कक्षा में बच्चे हैं पर शिक्षा अनुपस्थित!

Categorized as लेख

पूरी शिक्षा व्यवस्था कक्षा में उपस्थितिके उत्पादन पर केंद्रित हो गई, “सीखनेपर नहीं। बच्चा स्कूल में हैयह पर्याप्त माना जाने लगा, चाहे वह कुछ भी सीख रहा हो या नहीं। यह साधारण भ्रष्टाचार नहीं है। यह एक नीति-तर्क है जो कागज़ पर ठीक दिखता है, लेकिन व्यवहार में राष्ट्र की सीखने की क्षमता को खोखला करता है।

2022 में भारत की शिक्षा हालात सालाना रिपोर्ट (ASER) ने एक ऐसी सच्चाई उजागर की है, जिसे सुनते ही देश को एक शैक्षिक आपातकाल की तरह लेना चाहिए। रिपोर्ट बताती है कि पाँचवीं कक्षा के आधे से अधिक बच्चे दूसरी कक्षा का भी पाठ ठीक से नहीं पढ़ सकते और लगभग दो-तिहाई बच्चे साधारण भाग (division) तक नहीं कर पाते।

ये वे बच्चे नहीं थे जो स्कूल से बाहर थे। ये वे बच्चे थे जो पाँच साल से कक्षा में बैठ रहे थे, उपस्थिति दर्ज करा रहे थे, और फिर भी सीखने के स्तर पर लगभग शून्य के आसपास थे। यह कोई अपवाद नहीं था। ASER 2005 से लगातार यही संकेत मिल रहा है। फर्क केवल इतना है कि अब राज्य ने पहली बार इससे आँखें फेरना बंद किया।

सरकारी भाषा में, विशेषकर नीति आयोग की रिपोर्ट में, एक सावधान-सी स्वीकारोक्ति दिखाई देती है—“पहुँच” और “शिक्षा” एक नहीं हैं। यह स्वीकारोक्ति देर से आया हुआ सत्य है। और ठीक इसी कारण यह उपलब्धि भी है और अभियोग भी। भारत ने इतिहास की सबसे बड़ी शिक्षा-व्यवस्था खड़ी की हुई है, लेकिन भीतर से यह संरचना खाली याकि खोखा है।

यह व्यवस्था एक उत्तर-औपनिवेशिक विचार पर बनी थी—जिसका उद्देश्य गलत नहीं था, लेकिन निष्पादन गहराई से त्रुटिपूर्ण रहा। मान लिया गया कि असली समस्या शिक्षा से वंचित रह जाना है। इसलिए समाधान भी सरल माना गया—स्कूल बनाइए, उपस्थिति सुनिश्चित कीजिए, मिड-डे मील दीजिए, और “लोकतांत्रिक लाभांश” अपने आप आएगा।

इस सोच के तहत भारत ने असाधारण पैमाने पर काम किया। लगभग 15 लाख स्कूल बने, और लगभग 25 करोड़ बच्चे नामांकित हुए। आज अधिकांश गाँवों में स्कूल पैदल दूरी पर हैं। दृश्यता के स्तर पर यह एक बड़ी सफलता है।

लेकिन इसी सोच में एक मौलिक त्रुटि छिपी थी—यह मान लेना कि कक्षा में बैठा बच्चा स्वाभाविक रूप से सीख रहा है। इस धारणा को कभी गंभीरता से परखा नहीं गया; इसे व्यवस्था में स्थायी सत्य की तरह शामिल कर दिया गया।

हर नया स्कूल एक उद्घाटन बन गया, हर नामांकन संख्या एक रिपोर्ट। इमारतें दिखाई देने लगीं, आँकड़े प्रकाशित होने लगे, और दृश्यता राजनीतिक पूँजी में बदल गई। लेकिन सीखना—जो सबसे कठिन, सबसे धीमा और सबसे कम दृश्य परिणाम देने वाली प्रक्रिया है—लगभग अदृश्य रह गया।

नतीजा एक ऐसी व्यवस्था के रूप में सामने आया है जिसे “शिक्षा का पोटेमकिन गाँव” कहा जा सकता है—बाहर से पूर्ण, भीतर से खोखला।

2009 में PISA परीक्षण ने इस वास्तविकता को और स्पष्ट कर दिया था। भारतीय छात्र लगभग सभी देशों के नीचे के स्तरों पर रहे। परिणाम इतना असहज था कि भारत ने आगे की रैंकिंग में भाग लेना ही बंद कर दिया। बाद में विश्व बैंक के Human Capital Index में भारत 174 देशों में 116वें स्थान पर दिखाई दिया।

हमने असफल होना बंद नहीं किया; हमने उसे मापना बंद कर दिया।

इस स्थिति को समझने के लिए “प्रमाण-पत्र जाल” (Credentialism Trap) महत्वपूर्ण है। ग्रामीण भारत में शिक्षा का प्रमाणपत्र अक्सर कौशल का संकेत नहीं, बल्कि सरकारी नौकरी की उम्मीद का प्रतीक बन गया है। इसने पूरे ढांचे को एक अलग दिशा दे दी।

2009 का Right to Education Act इस दिशा में निर्णायक था। कक्षा 8 तक किसी बच्चे को रोका नहीं जा सकता—यह प्रावधान सीखने की न्यूनतम जवाबदेही को ही कमजोर कर देता है। शिक्षक पर परिणाम का दबाव घट गया, और विद्यालयों पर वास्तविक सीखने का दायित्व अस्पष्ट हो गया।

इसका परिणाम यह हुआ कि पूरी व्यवस्था “उपस्थिति” के उत्पादन पर केंद्रित हो गई, “सीखने” पर नहीं। बच्चा स्कूल में है—यह पर्याप्त माना जाने लगा, चाहे वह कुछ भी सीख रहा हो या नहीं। यह साधारण भ्रष्टाचार नहीं है। यह एक नीति-तर्क है जो कागज़ पर ठीक दिखता है, लेकिन व्यवहार में राष्ट्र की सीखने की क्षमता को खोखला करता है।

इस विफलता का प्रभाव केवल शिक्षा तक सीमित नहीं है। यह सीधे भारत की जनसांख्यिकीय संरचना से जुड़ता है। देश की औसत आयु लगभग 28 वर्ष है—जिसे “डेमोग्राफिक डिविडेंड” कहा जाता है। लेकिन लाभांश अपने आप नहीं आता। वह केवल तब मूल्यवान होता है जब मानव पूँजी मजबूत हो। यदि बड़ी आबादी बुनियादी समझ, विश्लेषण और अनुकूलन क्षमता से वंचित हो, तो यह लाभांश नहीं, एक दीर्घकालिक बोझ बन जाता है।

 

चीन ने 1990 के दशक में इस खतरे को गंभीरता से लिया। कठोर तरीकों के बावजूद, उसने सीखने के स्तर को सुधारने पर जोर दिया—राष्ट्रीय मूल्यांकन, शिक्षक जवाबदेही और मानकीकृत परिणामों के माध्यम से।

वियतनाम ने भी यही किया। उसने यह राजनीतिक निर्णय लिया कि सफलता नामांकन से नहीं, सीखने के परिणामों से मापी जाएगी।

भारत ने अभी तक यह निर्णायक परिवर्तन नहीं किया है।

आज हमारी अर्थव्यवस्था एक “सेवा-आधारित” मॉडल पर निर्भर है, जिसमें केवल एक छोटा, अत्यधिक प्रशिक्षित वर्ग आगे बढ़ता है। बाकी बड़ी आबादी उस दुनिया में प्रवेश कर रही है, जहाँ रूटीन काम भी स्वचालित हो रहे हैं।

नीति रिपोर्ट की रिपोर्ट का महत्व इस बात में है कि वह समस्या को स्पष्ट रूप से पहचानती है—विशेषकर “Foundational Literacy and Numeracy” पर जोर। लेकिन समस्या की पहचान और उसका समाधान एक नहीं होते। यदि प्रणाली की मूल प्रेरणा नहीं बदली, तो केवल प्रशिक्षण या तकनीक पर्याप्त नहीं होंगे। इसलिए तीन स्तरों पर बदलाव आवश्यक है—

पहला: जवाबदेही का विकेंद्रीकरण।

शिक्षक की प्रभावशीलता का मूल्यांकन केवल ऊपर से नहीं, बल्कि स्थानीय स्तर पर भी होना चाहिए।

दूसरा: रटंत संस्कृति से बाहर निकलना।

हमारी परीक्षा प्रणाली स्मृति को पुरस्कृत करती है, सोचने की क्षमता को नहीं। यह असंतुलन भविष्य की अर्थव्यवस्था के लिए गंभीर जोखिम है।

तीसरा: सीखने को मापना।

नामांकन आसान है, सीखने को मापना कठिन है—लेकिन यही वास्तविकता है। और जो मापा नहीं जाता, वह नीति में महत्व नहीं पाता।

भारत के पास शायद केवल एक पीढ़ी का समय है—वर्तमान प्राथमिक विद्यालय के बच्चे—इस अंतर को भरने के लिए। हमने कक्षा की भौतिक संरचना जीत ली है। अब चुनौती मानसिक संरचना को बदलने की है। बच्चे कक्षा में मौजूद हैं। अब प्रश्न यह है—क्या हम उन्हें वास्तव में कुछ सीखने योग्य देंगे?


Previous News Next News

More News

किसान सम्मान के नाम से ई-20 पेट्रोल बिकेगा

July 30, 2026

भारतीय जनता पार्टी और उसकी केंद्र सरकार के बारे में एक बात माननी होगी। दोनों अपने किसी फैसले को जस्टिफाई करने के लिए कोई भी तर्क खोज सकते हैं। जरूरी नहीं है कि फैसले को जस्टिफाई करने के लिए प्राइमरी तर्क पर ही अड़े रहे हैं। आमतौर पर कोई भी व्यक्ति या सरकार अपने फैसले…

ओवैसी का बिहार वाला दांव यूपी में भी

July 30, 2026

एमआईएम के नेता असदुद्दीन ओवैसी ने बिहार में एक दांव चला था। उन्होंने पिछले साल बिहार विधानसभा चुनाव से पहले लालू प्रसाद और कांग्रेस के सामने प्रस्ताव रखा था कि उनकी पार्टी को गठबंधन में शामिल किया जाए। बिहार के प्रदेश अध्यक्ष अख्तरुल इमान गाजे बाजे के साथ लालू प्रसाद के निवास के बाहर पहुंच…

जस्टिस यशवंत वर्मा की क्या स्थिति है?

July 30, 2026

यह लाख टके का सवाल है कि दिल्ली हाई कोर्ट से इलाहाबाद हाई कोर्ट भेजे गए जस्टिस यशवंत वर्मा की क्या स्थिति है? साथ यह भी सवाल है कि उनके खिलाफ लंबित महाभियोग के मामले की क्या स्थिति है? संसद के सत्र आ रहे हैं और जा रहे हैं। दुनिया भर की दूसरी बातों की…

केरल हारने का कारण खोज लिया सीपीएम ने

July 30, 2026

केरल में लगातार 10 साल राज करने के बाद सीपीएम के नेतृत्व वाला गठबंधन एलडीएफ इस साल मई के चुनाव में हार गया था। उसके बाद से पार्टी में इस बात को लेकर मंथन चल रहा था कि सब कुछ ठीक था तो पार्टी क्यों हारी? इसके लिए पार्टी के बड़े नेताओं के बीच मंथन…

नीलेकणी क्या नीट खत्म करने की सिफारिश करेंगे?

July 30, 2026

इंफोसिस के सह संस्थापक और भारत में आधार क्रांति के सूत्रधार नंदन नीलेकणी के ऊपर केंद्र सरकार ने परीक्षा प्रणाली में सुधार के सुझाव देने का जिम्मा सौंपा है। भारत की अंतरिक्ष एजेंसी इसरो के पूर्व प्रमुख एस सोमनाथ को भी इस उच्चाधिकार प्राप्त कमेटी का सदस्य बनाया गया है। पता नहीं लोगों को याद…

logo