कांग्रेस की अनुयायी भाजपा

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भाजपा द्वारा कांग्रेस-मुक्त भारतका नारा संपूर्ण विचारहीनता का नमूना था। उसी क्रम में, उस के नेता जब कुछ मौलिक कोशिश करते हैं तो फूहड़ साबित होता है। चाहे झूला झुलाकर, गले लटक कर, अथवा तू-मैं की बेतकल्लुफी दिखाकर विदेशियों को जीतने का मंसूबा हो, या घर में घुस कर मारनेका प्रदर्शन — सब ने उलटे भारत को हँसी का पात्र और नक्कू बनाया। 

अच्छा कहो या बुरा, आरक्षण का संपूर्ण ताम-झाम कांग्रेस की देन है। आर.एस.एस. प्रमुख ने तो हाल तक कहा था कि पूरे आरक्षण की समीक्षा होनी चाहिए कि किन के लिए कितने समय‌ तक आरक्षण चाहिए। पर हुआ यह कि ‘मौलवी से डाँट खाकर फिर अहले-मकतब/ फिर उसी आयत को दुहराने लगे हैं।’

सो, महिला आरक्षण भी मूलतः कांग्रेसी विचार है। सब से पहले 1989 में प्रधानमंत्री राजीव गाँधी ने 64 वाँ संविधान संशोधन विधेयक रखा। उस में पंचायती संस्थाओं में महिला आरक्षण का प्रावधान था। वह लोकसभा में पास हो गया, पर राज्यसभा में फेल रहा। आगे भी, कांग्रेस प्रधानमंत्री पी.वी. नरसिंह राव ने ही 1992–93 में  73 वें व 74 वें संविधान संशोधन द्वारा पंचायत और नगर निकायों में एक-तिहाई सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित की। वह भारत में महिला आरक्षण का पहला कार्यान्वयन था।

इसलिए, महिला आरक्षण का विचार और इस के प्रति गंभीरता कांग्रेस में ही रही है। भाजपा ने इसे अन्य बातों से उलझा दिया, जिस से वह संसदीय निकायों में लागू नहीं हो सका। यह अच्छा हुआ या बुरा, यह दीगर बात है।
बहरहाल, जगह-जगह आरक्षण लाना, बढ़ाना यह भी दिखाता है कि भाजपा के पास अपना कोई विचार नहीं। वह कांग्रेस की ही अनुयायी रही है। उस का ‘हिन्दुत्व’ केवल दिखाने का दाँत था। ठोस कार्यवाही के इतिहास में उस का रिकॉर्ड बस कांग्रेस का अनुकरण है। समाजवाद, गाँधीवाद, सेक्यूलरिज्म, आरक्षण — यही भाजपा के भी विचार व काम रहे हैं। भाजपा का घोषित सिद्धांत ही ‘गाँधीवादी समाजवाद’ है। फिर उन के नेताओं ने ‘रीयल सेक्यूलरिज्म’ खूब दुहराया।

आगे, कांग्रेस के मुस्लिम तुष्टिकरण को संघ-भाजपा के चालू नेताओं ने खुद ‘तृप्तिकरण’ नाम से बढ़ाया। वह भी ठसक से, कि ‘कांग्रेस ने मुसलमानों को केवल ठगा, हम ही उन्हें बढ़-चढ़कर कर दे रहे हैं’। अल्पसंख्यकों के लिए विशेष कोचिंग, विशेष अनुदान, विशेष योजनाएं, केन्द्रीय सेवाओं में बढ़ी नियुक्तियाँ, आदि ‘उपलब्धियाँ’ खुद भाजपा नेता गिनाते हैं। अंततः, यह आरक्षण की सनक भी जिस पर भाजपा अपनी छाती ठोक रही है।

उक्त सभी ठोस कदमों में ‘हिन्दुत्व’ कहाँ है? रिकॉर्ड दिखाता है कि संघ-भाजपा के लिए वह केवल प्रचार-तमाशे कर फैलने का हीला था। जबकि सत्ता पाकर, वह ठोस कामों में कांग्रेस नीतियों की वफादार रही। उन में केवल राजकीय योजनाएं ही नहीं, दैनं-दिन राजनीतिक तिकड़में भी हैं। विरोधी दलों को तोड़ना; लालच दे दलबदल कराना; सांसदों पर लगाम रखना; राजकीय धन से पार्टी प्रचार की तरकीब निकालना; पार्टी चंदे पर पर्दा रखना; जाँच एजेंसियों का डर दिखा विरोधियों को दबाना; राजकीय संस्थानों, सड़क, बिल्डिंग, योजनाओं, आदि पर अपना नाम चिपकाना; जगह-जगह अपने नेताओं की मूर्ति लगवाना; आदि — इन में कौन सा काम कांग्रेस छाप नहीं है?

बल्कि कांग्रेस से अलग दिखने वाले जो काम हैं, उस में भाजपा नेता अटपटे ही दिखे हैं। आखिर, किसी कांग्रेस प्रधानमंत्री ने ‘मुहम्मद के रास्ते पर चलने’ की सीख नहीं दी थी। कभी कांग्रेस ने मुस्लिम देश की नाराजगी के डर से अपने ही दल की प्रवक्ता को दंडित नहीं किया था। किसी कांग्रेसी सुप्रीमो ने नहीं कहा था कि उन्हें अपना नारा किसी सूफी मियाँ से मिला है। किसी सर्वोच्च कांग्रेसी ने जिहादी सरपरस्तों की कब्र पर चादर नहीं चढ़ाया, आदि। ये तमाम उदाहरण अधिक उत्साह में बेढंगे हो जाने के हैं। तुष्टिकरण से बढ़कर ‘तृप्तिकरण’ करना वही‌ है।

दुर्भाग्यवश, भारत में हिन्दू हितों की चिन्ता करने वाला कोई दल या नेता नहीं। अन्यथा वह दिखा देता कि हिन्दू हितों के लिए संघ-भाजपा अधिक हानिकारक हुए हैं।‌ उस के केंद्रीय मंत्री और संगठन पदाधिकारी आँकड़ों से दिखाते हैं कि — ‘कांग्रेस ने मुसलमानों को कुछ नहीं दिया, जबकि हम ने इतनी नेमतें दी’ — तो यह किस की कीमत पर हुआ?

यदि वह दावा सच है, तब कांग्रेस ही हिन्दू-पक्षी दल साबित होती है! आखिर, उस ने मुस्लिम और हिन्दू हितों के बीच सामंजस्य की नीति रखी। यदि कभी मुस्लिमों की कोई विशेष माँग मानी, जैसे शाहबानो; तो हिन्दुओं को भी अलग से कुछ दिया। जैसे, उसी प्रधानमंत्री, राजीव गाँधी ने राम-जन्मभूमि पर दशकों से लगा ताला खुलवाया। फिर राममंदिर भूमि-पूजन भी कराया, और वहाँ हिन्दुओं की पूजा शुरू करवा दी। यह सब ऐतिहासिक काम थे, जो राजीव गाँधी के कार्यकाल में हुए। फिर प्रधानमंत्री पी।वी। नरसिंह राव ने भी राम जन्मभूमि पर हिन्दू अधिकार को परोक्ष, और फिर कोर्ट में भी समर्थन दिया। अतः हवाई तमाशे नहीं, ठोस कार्यवाही के रूप में कांग्रेस का रिकॉर्ड हिन्दू हितों के लिए बेहतर रहा है।

तुलना में अभी तक, तीस सालों से कई राज्यों, और अठारह साल केंद्रीय सत्ता हाथ में रखकर संघ-भाजपा ने हिन्दू हितों पर क्या किया? उस के सर्वोच्च नेताओं ने बीस साल पहले ही अयोध्या-मुद्दे को ‘भुनाया जा चुका चेक’ कहा, यानी जो करना था वे कर के पल्ला झाड़ चुके! सो, बाद में उस पर जो भी हुआ वह स्वतंत्र रूप से कोर्ट और कुछ हिन्दू विद्वानों की माथापच्ची से हुआ। संघ-भाजपा ने तो उस का उपयोग कर उसे अधर में छोड़ दिया! भाजपा नेताओं के हालिया नये तमाशों, झुनझुनों में भी वही अदा है: यूज एंड थ्रो।

अब वे जातिवादी रंग में आकर हिन्दुओं के बीच ईर्ष्या द्वेष और जलन को हवा दे रहे हैं। पहले सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले को पलटना (2018), और अभी यूजीसी निर्देश इस के बड़े उदाहरण हैं। यह हिन्दुओं को आपस में लड़ाकर बूँदी बटोरने का खुला खेल है।

वही है, पानी पी-पीकर विरोधी दलों के प्रति निरंतर घृणा फैलाना भी। वे हिन्दुओं के ही दल हैं। जिस का कुल परिणाम हिन्दुओं में, और देश में भी कटुता फैलाने के सिवा कुछ नहीं। क्या यह हिन्दुत्व की, या राष्ट्रीय हित की भी नीति है?

यह अनायास नहीं कि संघ-भाजपा के नेता प्रेस-कांफ्रेंस से बचते हैं। अपने ऊट-पटाँग कामों पर उन के पास कैफियत का अभाव है। असुविधाजनक सवालों का उत्तर देने की क्षमता भी शायद ही है। उन की पूरी ट्रेनिंग नजर बचाकर, छिप कर काम करने की रही है। जिस में कथनी-करनी का दोहरापन, और दूसरों के कामों का श्रेय हड़पने की आदत भी शामिल है।‌ राम-जन्मभूमि मंदिर हो, या महिला आरक्षण — दोनों इस के बड़े उदाहरण हैं। इन दोनों में, आरंभ और ठोस कार्रवाई का श्रेय कांग्रेस नेताओं — राजीव गाँधी और पीवी नरसिंह राव को जाता है।

अतः भाजपा द्वारा ‘कांग्रेस-मुक्त भारत’ का नारा संपूर्ण विचारहीनता का नमूना था। उसी क्रम में, उस के नेता जब कुछ मौलिक कोशिश करते हैं तो फूहड़ साबित होता है। चाहे झूला झुलाकर, गले लटक कर, अथवा तू-मैं की बेतकल्लुफी दिखाकर विदेशियों को जीतने का मंसूबा हो, या ‘घर में घुस कर मारने’ का प्रदर्शन — सब ने उलटे भारत को हँसी का पात्र और नक्कू बनाया।

यह किस विदेशी दूत को नहीं दिखता कि जो अपने दल‌ के वरिष्ठों से भी सीधे मुँह बात नहीं करते, वे विदेशियों से बेतकल्लुफ याराना जता कर अपनी हीनता ही झलकाते हैं। यह भी कांग्रेसियों ने कभी नहीं किया। विदेशी नेताओं के साथ उन का व्यवहार बराबर, शिष्ट, औपचारिक रहता था। अपने दल का भी एक-छत्र नेतृत्व करते हुए, कभी अपने किसी नेता को नीचा दिखाना, या विपक्षी नेताओं के प्रति क्षुद्र व्यवहार करना — यह बड़े कांग्रेसी नेताओं में नहीं देखा गया।

अच्छा होता, इस में भी भाजपा के नेता कांग्रेस का अनुकरण ही करते। औपचारिक, शालीन व्यवहार ही राष्ट्रीय व अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर सम्मान अर्जित करता है। नाटकीयता, जुमलेबाजी और हवावाजी की सीमाएं देर-सवेर आ जाती हैं। अब संघ-भाजपा वही दिखा रहे हैं।

गत बारह वर्षों में उन के ‘कांग्रेस-मुक्त भारत’ नारे से‌ लेकर, एक समुदाय के ‘तृप्तिकरण’, और ‘अति-पिछड़ा’ की अलंबरदारी तक — सब लटके वैचारिक दिवालियापन के ही संकेत हैं। जिन से यह भी दिखा कि पिछले दशकों में उन की सारी भंगिमा आम हिन्दुओं के साथ छल थी। भारत में शायद ही कोई पार्टी अपने मूल नारों से ऐसी पलटी है, जैसे कि संघ-भाजपा। इन्होंने अपने संस्थापकों, सर-संघचालकों को भुला कर कांग्रेस नेता प्रणव मुखर्जी को अपना ‘मार्गदर्शक’ बताया! सो, वे स्वघोषित रूप से भी कांग्रेस के अनुयायी हैं।


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