरे लिए जवाब होना चाहिए, हां।
भारतीय परंपरा की एक बड़ी खूबी यही रही है कि यहां प्रश्न पूछने की परंपरा भी उतनी ही पुरानी है जितनी प्रार्थना की। उपनिषदों में संवाद हैं। बुद्ध के सामने प्रश्न हैं। कबीर के यहां सवाल हैं। नानक की वाणी में जिज्ञासा है। हमारी आध्यात्मिक परंपरा ने हमेशा मनुष्य को सिर्फ़ सिर झुकाना नहीं सिखाया; कई बार उसने सिर उठाकर देखने को भी कहा है। फिर सिनेमा क्यों न पूछे? यहीं ‘हनुमान अंश’ मेरे लिए एक दिलचस्प फ़िल्म बन जाती है। एक संत की कहानी को पर्दे पर उतारना अपने आप में मुश्किल काम है। क्योंकि संत के जीवन में चमत्कार दिखाना आसान है, लेकिन उनकी मनुष्यता दिखाना मुश्किल। चमत्कार आंखों को आकर्षित करता है। मनुष्यता दिल में ठहरती है।
अगर किसी संत की पूरी सिनेमाई यात्रा सिर्फ़ इस बात पर टिकी हो कि उन्होंने कितने चमत्कार किए, तो हम शायद उनके सबसे बड़े चमत्कार को ही भूल जाएंगे कि उन्होंने लोगों के जीवन को कैसे छुआ? किसी डरे हुए आदमी को साहस देना क्या चमत्कार नहीं है? किसी टूटे हुए इंसान को अपने पैरों पर खड़ा कर देना क्या चमत्कार नहीं है? किसी भूखे को खाना देना? किसी अकेले के पास बैठना?
किसी के दुःख को बिना जज किए सुन लेना?
शायद सिनेमा का सबसे सुंदर आध्यात्मिक क्षण वह नहीं होता जब आसमान से कोई चमत्कार उतरता है। वह होता है जब एक इंसान दूसरे इंसान के लिए खड़ा होता है। और यहीं से धार्मिक सिनेमा की अगली यात्रा शुरू हो सकती है। हमें संतों की कहानियां चाहिए। लेकिन हमें उनके भीतर के इंसान की कहानियां भी चाहिए। हमें आस्था चाहिए। लेकिन उसके साथ सवाल भी चाहिए। हमें चमत्कार चाहिए। लेकिन उसके साथ चरित्र भी चाहिए। हमें भगवान चाहिए। लेकिन उसके साथ इंसान भी चाहिए। क्योंकि अगर भगवान को बड़ा करने के लिए इंसान को छोटा करना पड़े, तो शायद हमने भगवान को समझा ही नहीं।
‘हनुमान अंश’ जैसी फ़िल्मों के बहाने एक और सामाजिक सवाल उठता है, जिस पर हमारी फ़िल्में बहुत कम बात करती हैं। जब कोई व्यक्ति भौतिक संसार छोड़कर आध्यात्मिक यात्रा पर निकलता है, तो पीछे कौन रह जाता है? उसकी पत्नी? उसके बच्चे? उसके माता-पिता? उसकी रोज़मर्रा की ज़िम्मेदारियां? हम अक्सर त्याग की कहानी सिर्फ़ उस व्यक्ति की नज़र से देखते हैं, जिसने घर छोड़ा। लेकिन जिसने घर में रहकर जीवन सम्भाला, उसका त्याग किस कहानी में है? यह सवाल किसी संत की महानता को कम नहीं करता, बल्कि त्याग की परिभाषा को और मानवीय बनाता है। और शायद यही वह जगह है, जहां भविष्य का आध्यात्मिक सिनेमा हमारे समय से संवाद कर सकता है।
आज की महिला अपने पति की आध्यात्मिक यात्रा की सिर्फ़ दर्शक नहीं है। वह उस यात्रा की सामाजिक कीमत को भी समझती है। आज का परिवार भी बदल चुका है। आज का दर्शक भी। इसलिए आने वाली धार्मिक फ़िल्में अगर सिर्फ़ पुराने सांचे दोहराएंगी, तो वे शायद उस दर्शक से आधा ही संवाद कर पाएंगी, जिसके लिए वे बनाई जा रही हैं। ‘जय संतोषी मां’ के समय आस्था का सिनेमाई अनुभव सामूहिक था। ‘हनुमान अंश’ के समय वह सामूहिक होने के साथ-साथ डिजिटल भी है। लेकिन दोनों के बीच एक अदृश्य धागा वही है- कहानी पर विश्वास।
और शायद सिनेमा का भविष्य भी यहीं छिपा है। अगर निर्माता इस सफलता से सिर्फ़ यह सीखेंगे कि “धार्मिक फ़िल्म बनाओ, कम बजट रखो और तीन सौ करोड़ कमाओ”, तो वे सबसे ज़रूरी बात नहीं समझेंगे। दर्शक फ़ॉर्मूला नहीं खरीदता। दर्शक विश्वास खरीदता है। और विश्वास की नकल नहीं की जा सकती।
एक और संत की कहानी बना देने से वही परिणाम नहीं आएगा। एक और चमत्कार दिखा देने से वही भाव पैदा नहीं होगा। एक और भक्ति गीत डाल देने से वही सामूहिक अनुभव नहीं बनेगा। क्योंकि दर्शक को कहानी में कुछ अपना मिलना चाहिए। यही वजह है कि ‘हनुमान अंश’ की सफलता को केवल धार्मिक फ़िल्मों की सफलता कह देना भी अधूरा होगा। यह उस भारतीय दर्शक की वापसी है जो शायद बहुत समय से अपने सिनेमा में अपने सांस्कृतिक अनुभव की कोई सच्ची प्रतिध्वनि खोज रहा था।
लेकिन यहां सिनेमा की ज़िम्मेदारी भी शुरू होती है। आस्था को बेचने और आस्था को समझने में फ़र्क़ है। पहले रास्ते में फ़ॉर्मूला बनता है। दूसरे में सिनेमा। और मुझे उम्मीद है कि इस नई लहर में दूसरा रास्ता चुना जाएगा। ऐसी फ़िल्में बनेंगी जो धार्मिक हों, लेकिन प्रचारात्मक नहीं। जो आध्यात्मिक हों, लेकिन उपदेशात्मक नहीं। जो चमत्कार दिखाएं, लेकिन सवाल से न डरें। जो परंपरा का सम्मान करें, लेकिन इंसान की स्वतंत्र सोच का भी। क्योंकि हमारा संविधान भी नागरिकों में वैज्ञानिक दृष्टिकोण, मानवतावाद और जिज्ञासा की भावना विकसित करने की बात करता है।
इसका मतलब यह नहीं कि भारत को अपनी आस्था छोड़ देनी चाहिए। इसका मतलब शायद यह है कि भारत अपनी आस्था को इतना मज़बूत बनाए कि वह सवाल सह सके। मुझे लगता है, यही हमारे समय की सबसे सुंदर सिनेमाई संभावना है। एक ऐसी फ़िल्म जहां कोई बच्चा मंदिर में हाथ जोड़कर खड़ा हो और उसी शाम अपने पिता से पूछे- “भगवान होते कहां हैं”? और पिता उसके सवाल से डरने के बजाय मुस्कुराकर कहे- “शायद यह सवाल पूछना भी भगवान को खोजने का एक रास्ता है”। अगर हमारा सिनेमा वहां तक पहुंच गया, तो उसने सिर्फ़ फ़िल्म नहीं बनाई। उसने समाज के भीतर एक संवाद शुरू किया। और शायद ‘हनुमान अंश’ की असली उपलब्धि यही है कि उसने यह संवाद फिर से शुरू कर दिया है।
तीन सौ करोड़ की संख्या कल किसी और फ़िल्म की हो सकती है। लेकिन जिस समय का कोई सवाल सिनेमा के ज़रिए हमारे भीतर उतर जाता है, वह संख्या से कहीं ज़्यादा देर तक रहता है। आस्था रहे। ज़रूर रहे। क्योंकि आस्था मनुष्य को संभाल सकती है। लेकिन उसके साथ विवेक भी रहे। क्योंकि विवेक मनुष्य को गिरने से बचा सकता है। और सवाल? सवाल तो रहने ही चाहिए। क्योंकि जिस आस्था को एक सवाल से डर लगने लगे, वह शायद आस्था से ज़्यादा भय बन जाती है। और जिस आस्था के भीतर सवाल के लिए जगह हो, वह शायद इंसान को ईश्वर के थोड़ा और क़रीब ले जाती है। सिनेमा का काम हमारी आस्था छीनना नहीं है। उसका काम शायद इतना भर है कि वह हमें अपनी आस्था को थोड़ा और गहराई से देखने का मौक़ा दे। फ़िल्म ख़त्म होती है। लेकिन सवाल वहीं से शुरू होता है।
‘हनुमान अंश’ के तीन सौ करोड़ सिर्फ़ एक फ़िल्म की कमाई नहीं, उस दर्शक की तलाश भी हैं जो बदलती दुनिया में भरोसा, अर्थ और शायद अपने भीतर का कोई जवाब खोज रहा है।
बहरहाल, आपके नज़दीकी सिनेमाघरों में है। देख लीजिएगा। (पंकज दुबे पॉप कल्चर क़िस्सागो, उपन्यासकार और यूट्यूब चैट शो ‘स्मॉल टाउन्स बिग स्टोरीज़”के होस्ट हैं।)
