‘सिस्टम’: न्याय, सत्ता और संवेदनाओं के बीच की बेचैनी

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भारतीय सिनेमा में अदालतों और न्याय व्यवस्था पर आधारित फ़िल्में हमेशा से दर्शकों को आकर्षित करती रही हैं। ऐसी फ़िल्मों की सबसे बड़ी चुनौती यह होती है कि वे केवल कानूनी बहसों तक सीमित न रह जाएं, बल्कि इंसानी भावनाओं, सामाजिक यथार्थ और सत्ता की जटिलताओं को भी अपने भीतर समेट सकें। अश्विनी अय्यर तिवारी द्वारा निर्देशित नई हिंदी फ़िल्म ‘सिस्टम’ इसी चुनौती को स्वीकार करती है। आज के सिने-सोहबत में इसी फ़िल्म पर चर्चा करते हैं। ‘सिस्टम’ केवल एक कोर्टरूम ड्रामा नहीं है, बल्कि उस व्यवस्था की पड़ताल है जिसमें सच, शक्ति और विशेषाधिकार अक्सर एक-दूसरे से टकराते दिखाई देते हैं। फ़िल्म में सोनाक्षी सिन्हा और ज्योतिका मुख्य भूमिकाओं में हैं, जबकि आशुतोष गोवारिकर जैसे अनुभवी कलाकार कहानी को अतिरिक्त वजन देते हैं।

‘सिस्टम’ की कहानी दो महिलाओं के इर्द-गिर्द घूमती है। एक ओर है नेहा राजवंश, जो विशेषाधिकार प्राप्त दुनिया से आने वाली सरकारी वकील है, और दूसरी ओर है सारिका रावत, जो अदालत की दुनिया में अपेक्षाकृत निचले पायदान पर खड़ी एक स्टेनोग्राफर है। दोनों अलग-अलग सामाजिक पृष्ठभूमियों से आती हैं, लेकिन न्याय व्यवस्था के भीतर मौजूद असमानताओं और सत्ता के खेल से उनका सामना उन्हें एक साझा संघर्ष की ओर ले जाता है। फ़िल्म का मूल प्रश्न यही है कि क्या न्याय वास्तव में सबके लिए समान है, या फिर व्यवस्था केवल शक्तिशाली लोगों के पक्ष में काम करती है?

निर्देशक अश्विनी अय्यर तिवारी ने अपने करियर में अक्सर साधारण लोगों की असाधारण कहानियां कही हैं। ‘निल बट्टे सन्नाटा’, ‘बरेली की बर्फी’ और ‘पंगा’ जैसी फ़िल्मों में उन्होंने छोटे शहरों, पारिवारिक रिश्तों और व्यक्तिगत संघर्षों को बड़ी संवेदनशीलता के साथ प्रस्तुत किया था। ‘सिस्टम’ में वह पहली बार अपेक्षाकृत गहरे और गंभीर कोर्टरूम स्पेस में प्रवेश करती हैं। यह बदलाव दिलचस्प है क्योंकि यहां उनका परिचित मानवीय दृष्टिकोण तो मौजूद है, लेकिन उसके साथ एक राजनीतिक और संस्थागत आलोचना भी जुड़ जाती है।

फ़िल्म का सबसे मजबूत पक्ष इसका वातावरण है। अदालत की कार्यवाही, कानूनी प्रक्रियाएं और उनके पीछे छिपी शक्ति संरचनाएं काफी विश्वसनीय लगती हैं। कैमरा अक्सर पात्रों के चेहरों पर ठहरता है, जिससे उनके भीतर चल रहे संघर्ष दर्शकों तक पहुंचते हैं। कई दृश्यों में संवादों से अधिक मौन काम करता है। अश्विनी अय्यर तिवारी यहां शोर मचाने वाली फ़िल्म नहीं बनातीं; वह दर्शकों को धीरे-धीरे उस दुनिया में ले जाती हैं जहां सच और झूठ के बीच की रेखा धुंधली होती जाती है।

सोनाक्षी सिन्हा ने नेहा राजवंश के किरदार में अपने करियर के सबसे परिपक्व अभिनय में से एक दिया है। यह किरदार केवल एक वकील का नहीं, बल्कि उस व्यक्ति का है जो अपने विशेषाधिकारों और नैतिक जिम्मेदारियों के बीच फंसी हुई है। सोनाक्षी ने इस आंतरिक संघर्ष को बड़े संयम से निभाया है। कई जगह उनके चेहरे के भाव संवादों से अधिक प्रभाव पैदा करते हैं। पिछले कुछ वर्षों में ‘दहाड़’ जैसी परियोजनाओं में उन्होंने जिस गंभीर अभिनय क्षमता का परिचय दिया था, ‘सिस्टम’ उसे और आगे बढ़ाती है।

वहीं ज्योतिका फ़िल्म की भावनात्मक धुरी बनकर उभरती हैं। सारिका रावत के रूप में उनका प्रदर्शन अत्यंत स्वाभाविक और प्रभावशाली है। उनके किरदार में गुस्सा भी है, विवशता भी और आत्मसम्मान भी। ज्योतिका अपने अभिनय से यह महसूस करा देती हैं कि व्यवस्था के सबसे निचले स्तर पर खड़े लोग किस तरह रोज़ अन्याय का सामना करते हैं। कई दृश्यों में उनका अभिनय फ़िल्म को नई ऊंचाई देता है।

अशुतोष गोवारिकर का काम भी उल्लेखनीय है। उनका अनुभव स्क्रीन पर साफ़ दिखाई देता है। वह कहानी में स्थिरता और गंभीरता जोड़ते हैं। सहायक कलाकारों ने भी अपने हिस्से का काम ईमानदारी से किया है, जिससे फ़िल्म का संसार विश्वसनीय बनता है।

फ़िल्म का लेखन महत्वाकांक्षी है। यह केवल एक मुकदमे की कहानी नहीं कहना चाहता, बल्कि पूरे न्यायिक ढांचे पर टिप्पणी करना चाहता है। कई दृश्य ऐसे हैं जहां फ़िल्म महत्वपूर्ण सवाल उठाती है कि क्या कानून और न्याय एक ही चीज़ हैं? क्या सच हमेशा अदालत में जीतता है? क्या सामाजिक हैसियत फैसलों को प्रभावित करती है? इन प्रश्नों के कारण फ़िल्म विचारोत्तेजक बनती है।

हालांकि, यहीं फ़िल्म की कुछ कमजोरियां भी सामने आती हैं। कई बार ऐसा महसूस होता है कि फ़िल्म के पास अच्छे विचार तो हैं, लेकिन वह उन्हें पूरी गहराई तक विकसित नहीं कर पाती। कुछ उपकथाएं अधूरी लगती हैं और कुछ महत्वपूर्ण संघर्ष सतही स्तर पर ही रह जाते हैं। कोर्टरूम ड्रामा के रूप में फ़िल्म कई बार उतनी तीखी नहीं बन पाती जितनी उसकी विषयवस्तु मांग करती है।

फ़िल्म का दूसरा भाग विशेष रूप से मिश्रित प्रभाव छोड़ता है। शुरुआती हिस्से में जो रहस्य और तनाव निर्मित होता है, वह बाद में थोड़ी गति खो देता है। कुछ दृश्य अनावश्यक रूप से लंबे महसूस होते हैं। दर्शकों को यह भी लग सकता है कि फ़िल्म अपने सबसे साहसी राजनीतिक निष्कर्षों तक पहुंचने से पहले ही रुक जाती है। व्यवस्था की आलोचना मौजूद है, लेकिन वह कई बार सुरक्षित दायरे में रहती है।

तकनीकी पक्ष की बात करें तो फ़िल्म का कैमरावर्क काफ़ी प्रभावशाली है। अदालतों के बंद कमरों, गलियारों और वेटिंग क्षेत्र को जिस तरह फिल्माया गया है, वह कहानी के दबाव और घुटन को महसूस कराता है। बैकग्राउंड स्कोर भी संयमित है। संगीत कभी भी कहानी पर हावी नहीं होता, बल्कि उसके भावनात्मक स्वर को मजबूत करता है।

‘सिस्टम’ की एक और विशेषता इसकी महिला दृष्टि है। यह फ़िल्म महिलाओं को केवल पीड़ित या आदर्शवादी पात्रों के रूप में नहीं दिखाती। यहां महिलाएं जटिल हैं, महत्वाकांक्षी हैं, गलतियां भी करती हैं और कठिन फैसले भी लेती हैं। अश्विनी अय्यर तिवारी का यह दृष्टिकोण हिंदी सिनेमा में अक्सर दिखाई नहीं देता। फ़िल्म की सबसे बड़ी उपलब्धियों में से एक यही है कि वह अपने महिला पात्रों को पूर्ण मनुष्य की तरह प्रस्तुत करती है।

अश्विनी अय्यर तिवारी के फ़िल्मी सफर को देखें तो ‘सिस्टम’ उनके लिए एक महत्वपूर्ण मोड़ की तरह दिखाई देती है। यह उनकी सबसे परिपक्व या सबसे प्रभावशाली फ़िल्म नहीं है, लेकिन यह निश्चित रूप से उनकी रचनात्मक महत्वाकांक्षा को दर्शाती है। वह अपने परिचित भावनात्मक क्षेत्र से बाहर निकलकर एक बड़े सामाजिक और संस्थागत विषय को छूने की कोशिश करती हैं। यह प्रयास सम्मान के योग्य है, भले ही परिणाम पूरी तरह निर्दोष न हो।

मिलाजुला कर ‘सिस्टम’ ऐसी फ़िल्म है जो अपने विचारों की वजह से याद रहती है, भले ही हर जगह समान रूप से प्रभावशाली न हो। यह दर्शकों को आसान जवाब नहीं देती, बल्कि उन्हें सवालों के साथ छोड़ती है। न्याय, सत्ता और नैतिकता के बीच मौजूद जटिल संबंधों पर सोचने के लिए मजबूर करती है। सोनाक्षी सिन्हा और ज्योतिका के मजबूत अभिनय, अश्विनी अय्यर तिवारी की संवेदनशील दृष्टि और फिल्म का सामाजिक सरोकार इसे देखने योग्य बनाते हैं।

यदि आप तेज़ रफ्तार थ्रिलर की उम्मीद लेकर बैठेंगे तो शायद ‘सिस्टम’ आपको पूरी तरह संतुष्ट न करे। लेकिन अगर आप ऐसी फ़िल्में पसंद करते हैं जो समाज और व्यवस्था के भीतर छिपी परतों को खोलने की कोशिश करती हैं, तो यह फ़िल्म आपके समय की हकदार है। यह एक परफेक्ट कोर्टरूम ड्रामा नहीं है, लेकिन एक ईमानदार और विचारशील सिनेमाई प्रयास अवश्य है।

अमेज़न प्राइम पर है। देख लीजिएगा।  (पंकज दुबे पॉप कल्चर क़िस्सागो, उपन्यासकार और मशहूर यूट्यूब चैट शो ‘स्मॉल टाउन्स बिग स्टोरीज़” के होस्ट हैं।)


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