आप सांसदों की सामूहिक पलटी

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यह घटना राजनीति को एक धंधासाबित करती है, जहां सिद्धांतों की जगह स्वार्थ हावी है। लेकिन एक सकारात्मक पक्ष यह भी है कि जनता अब ज्यादा सजग हो रही है। 2027 के चुनाव में मतदाता इन ट्रैक्टरोंको याद रखेंगे और वोट से जवाब देंगे। अशोक मित्तल पर ईडी के छापे के महज 10 दिन बाद उनकी पलटी का मतलब साफ है।

पिछले सप्ताह आम आदमी पार्टी के सात राजसभा सांसदों ने पार्टी छोड़कर भाजपा में स्वतः विलय कर लिया। पार्टी की कुल 10 राजसभा सीटों में से दो-तिहाई से अधिक सांसदों का यह कदम संवैधानिक प्रावधान के तहत लिया गया, जिससे उन्हें अयोग्यता से बचने का रास्ता मिल गया। इनमें से छह पंजाब से चुने गए थे, जबकि एक  दिल्ली से। यह घटना न केवल आम आदमी पार्टी के लिए करारा झटका है, बल्कि पंजाब की सत्तासीन पार्टी के भविष्य पर सवालिया निशान लगा रही है।

राघव चड्ढा ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में दावा किया कि आम आदमी पार्टी अब अपनी मूल विचारधारा से भटक गई है। लेकिन विपक्षी दलों और आम आदमी पार्टी ने इसे भाजपा का ‘ऑपरेशन लोटस’ करार दिया। पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान और अरविंद केजरीवाल ने इसे ‘पंजाब के साथ धोखा’ बताया। सवाल यह है कि क्या यह महज व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा का परिणाम है या पंजाब की राजनीति में बड़े बदलाव की शुरुआत?

पंजाब में आम आदमी पार्टी 2022 के विधानसभा चुनावों में भारी बहुमत से सत्ता में आई थी। भगवंत मान सरकार शिक्षा, स्वास्थ्य, बिजली और रोजगार जैसे क्षेत्रों में कुछ उपलब्धियां गिनाती रही है। लेकिन 2027 के विधानसभा चुनावों से ठीक एक साल पहले यह सामूहिक पलायन पार्टी की स्थिरता पर गंभीर सवाल खड़ा करता है। इन सात सांसदों में चार प्रमुख पंजाबी चेहरे, हरभजन सिंह (क्रिकेटर), अशोक मित्तल (एलपीयू चांसलर), विक्रम साहनी और संदीप पाठक, का जाना न केवल संसदीय ताकत कम करता है बल्कि पार्टी के संगठनात्मक ढांचे को भी कमजोर करता है।

पंजाब कांग्रेस अध्यक्ष अमरिंदर सिंह राजा वॉरिंग ने पहले ही चेतावनी दी है कि केजरीवाल की पार्टी के 50 विधायकों तक का पलायन हो सकता है। यदि ऐसा हुआ तो पंजाब में सरकार अल्पमत में आ सकती है। भाजपा, जो पंजाब में अभी कमजोर है, को यह घटना बड़ा नैतिक और संगठनात्मक बल प्रदान करेगी। पूर्व केंद्रीय मंत्री अश्विनी कुमार के अनुसार, यह भाजपा को अकाली दल के साथ गठबंधन की मेज पर मजबूत स्थिति देगा। पंजाब की राजनीति में ‘ऑपरेशन लोटस’ की सफलता से भाजपा की छवि मजबूत होगी और मतदाताओं में यह धारणा बनेगी कि केजरीवाल की पार्टी का ‘अंत’ शुरू हो चुका है।

दूसरी ओर, यह घटना पंजाब के किसान-मजदूर वोट बैंक को भी प्रभावित करेगी।

उल्लेखनीय है कि आंदोलन से जन्मीं आम आदमी पार्टी की छवि को भ्रष्टाचार-मुक्त और आम आदमी की पार्टी के रूप में बनाया गया था। अब जब उसके प्रमुख चेहरे भाजपा में शामिल हो रहे हैं, तो जनता में निराशा फैल सकती है। पंजाब की राजनीति पहले से ही कांग्रेस, अकाली दल और आप पार्टी के त्रिकोणीय संघर्ष में फंसी है। इस पलायन से कांग्रेस को भी फायदा हो सकता है, लेकिन कुल मिलाकर विपक्षी एकता टूटने का खतरा बढ़ गया है।

इस घटना ने अन्य विपक्षी दलों, कांग्रेस, टीएमसी, सपा, बसपा आदि को स्पष्ट संदेश दिया है कि भाजपा केंद्र की एजेंसियों का इस्तेमाल कर विपक्ष को तोड़ने की रणनीति पर अडिग है। ‘ऑपरेशन लोटस’ अब सिर्फ कर्नाटक, महाराष्ट्र या हरियाणा तक सीमित नहीं रहा; यह राष्ट्रीय स्तर पर विपक्षी दलों की जड़ों को हिला रहा है। दलों को समझना होगा कि बिना आंतरिक लोकतंत्र, मजबूत संगठन और वैचारिक स्पष्टता के वे टिक नहीं सकते। आम आदमी पार्टी जैसी युवा पार्टी का टूटना साबित करता है कि व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा और संसाधनों की कमी पार्टियों को कमजोर बनाती है।

वहीं आम जनता के लिए संदेश और भी गंभीर है। जब भी कोई नेता ईडी/सीबीआई छापे के ठीक बाद पार्टी बदल लेता है, तो लोकतंत्र में विश्वास डगमगाता है। जनता सोचती है कि क्या ये नेता सच्चे सुधारक थे या सत्ता के लालची? पंजाब की जनता, जो पहले ही महंगाई, बेरोजगारी और ड्रग समस्या से जूझ रही है, अब राजनीतिक अस्थिरता का शिकार हो रही है। यह घटना राजनीति को एक ‘धंधा’ साबित करती है, जहां सिद्धांतों की जगह स्वार्थ हावी है। लेकिन एक सकारात्मक पक्ष यह भी है कि जनता अब ज्यादा सजग हो रही है। 2027 के चुनाव में मतदाता इन ‘ट्रैक्टरों’ को याद रखेंगे और वोट से जवाब देंगे।

यह घटना आम आदमी पार्टी के लिए खतरे की घंटी है। पार्टी ने दिल्ली और पंजाब में सत्ता संभाली, लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर संगठन अभी भी कमजोर है। राघव चड्ढा जैसे चेहरे, जो पार्टी के प्रमुख प्रवक्ता थे, का जाना आंतरिक कलह को उजागर करता है। केजरीवाल की ‘सुप्रीमो’ शैली पर सवाल उठ रहे हैं। अशोक मित्तल पर ईडी के छापे के महज 10 दिन बाद उनका पलायन संदेहास्पद है। यदि पार्टी में सुधार नहीं हुआ, तो दिल्ली में भी ‘डोमिनो इफेक्ट’ शुरू हो सकता है।

वहीं अन्य दलों के लिए भी यह एक संकेत है। भारतीय राजनीति में ‘माइग्रेशन’ की संस्कृति बढ़ रही है। भाजपा की मजबूत केंद्रीय शक्ति का फायदा उठाकर छोटी पार्टियां टूट रही हैं। यह लोकतंत्र की सेहत के लिए खतरनाक है। जब विपक्ष कमजोर होता है, तो सत्ता का दुरुपयोग बढ़ता है। यह प्रवृत्ति ‘एक पार्टी प्रभुत्व’ की ओर ले जा रही है, जो बहुलवाद को नुकसान पहुंचाएगी।

चिंता की बात यह है कि यह प्रवृत्ति ईडी/सीबीआई जैसी एजेंसियों की निष्पक्षता पर भी सवाल उठाती है। जब ये संस्थाएं केवल विपक्ष पर सक्रिय नजर आती हैं और सत्ता पक्ष पर चुप रहती हैं, तो जनता में भरोसा कम होता है। यह लोकतंत्र की नींव, ‘न्यायिक स्वतंत्रता’ को हिला देता है। कुछ मामलों में भ्रष्टाचार सच्चा हो सकता है, लेकिन टाइमिंग संदिग्ध है। इससे राजनीति में ‘कोऑर्शन’ (दबाव) की संस्कृति बढ़ती है। जनता के मन में यह सवाल उठना लाज़मी है कि क्या सत्ता हासिल करने का यही तरीका है? यह ट्रेंड छोटे दलों को खत्म करने और राष्ट्रपति शासन जैसी स्थितियां पैदा करने का खतरा बढ़ाता है।

आम आदमी पार्टी के सांसदों का भाजपा में विलय स्वस्थ राजनीति को खतरे में डालता है। यह पार्टी की कमजोरियों को उजागर करता है। लेकिन इससे बड़ा सबक यह है कि भारतीय राजनीति में वैचारिक स्थिरता, आंतरिक लोकतंत्र और संस्थागत निष्पक्षता की जरूरत है। लोकतंत्र तभी मजबूत होता है जब पार्टियां सिद्धांतों पर टिकी रहें, न कि सत्ता के लालच में। यदि यह ट्रेंड जारी रहा, तो ‘आम आदमी’ की पार्टी का सपना ही टूट जाएगा। समय है कि सभी दल, चाहे सत्ता पक्ष हो या विपक्ष, आत्मचिंतन करें। अन्यथा, राजनीति सिर्फ ‘ऑपरेशन’ का खेल बनकर रह जाएगी।


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