सीपीएम के सामने है जो असल सवाल

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1967 के बाद ऐसी स्थिति आई है, जब देश के किसी भी राज्य में ऐसी सरकार नहीं है, जिसमें कोई कम्युनिस्ट पार्ट शामिल हो। ।।।हाल के वर्षों में वर्ग दृष्टिकोण से हट कर अस्मिता के प्रश्नों को तरहीज देने की प्रवृत्ति अपने को कम्युनिस्ट कहने वाले अनेक दलों/ गुटों में भी बढ़ती चली गई है। ।। सीपीएम के सामने असल सवाल यह मौजूद है कि क्या वह आज की परिस्थितियों में वैसी राजनीति के साथ अपना पुनर्आविष्कार कर पाएगी, जिसकी जड़ें 1964 की उसकी समझ से प्रेरित हों?

भारत में 59 साल- यानी 1967 के बाद ऐसी स्थिति आई है, जब देश के किसी भी राज्य में ऐसी सरकार नहीं है, जिसमें कोई कम्युनिस्ट पार्टी शामिल हो। 1967 में केरल में मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के नेता ई।एम।एस। नंबूदिरीपाद के नेतृत्व में दूसरी वामपंथी सरकार बनी। आंतरिक कलह की वजह से ये सरकार नवंबर 1969 में गिर गई। तब वामपंथी मोर्चे से निकल कर भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी कांग्रेस के मोर्चे से जा मिली। प्रमुख सीपीआई नेता सी। अच्युत मेनन तब मुख्यमंत्री बने। मेनन बीच में दो महीनों के अंतराल को छोड़कर मार्च 1977 तक मुख्यमंत्री रहे।

इस बीच 1967 में पश्चिम बंगाल में बांग्ला कांग्रेस के नेता अजय मुखर्जी के नेतृत्व में यूनाइटेड फ्रंट सरकार बनी, जिसमें सीपीआई और सीपीएम दोनों पार्टियां शामिल थीं। 1967 से 1971 के बीच यूनाइटेड फ्रंट की सरकार तीन बार गिरी। लेकिन हर बार अजय मुखर्जी के नेतृत्व में फिर से इसका गठन होता रहा। यानी कुल चार बार मुखर्जी ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। उनकी चारों सरकारों में दोनों कम्युनिस्ट पार्टियां शामिल रहीं। 1971 के चुनाव में कांग्रेस की जीत के साथ इस प्रयोग पर विराम लगा। बहरहाल, 1977 जब केरल में अच्युत मेनन को पद छोड़ना पड़ा, तब तक पश्चिम बंगाल में सीपीएम के नेतृत्व में लेफ्ट फ्रंट पूरे बहुमत से सत्ता में आ गया था।

पश्चिम बंगाल में लेफ्ट फ्रंट 2011 में सत्ता से बाहर हुआ, लेकिन तब त्रिपुरा में कम्युनिस्ट नेतृत्व वाली सरकार थी, जो 2018 के आरंभ तक सत्ता में रही। उसके सत्ता से हटने से पहले 2016 में केरल में कम्यनिस्ट नेतृत्व वाली सरकार बन चुकी थी, जो अब बाहर हुई है। इस लिहाज से ताजा विधानसभा चुनाव में लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट (एलडीएफ) की हार भारत में कम्युनिस्ट आंदोलन के इतिहास के लिहाज से एक महत्त्वपूर्ण घटना बनी है। यहां इस तथ्य का उल्लेख प्रासंगिक होगा कि भारत 1957 में (इटली के पास मौजूद और 34 हजार आबादी वाले देश सैन मरीनों को छोड़ कर) दुनिया का पहला देश और केरल पहला राज्य बना था, जहां कम्युनिस्ट चुनाव जीत कर सत्ता में आए।

भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ने 1951 में कानूनी एवं संसदीय रास्तों के उपयोग की टैक्टिकल लाइन तय की थी। उसके छह साल बाद केरल में पार्टी चुनाव के जरिए सत्ता में आई। संभवतः इस घटनाक्रम का (सोवियत संघ में हुए बदलावों के साथ-साथ) पार्टी की आगे की लाइन तय करने में बड़ा योगदान रहा। पार्टी के अंदर गहरे मतभेदों के बावजूद सीपीआई ने संसदीय मार्ग से समाजवाद की ओर संक्रमण की लाइन तय की थी। 1964 में पार्टी के हुए विभाजन के पीछे इस बिंदु पर मतभेद की भी खास भूमिका रही (हालांकि इसकी कई अन्य वजहें भी थीं)।

वो धड़ा पार्टी से अलग हो गया, जो मानता था कि भारत की राजसत्ता पर पूंजीपति और जमींदार वर्गों का नियंत्रण है और ये तबके विदेशी वित्तीय पूंजी के साथ लगातार जुड़ते जा रहे हैं। इसके मद्देनजर उसकी ये राय थी कि सिर्फ संसदीय रास्ते और संवैधानिक दायरे में काम करते हुए पीपुल्स डेमोक्रेसी की स्थापना की ओर नहीं बढ़ा जा सकता। उसके लिए जारी राजनीतिक एवं आर्थिक व्यवस्था से एक किस्म का विच्छेद (rupture)- यानी क्रांतिकारी रूपांतरण जरूरी है। यह धड़ा भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) के रूप में स्थापित हुआ।

विडंबना यह है कि सीपीआई पर संसदीय या चुनावी राजनीति में समग्र रूप से शामिल हो जाने का इल्जाम लगाते हुए जो नई पार्टी बनी, कुछ वर्षों के बाद व्यवहार में वह भी उसी तरह की सियासत में सिमटी नजर आने लगी। यही नहीं, नक्सलबाड़ी विद्रोह के बाद सीपीएम से अलग होकर बनी सीपीआई (एल-एल) से निकले अनेक गुटों की व्यावहारिक राजनीति में भी व्यवस्था से rupture का तत्व गायब होता चला गया। अपवाद सिर्फ अंडरग्राउंड संघर्ष के रास्ते पर गई सीपीआई (माओवादी) रही, लेकिन उसकी कहानी अलग है।

जिन दलों की राजनीति पूरी तरह चुनावों के इर्द-गिर्द सिमटी रहती है, स्वाभाविक है कि उनकी सफलता और विफलता का पैमाना चुनावी जीत-हार से तय होता है। सारी रणनीतियां चुनाव के जरिए सत्ता में आने पर केंद्रित रहती हों, तो सत्ता हाथ से निकलना स्वाभाविक रूप से एक बड़ी नाकामी समझी जाएगी। और सत्ता हाथ से निकलने के साथ संबंधित प्रदेश की राजनीतिक पृष्ठभूमि में दूरगामी महत्त्व के बदलाव भी दिख रहे हों, तो हार का संदर्भ और बड़ा हो जाता है। इसीलिए ये सवाल उठा है कि सीपीएम की ताजा हार महज चुनावी चक्र का हिस्सा है, या इससे पार्टी के सामने अस्तित्व का सवाल भी खड़ा हुआ है?

केरल में 1977 के बाद से हर चुनाव में सरकार बदलने का सिलसिला शुरू हुआ, जो 2016 तक चला। यह 2021 में टूटा, जब हैरतअंगेज जीत हासिल करते हुए एलडीएफ सत्ता में लौट आया। इस लिहाज से 2026 में सीपीएम के नेतृत्व वाले एलडीएफ की हार उसके लिए उतना बड़ा झटका नहीं माना जाता। मगर, इस बार चुनाव में कुछ ऐसी प्रवृत्तियां दिखी हैं, जिन्हें राज्य के सियासी समीकरण में बुनियादी बदलाव का संकेत माना गया है।

कांग्रेस नेता शशि थरूर की इस टिप्पणी पर गौर करेः

“दशकों तक केरल राष्ट्रीय रुझान से अलग खड़ा रहा। देश के ज्यादातर हिस्सों में जारी अस्मिता की राजनीति की ओर खिंचने से वह बचता रहा। लेकिन हाल के वर्षों में, खासकर हालिया चुनाव अभियान से संकेत मिला है कि केरल की अपनी विशेषता क्षीण हो रही है। ऐसा लगता है कि सोशल इंजीनियरिंग की उस राजनीति में केरल भी फंस रहा है, जिसमें सामुदायिक पहचान, ब्लॉक वोटिंग, और मजहबी आधार पर अपने हित को परिभाषित करने की प्रवृत्ति प्रमुखता हासिल करने लगती है।”

थरूर ने लिखा- “(केरल में) सामुदायिक पहचान के आधार पर गोलबंदी अब अधिक नजर आने लगी है। एनएसएस और एसएनडीपी योगम जैसे धार्मिक और जातीय संगठन चुनावी नतीजे तय करने में अधिक सक्रिय भूमिका निभाने लगे हैं। समूहगत (ब्लॉक) वोटिंग कभी केरल की संस्कृति का हिस्सा नहीं थी, लेकिन अब पार्टियां इसे सामान्य प्रवृत्ति मान कर चल रही हैं। धार्मिक या जातीय समूहों को ध्यान में रखकर खास रणनीतियां अब बनाई जा रही हैं। चुनाव लड़ रहे गुट ‘मुस्लिम ध्रुवीकरण’ या ‘एड़वा वोटिंग झुकाव’ जैसे जुमले निजी बातचीत में बोलने लगे हैं। उन ईसाइयों के लिए क्रिसंघी शब्द प्रचलन में आया है, जो मुसलमानों के प्रति आरएसएस की संदेह की भावना से सहमत नजर आते हैं।

थरूर ने लिखा- “कांग्रेस नेतृत्व वाले यूडीएफ को अल्पसंख्यकों की पार्टी कहा जा रहा है। यहां तक कि निरीश्वरवादी कम्युनिस्टों के नेतृत्व वाले एलडीएफ ने चुनाव से छह महीने पहले अयप्पा संगमम का आयोजन किया। पहले शिक्षा या भूमि अधिकार जैसे मुद्दों पर सार्वभौमिक अर्थ में बात की जाती थी, लेकिन अब उन्हें धार्मिक नजरिए से देखा जा रहा है और पार्टियां इन्हें खास समुदायों को लाभ पहुंचाने या संरक्षण देने के अर्थों में बात कर रही हैं।”

थरूर ने जो मतदान के बाद लिखा, चुनाव अभियान के दौरान तमाम मीडिया रिपोर्टों से उसके संकेत मिल रहे थे। इसे राज्य में विमर्श के बदलते स्वरूप की मिसाल माना गया कि सबरीमला मुद्दे पर पहले कांग्रेस ने अपना रुख बदला और फिर सीपीएम के नेतृत्व वाली सरकार ने भी इस मसले से दूरी बना ली। दोनों पार्टियों ने ‘परंपरा’ के तर्क स्वीकार करते हुए इस मसले में ना उलझने का नजरिया अपनाया। ऐसी घटनाएं बदले माहौल और उससे पैदा हुए सियासी दबाव का संकेत देती हैं। इस रूप में कहा जा सकता है कि राष्ट्रीय स्तर पर चल रही विमर्श की आंधी केरल की राजनीति को भी प्रभावित करने लगी है। इसका दूरगामी परिणाम क्या होगा, सीपीएम और अन्य वामपंथी पार्टियों के लिए यह सवाल अब बेहद अहम हो गया है।

गौर करेः 2011 में जब पश्चिम बंगाल में 34 साल के लंबे शासन के बाद वाम मोर्चे की हार हुई, तब भी सीपीएम को 30 फीसदी और लेफ्ट फ्रंट 39 प्रतिशत वोट मिले थे। तब ये अनुमान लगाना किसी के लिए मुश्किल होता कि 2026 आते-आते सीपीएम बमुश्किल साढ़े चार प्रतिशत वोट हासिल कर पाएगी। दरअसल, 2019 में भारतीय जनता पार्टी राज्य की प्रमुख राजनीतिक धुरी बन गई और मुख्य मुकाबला उसके एवं तृणमूल कांग्रेस के बीच सिमट गया। त्रिपुरा की कहानी भी कुछ अलग नहीं है।

इसलिए सीपीएम को यह मान कर निश्चिंत रहने का जोखिम नहीं उठाना चाहिए कि केरल में कुछ ऐसा खास है, जिससे वह हमेशा जाति-धर्म आधारित सियासत से बचा रहेगा। इसके विपरीत आत्म-निरीक्षण के लिए यह सवाल उसके सामने खड़ा है कि उसके शासनकाल में क्यों सांप्रदायिक और सामुदायिक मुद्दे राजनीति को प्रभावित करने लायक हो गए? क्या यह ऐसे मुद्दों और पहचान आधारित सियासत के प्रति पार्टी में किसी उलझन का संकेत हैं? क्या ऐसे मसलों को किनारे रख पाने के लिए आवश्यक वैचारिक मजबूती का पार्टी में अभाव हो गया है?

सीपीएम के संदर्भ में इन सवालों की पड़ताल करते हुए सहज ही 1964 का उसका दस्तावेज प्रासंगिक हो जाता है। मुद्दा यह है कि गुजरे दशकों में मौजूदा राजनीतिक एवं आर्थिक संरचना से विच्छेद के उद्देश्य को क्या वह अपनी राजनीति के केंद्र में रख पाई है? या ऐसी समझ रखने के बावजूद वह व्यवहार में संसदीय मार्ग से समाजवाद की ओर संक्रमण की राह पर चली गई है? दरअसल, उसके रोजमर्रा के विमर्श में समाजवाद की चर्चा अब कभी-कभार ही सुनाई देती है। इसके विपरीत उस संविधान की रक्षा पार्टी की प्राथमिक चिंता बनी नजर आती है, जिससे संचालित व्यवस्था में rupture की बात करते हुए उसने खुद को गठित किया था। विचार का मुद्दा यह भी है कि संवैधानिक दायरे में काम करना अब भी उसकी टैक्टिकल लाइन है या यह अब उसके लिए रणनीति अथवा वैचारिक आस्था का विषय बन गया है?

इन बातों पर स्पष्टता सिर्फ सीपीएम के भविष्य के लिहाज से अहम नहीं है। भारत में कम्युनिस्ट विमर्श के नजरिए से भी ऐसी स्पष्टता की जरूरत है। हाल के वर्षों में वर्ग दृष्टिकोण से हट कर अस्मिता के प्रश्नों को तरहीज देने की प्रवृत्ति अपने को कम्युनिस्ट कहने वाले अनेक दलों/ गुटों में बढ़ती चली गई है। वर्ग की केंद्रीयता के साथ जाति या लिंग जैसे प्रश्नों के विश्लेषण पर कायम रहने के बजाय ये समूह शासक वर्ग और उनसे संचालित समूहों की तरफ बनाए गए विमर्श के दबाव में आते चले गए हैं। कम्युनिस्ट इतिहास में ऐसे प्रश्नों पर गंभीरता से हुए विचार से प्रेरणा लेने के बजाय सोशल-डेमोक्रेटिक आइकॉन्स को अपनाने की प्रवृत्ति से वे ग्रस्त हो गए हैं। इसका परिणाम उनकी अपनी पहचान के खत्म होने और उनकी राजनीति के सिकुड़ने के रूप में सामने आया है।

गिरावट का यह दौर तब तेज होता दिखा है, जबकि सोवियत संघ के बिखराव और चीन की भूमिका को लेकर बढ़े भ्रम से आए भटकाव की धूल झाड़ कर दुनिया के स्तर पर क्रांतिकारी विचारधारा के रूप में मार्क्सवादी विचार फिर से खड़ा होता नजर रहा है। अपनी उपलब्धियों और अपने नायकों के बचाव में वह नई ऊर्जा से खड़ा हुआ है। समाजवाद के वास्तविक प्रयोगों की सफलता एवं विफलताओं की ताजा समझ उसमें बनती दिखी है। इन सबके आधार पर वह खुद को पुनर्संगठित करने के दौर में नजर आता है।

कम्युनिस्टों में वैचारिक भटकाव पैदा करने की सुनियोजित योजनाओं को कैसे संचालित किया गया, इसकी तथ्य आधारित नई समझ गुजरे कुछ वर्षों के दौरान अस्तित्व में आई है। उत्तर-आधुनिकता, पहचान आधारित स्वायत्त आंदोलन, न्यू-लेफ्ट  आदि जैसी अवधारणाओं के पीछे कौन-सी ताकतें थीं और उन्होंने कितना नुकसान किया, इसकी जितनी बेहतर समझ आज मौजूद है, वैसा शायद इसके पहले कभी नहीं था। इसके परिणास्वरूप पॉलिटिकल इकॉनमी को विमर्श के केंद्र में लाना, समाजवाद के वास्तविक प्रयोगों का समर्थन और उससे सीखना, नए दौर में वर्ग अंतर्विरोध को समझना और उस पर आधारित संघर्ष की रणनीति पर विचार की गंभीर कोशिशें आज चल रही हैं।

आज जरूरत भारत में इन चर्चाओं को आगे बढ़ाने की बेहद जरूरत है। यह दुर्भाग्यपूर्ण है इस दिशा में नेतृत्व देने के बजाय खुद को कम्युनिस्ट कहने वाले कुछ गुट/ नेता बहुदलीय चुनावी राजनीति को अपरिहार्य बताने लगे हैं, तो कुछ पार्टियां डेमोक्रेटिक सेंट्रलिज्म जैसी अवधारणाओं पर पुनर्विचार की वकालत करती मालूम पड़ती हैं। कुछ समूह समाजवाद को अगली पीढ़ी के लिए छोड़ मौजूदा वर्ग संबंधों के भीतर ही कथित लोकतांत्रिक राजनीति में शामिल होने का पक्ष लेने लगे हैं।

नतीजा यह है कि विश्व स्तर पर उभरे रहे नए मार्क्सवादी विमर्श से भारत मोटे तौर पर अछूता नजर आता है।

इस पृष्ठभूमि को ध्यान में रखें, तो सीपीएम के सामने असल सवाल यह मौजूद है कि क्या वह आज की परिस्थितियों में वैसी राजनीति के साथ अपना पुनर्आविष्कार कर पाएगी, जिसकी जड़ें 1964 की उसकी समझ से प्रेरित हों? उस समझ के रोशनी में मंजिल की तरफ यात्रा के क्रम में वर्तमान संवैधानिक व्यवस्था महत्त्वपूर्ण, लेकिन सिर्फ एक मुकाम भर है। मुकाम को ही (व्यवहार में) मंजिल मान लेने की भारी कीमत कम्युनिस्ट पार्टियों ने चुकाई है। कहा जा सकता है कि अब भी वे वहीं टिकी रहीं, तो उनका भविष्य कतई उज्ज्वल नहीं है।


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