धुंध, दोष और दर्द की पड़ताल: ‘कोहरा 2’

लेखक गुंजित चोपड़ा और डिग्गी सिसोदिया अपराध को सनसनी नहीं बनाते। वे उसे सामाजिक संरचना की उपज की तरह देखते हैं। कथा की संरचना बेहद संयमित है और हर एपिसोड एक नई परत हटाता है। सीज़न दो का सबसे बड़ा गुण यह है कि वह दर्शक को जज बनने नहीं देता। वह हमें परिस्थितियों के… Continue reading धुंध, दोष और दर्द की पड़ताल: ‘कोहरा 2’

बिखरती वैश्विकी में भारत एक मोड़ पर

अर्थशास्त्री इस स्थिति को लेकर सावधान हैं। जगदीश भगवती ने पहले ही चेताया था कि बहुत सारे अलग-अलग व्यापार समझौते “स्पेगेटी बाउल” जैसी उलझन पैदा करते हैं—नियम जटिल हो जाते हैं और लाभ सबसे कुशल व्यापारियों को नहीं, बल्कि राजनीतिक रूप से पसंदीदा साझेदारों को मिलता है। दो सौदों की कहानी भारत की 2026 की… Continue reading बिखरती वैश्विकी में भारत एक मोड़ पर

‘स्व’ के प्रथम उद्घोषक स्वामी दयानन्द

उन्होंने 1876 में स्वराज्य का नारा दिया। सत्यार्थ प्रकाश के षष्ठम समुल्लास में उन्होंने साफ लिखा—“कोई कितना ही करे, परंतु जो स्वदेशी राज्य होता है, वह सर्वोपरि उत्तम होता है।” आगे चलकर बाल गंगाधर तिलक ने इसी भाव को अपने प्रसिद्ध वाक्य में रूप दिया—“स्वराज्य मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है।” वेदों के गहरे ज्ञाता और आर्य… Continue reading ‘स्व’ के प्रथम उद्घोषक स्वामी दयानन्द

तकनीक में वैश्विक स्तर का भारत भ्रम

कोई देश केवल घोषणा करके तकनीकी महाशक्ति नहीं बन जाता। तकनीकी शक्ति धीरे-धीरे बनती है—दशकों की मेहनत, गहरे शोध, मज़बूत संस्थाओं और सवाल पूछने वाली संस्कृति से। … वैश्विक तकनीकी नेतृत्व का मतलब कुछ और होता है। वह सेमीकंडक्टर डिज़ाइन, सुपरकंप्यूटिंग, उन्नत रोबोटिक्स, नई सामग्री, जैव-प्रौद्योगिकी और मूल एआई मॉडलों जैसी खोजों से तय होता… Continue reading तकनीक में वैश्विक स्तर का भारत भ्रम

लड़ाओं, द्वेष फैलाओ, राज करो

अब तमाम शैक्षिक संस्थानों में छात्रों को स्थाई रूप से आपसी द्वेष, डर और आक्रोश में उलझाना इस का सब से घृणित उदाहरण है। यूजीसी निर्देश के क्रम में ही, इस से पहले जाति उत्पीड़न कानून के दुरुपयोग पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला पलटना, नये-नये आरक्षण बढ़ाना, जाति-गणना, आदि हो चुके हैं। यह सब नेताओं… Continue reading लड़ाओं, द्वेष फैलाओ, राज करो

धार्मिक नगरों की धरोहरों से खिलवाड़

प्राचीन धरोहरें किसी एक धर्म, समाज या देश की संपत्ति नहीं होती बल्कि पूरे विश्व के लिए महत्वपूर्ण  विरासत होती हैं। इसका प्रमाण है कि जब 2001 में बामियान (अफ़ग़ानिस्तान) में गौतम बुद्ध की हज़ारों साल पुरानी विशाल प्रतिमा को तालिबानियों ने तोप के गोलों से उड़ाया था तो पूरी दुनिया ने इसका शोक मनाया… Continue reading धार्मिक नगरों की धरोहरों से खिलवाड़

ट्रंप के आगे आखिर क्यों ऐसा समर्पण?

बात सिर्फ व्यापार समझौते भर की नहीं है। मुद्दा उससे कहीं बड़ा है। मार्क कार्नी ने दावोस में कहा था कि दुनिया में इस वक्त जो हो रहा है, वह साधारण संक्रमण (transition) नहीं, बल्कि ‘नियम आधारित’ दुनिया में rupture है। यानी अमेरिका केंद्रित एक ध्रुवीय विश्व व्यवस्था टूट-फूट गई है। तो अब चुनौती नई… Continue reading ट्रंप के आगे आखिर क्यों ऐसा समर्पण?

विकसित राष्ट्र बनने का रास्ता

बजट के प्रावधानों से प्रकट होता है कि भारत अपनी क्षमताओं का विस्तार करने वाला है ताकि दुनिया के बाजार में भारत के उत्पादों की पहुंच बढ़ाई जाए। अमेरिका के साथ समझौते का फ्रेमवर्क जारी होने के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि इससे मेक इन इंडिया कार्यक्रम को लाभ होगा। उन्होंने यह भी… Continue reading विकसित राष्ट्र बनने का रास्ता

ओह! संसद में भी प्रधानमंत्री भयाकुल, डरा हुआ!

कितनी गजब बात है। क्या दुनिया के किसी देश, किसी संसद में ऐसा हुआ जो पहली बात सदन के नेता को स्पीकर बोले कि आपको भाषण नहीं देना है। और प्रधानमंत्री डर कर राष्ट्रपति अभिभाषण का भी धन्यवाद न करे! इससे भी बड़ा वैश्विक रिकॉर्ड तो देश का प्रधानमंत्री चंद महिला सांसदों के शोर, उनके… Continue reading ओह! संसद में भी प्रधानमंत्री भयाकुल, डरा हुआ!

‘गांधी टॉक्स’: एक मौन क्रांति

“गांधी टॉक्स” दो समानांतर जीवन-रेखाओं पर चलती है। एक ओर है विजय सेतुपति का किरदार जो कि एक आम आदमी है और जिसकी ज़िंदगी संघर्ष, अपमान और जीवटता से बनी है। दूसरी ओर है अरविंद स्वामी का पात्र जो सत्ता, धन और नियंत्रण की दुनिया से आया व्यक्ति, जो धीरे-धीरे अपने ही बनाए ढांचे में… Continue reading ‘गांधी टॉक्स’: एक मौन क्रांति

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