सीबीआई द्वारा जांचे गए 7,072 भ्रष्टाचार के मामले अदालतों में लंबित हैं, जिनमें से 379 मामले 20 वर्ष से अधिक पुराने हैं। 2,660 मामले 10 वर्ष से ज्यादा लंबित हैं। यह आंकड़ा न केवल न्यायिक प्रक्रिया की धीमी गति को दर्शाता है, बल्कि सीवीसी की निगरानी वाली पूरी व्यवस्था की कमजोरियों को भी उजागर करता है।
सभी जानते हैं कि भारत में भ्रष्टाचार की जड़ें गहरी हैं। सरकारी मशीनरी में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए 1964 में स्थापित केंद्रीय सतर्कता आयोग (सीवीसी) आज भी भ्रष्टाचार विरोधी लड़ाई का प्रमुख हथियार माना जाता है। लेकिन हाल के वर्षों में सीवीसी के पास लंबित मामलों की संख्या ने चिंता का विषय बना दिया है। सीवीसी की 2024 की वार्षिक रिपोर्ट (जो 31 अगस्त 2025 को जारी की गई और 31 दिसंबर 2024 तक के आंकड़ों पर आधारित है) के अनुसार, सीबीआई द्वारा जांचे गए 7,072 भ्रष्टाचार के मामले अदालतों में लंबित हैं, जिनमें से 379 मामले 20 वर्ष से अधिक पुराने हैं।
2,660 मामले 10 वर्ष से ज्यादा लंबित हैं। यह आंकड़ा न केवल न्यायिक प्रक्रिया की धीमी गति को दर्शाता है, बल्कि सीवीसी की निगरानी वाली पूरी व्यवस्था की कमजोरियों को भी उजागर करता है। विभागीय जांच, अनुशासनिक कार्यवाही और अभियोजन स्वीकृति में देरी के कारण आम नागरिक का भ्रष्टाचार विरोधी संस्थानों में विश्वास डगमगाता जा रहा है।
गौरतलब है कि सीवीसी स्वयं जांच एजेंसी नहीं है। यह शिकायतों की समीक्षा करता है, विभागीय मुख्य सतर्कता अधिकारियों (सीवीओ) को निर्देश देता है और सीबीआई को जांच सौंपता है। लेकिन वास्तविक कार्यवाही अन्य एजेंसियों पर निर्भर है। पहला कारण है मानव संसाधनों की कमी। सीवीसी के पास सीमित स्टाफ है, जबकि केंद्रीय मंत्रालयों, सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों और बैंकों में हजारों मामले आते हैं।
सीवीओ अक्सर अंशकालिक होते हैं और उनके पास अन्य जिम्मेदारियां भी होती हैं। दूसरा, प्रक्रियागत देरी। प्रारंभिक जांच से लेकर प्रमुख दंड की अनुशंसा तक कई चरण हैं। सीवीसी ने 2020 में समय-सीमा निर्धारित की थी, लेकिन मंत्रालय अक्सर अभियोजन स्वीकृति में देरी करते हैं। 2024 रिपोर्ट में ही 46 संगठनों से 200 मामले अभियोजन स्वीकृति के लिए लंबित बताए गए।
तीसरा, अदालती लंबितता। भारत में कुल 5.5 करोड़ से अधिक मामले लंबित हैं। भ्रष्टाचार के मामले जटिल होते हैं। साक्ष्य इकट्ठा करना, गवाहों की उपलब्धता और राजनीतिक दबाव, आदि इन सबके कारण ट्रायल सालों तक खिंच जाते हैं। चौथा कारण संस्थागत। सीवीसी की सिफारिशें सलाहकारी होती हैं, बाध्यकारी नहीं। 2024 में 23 महत्वपूर्ण मामलों में विभागों ने सीवीसी की सलाह को कमजोर कर दिया या नजरअंदाज कर दिया।
यह स्थिति ‘विनीत नारायण’ मामले (1998) में सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के बावजूद बनी हुई है, जिसके परिणामस्वरूप मौजूदा सीवीसी एक्ट, 2003 बना। कोर्ट ने सीवीसी को स्वायत्तता देने के लिए कहा था, लेकिन कानून में इसे पर्याप्त दांत नहीं दिए गए। नतीजा—सीवीसी को ‘दंतहीन शेर’ कहा जाने लगा।
सुप्रीम कोर्ट के ‘विनीत नारायण’ फैसले ने सीवीसी को ‘वैधानिक निकाय’ का दर्जा दिलाया। चयन समिति में प्रधान मंत्री, गृह मंत्री और विपक्ष के नेता शामिल हैं, ताकि राजनीतिक हस्तक्षेप रोका जा सके। लेकिन पी जे थॉमस मामले (2011) में कोर्ट ने ‘संस्थागत अखंडता’ पर जोर दिया। फिर भी आज सीवीसी को दंतहीन क्यों माना जाता है? क्योंकि कानून में सीवीसी को स्वतंत्र जांच का अधिकार नहीं दिया गया। यह सीबीआई पर निर्भर है, जो स्वयं राजनीतिक दबाव में आ सकती है।
सिफारिशें बाध्यकारी नहीं हैं, इसलिए विभाग अनुशासनिक कार्यवाही में अपनी मर्जी चला सकते हैं। सीवीसी की सीमा ‘ग्रुप ए’ अधिकारियों और पीएसयू तक सीमित है। मंत्रियों और सांसदों पर इसका अधिकार नहीं। संसाधनों की कमी, स्टाफ की अपर्याप्तता और राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी ने इसे कमजोर बना दिया। ऐसे में यह कहना ग़लत नहीं होगा कि सुप्रीम कोर्ट के इरादे को कानून ने पूरा नहीं किया, नया गठन स्वायत्तता का दिखावा भर है।
सवाल उठता है कि समस्या जटिल है, लेकिन क्या समाधान संभव है? जहाँ चाह वहाँ राह, सीवीसी ने पहले ही ऑनलाइन पोर्टल शुरू किया है। इसमें सभी विभागीय जांचों को सीवीसी पोर्टल पर अनिवार्य रूप से दर्ज किया जाए और AI आधारित ट्रैकिंग सिस्टम लगाया जाए, ताकि हर चरण की समय-सीमा की निगरानी हो। सीवीसी की 2020 की गाइडलाइंस को कानूनी रूप दें, अभियोजन स्वीकृति 3 महीने में अनिवार्य हो।
देरी पर विभागीय अधिकारियों पर दंड का प्रावधान हो। भ्रष्टाचार के मामलों के लिए विशेष अदालतें बढ़ाई जाएं और सीबीआई-सीवीसी मामलों को प्राथमिकता दी जाए। सीवीसी को अधिक टेक्निकल एग्जामिनर्स और जांच अधिकारियों की नियुक्ति की जाए। सीवीसी सिफारिशों को आंशिक रूप से बाध्यकारी बनाया जाए, जैसे प्रमुख दंड की अनुशंसा को केवल उच्च स्तरीय समिति ही बदल सके।
उल्लेखनीय है कि जब भी किसी विभाग से कुछ उम्मीद की जाती है तो वो हमेशा मानव संसाधनों की कमी का बहन बनाते हैं। परंतु शायद सीवीसी जैसे बड़े संगठनों को इस बात की जानकारी नहीं है कि देश भर में सेवानिवृत अधिकारियों की एक अनूठी ताकत है जो अक्सर अनदेखी रह जाती है। गौरतलब है कि इन रिटायर्ड आईएएस, आईपीएस, आईआरएस या इंजीनियरिंग व बैंकिंग सेवाओं के अधिकारियों के पास 30-40 वर्ष की सेवा का अमूल्य अनुभव है।
वे विभागीय प्रक्रियाओं की बारीकियां जानते हैं। कौन सा नियम किस तरह का ‘लूपहोल’ पैदा करता है, फाइल कैसे घुमाई जाती है, टेंडर में घोटाला कैसे होता है। वे दस्तावेजों को देखकर तुरंत अनियमितताएं पकड़ लेते हैं, जो युवा अधिकारियों को मुश्किल लगती हैं। सेवानिवृत्त अधिकारी सीवीओ के रूप में या सलाहकार के रूप में काम कर सकते हैं। वे प्रशासनिक कार्यप्रणाली को खूब समझते हैं, इसलिए अनुशासनिक कार्यवाही में उचित सलाह दे सकते हैं। जो कि न्यायसंगत लेकिन सख्त साबित हो सकती है।
सीवीसी को एक ‘रिटायर्ड ब्यूरोक्रेट्स एडवाइजरी पैनल’ बनाना चाहिए, जहां अनुभवी अधिकारी पार्ट टाइम आधार पर जटिल मामलों की समीक्षा करें। इससे न केवल लंबितता कम होगी, बल्कि युवा स्टाफ को मेंटरशिप भी मिलेगी। उनकी निष्पक्षता और अनुभव सीवीसी को विश्वसनीय बनाएगा।
सीवीसी में लंबितता सिर्फ आंकड़ों की समस्या नहीं, बल्कि लोकतंत्र की विश्वसनीयता की समस्या है। सुप्रीम कोर्ट के ‘विनीत नारायण’ के फैसले ने जो सपना देखा था, उसे पूरा करने के लिए सीवीसी एक्ट में संशोधन जरूरी है। सेवानिवृत्त नौकरशाहों को सक्रिय रूप से जोड़कर, डिजिटल ट्रैकिंग और बाध्यकारी सिफारिशों से सीवीसी को मजबूत बनाया जा सकता है। तभी भ्रष्टाचार पर लगाम लगेगी और ‘दंतहीन शेर’ सच्चा शिकारी बनेगा। सरकार, न्यायपालिका और नागरिक समाज को मिलकर इस दिशा में कदम उठाने होंगे। अन्यथा, भ्रष्टाचार मुक्त भारत का सपना अधूरा रह जाएगा।
