अब भारत में एक भी बौद्धिक, साहित्यिक मंच, पत्रिका नहीं जो देश में भी जानी जाती हो। यह शिक्षा को दलबंदी के हवाले करने से हुआ। अंग्रेज शासक शिक्षा संस्थानों के लिए भारत या बाहर से भी केवल विद्वानों को ही खोज कर लाते थे। जबकि देसी शासक अकादमिक कुर्सियाँ भी प्रायः दलीय कारकूनों, मुंशियों,… Continue reading शिक्षण संस्थाओं में अब भाईसाहबों का बोलबाला
