तभी काबिल लोग देश छोड़ जा रहे हैं।

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गत आठ दशकों में विविध क्षेत्रों में तबाह, परेशान, अपमानित होने वाले करोड़ों हिन्दू केवल इसलिए दुर्गति में पड़े, क्योंकि अंग्रेजों का स्थान लेने के ख्वाहिशमंद हिन्दू नेता राजनीति के मूल तत्व से लापरवाह रहे हैं। वह कि जिम्मेदारी से अपने को दाँव पर लगाकर, दृढ़ता से ही राज्य एवं उस में रहने वाली जनता की रक्षा होती है। किन्हीं आडंबरों, सूक्तियों, दूसरों को दोष, या तीसरों को प्रेरित करने से नहीं।

हिन्दू राजनीति का दिवालियापन-2

ऐसी भोली राजनीति का आरंभ प्रथम विश्व-युद्ध में बिना शर्त अंग्रेजों की मदद करने से हुआ। तब तिलक, एनी बेसेंट, जिन्ना, जैसे नेता ‘होम-रूल’ मिलने की शर्त पर अंग्रेजों को सहयोग देने की बातचीत चला रहे थे। लेकिन गाँधीजी ने चमत्कार का मंसूबा दिखाया। उन की जिन्ना से पहली तकरार इसी मुद्दे पर हुई थी। जिन्ना सहज राजनीति कर रहे थे: एक हाथ ले, दूसरे हाथ दे। पर गाँधी सब को प्रभावित करने की चाह के पुराने रोगी थे (उन की आत्मकथा में अनेक उदाहरण हैं)। सो, उन्होंने जिद ठानी कि अंग्रेजों को बेशर्त समर्थन दें — ‘लॉयल कोऑपरेशन’ और ‘फिर देखना क्या कमाल होता है’। यह उन्होंने जिन्ना को पत्र (11 जून 1918) लिख कर कहा था! वही करना पड़ा, गाँधी उभरता सितारा थे। पर उलटे स्वराज्य दूर चला गया। युद्ध समाप्ति पर ‘मोंटेग्यू-चेम्सफोर्ड सुधार’ मिला, जो आशा से बहुत कम था।

फिर गाँधी ‘खलीफत जिहाद’ के सक्रिय समर्थन में उतर गये, जिस में कोई राष्ट्रीय उद्देश्य न था।‌ तब जिन्ना ने कड़ा विरोध किया और कांग्रेस से अलग हो गये। यह बड़ी ऐतिहासिक हानि साबित हुई। एक ओर, उस इस्लामी मानसिकता को भड़काना जो भारत में ठंढी हो चुकी थी। दूसरी ओर, जिन्ना, एनी बेसेंट, जैसे संवैधानिक लोकतंत्री नेताओं को किनारे करना। ताकि गाँधी की भीड़ राजनीति बेखटके चले। गाँधी कांग्रेस के ‘डिक्टेटर’ बन गये। उन्हें 1920 में कांग्रेस के नागपुर अधिवेशन में अधिकार दिया गया कि अकेले वही कांग्रेस को दिशा देंगे। इस तरह वरिष्ठ कांग्रेस नेता नक्कू, अवांछित बना दिए गये।

उस आंदोलन, जिसे एनी बेसेंट ने ‘खलीफत-गाँधी एक्सप्रेस’ कहा था, ने हिन्दू राजनीति का दिवालियापन भयावह रूप में दिखाया। गाँधी ने इस्लाम के खलीफा के लिए जिहाद में जुड़ कर फिर चमत्कारी लाभ की सोची। बिना इस्लामी सिद्धांत या इतिहास की परवाह किए, ‘एक साल में स्वराज’ पाने की कल्पना कर ली। ‘काफिरों’ पर मुस्लिम नेताओं के हिंसक भाषणों को गाँधी केवल अंग्रेजों के विरुद्ध बताते, जस्टिफाई करते रहे! लेकिन जब मोपला से मुलतान तक जिहाद के शिकार केवल निरीह हिन्दू हुए, तब भी उन के नेताओं को समझ नहीं आई।

आज तक नहीं आई है। वरना, इस्लामी राजनीति के सामने हिन्दू राजनीति का दिवालियापन कैसे यथावत रहता! कश्मीरी हिन्दू स्वतंत्र भारत में, हिन्दू शासकों के एकछत्र राज में विनष्ट हुए। अभी चार साल पहले, जिन तालिबान ने सिखों हिन्दुओं को अपमानित कर भगाया, उन के स्वागत में इधर नई दिल्ली बिछी दिखी! बंगलादेश में लाखों लाख हिन्दुओं का सर्वनाश हो चुका। इस पर अमेरिकी संसद में अनेक बार चिन्ता हुई, पर भारतीय संसद स्थाई मौन‌ है। इन सब का क्या अर्थ है?

यह हिन्दू बीमारी है — भीरूता पर चतुराई का मुलम्मा चढ़ाना, और सुविधाभोगी राजनीति करना। इसीलिए, खलीफत सरगना मौलाना अली से‌ लेकर, चेयरमैन माओ, और प्रेसिडेंट ट्रंप तक के सामने हिन्दू नेता बौड़म साबित होते रहे हैं।‌ सभी हिन्दू नेताओं में एक कमजोरी समान है: नाटकीयता, शॉर्ट-कट, या दूसरों के भरोसे उपलब्धि का मंसूबा। पर ऐसे मतिहीन कि उलटे परिणामों से कभी न सीखा। न किसी अन्य को नेतृत्व लेने दिया — जो जिम्मेदारी का पहला कर्तव्य है — यदि नेता अपने से ऊपर समाज का हित रखे।

इस बिन्दु पर भारत के हिन्दू और मुस्लिम नेताओं का रिकॉर्ड भिन्न रहा है। उक्त दो बड़े उदाहरणों के बाद भी हिन्दू नेता बार-बार भोलापन दिखाते रहे हैं। जैसे, बरसों तक देश-विभाजन को ‘असंभव’ मानने (किस बूते?) के बाद‌ एकाएक पंजाब-बंगाल का खुद विभाजन कर देना। वह भी बिना तैयारी, मानो कोई तरबूज काटना हो। आगे, संयुक्त राष्ट्र में मिल रही सुरक्षा परिषद की स्थायी सीट छोड़ देना ताकि ‘पहले चीन को अधिकार मिले’। फिर, ‘लाहौर बस यात्रा’ कर; या पाकिस्तानी नेता के घर अचानक बिनबुलाए पहुँच जाने; या अमेरिकी नेता के साथ स्टेडियम में ताली बजाव तमाशा; या एक ओर ‘कांग्रेस-मुक्त भारत’ जैसा गैर-जिम्मेदार नारा देना, फिर ‘राष्ट्रीय एकजुटता’ की बात करना — ऐसे चित्र-विचित्र कदमों वाले नेता हास्यास्पद रहे हैं। चाहे उन्हें ‘महात्मा’ कहें, ‘सन्यासी’, या अजैविक उत्पत्ति — वे भोलेपन और दिवालिया राजनीति के उदाहरण हैं।

क्योंकि उन के कदम दिखाते हैं कि उन्हें राजनीति के प्रथम तत्व की समझ नहीं रही है — कि उस की करेंसी केवल शक्ति है। राजनीति किसी ठोस लीवर के बल पर जीतती है। बड़ी-बड़ी बातों, नाटकीयता, आदि से नहीं जो गाँधीजी से आज तक हिन्दू नेताओं में लाइलाज बीमारी सी रही है। हिन्दू नेता इस आत्म-प्रवंचना के शिकार हैं कि वे आडंबर व उदारता से इस्लाम, कम्युनिज्म, पाकिस्तान, अमेरिका, तालिबान, अब्दुल्ला, मुफ्ती, या इन का उन का ‘दिल’ जीत लेंगे। बस, समस्या खत्म और चमत्कार ऊपर से!

ऐसे हिन्दू नेता हास्यास्पद ही नहीं समाज घातक भी रहे हैं। चाहे अनजाने। क्योंकि उन की आत्म-प्रवंचनाओं का दंड आम जनता — हिन्दू जनता — भोगती है। पंजाब, बंगाल, कश्मीर, असम जैसे प्रदेशों के सिवा देश भर के असंख्य छोटे-छोटे क्षेत्रों में हिन्दू पीड़ित, अपमानित और मारे जाते रहे हैं।

याद रहे, वही हिन्दू ब्रिटिश राज में सुरक्षित और निश्चिन्त भी रहे थे — अपने जान-माल व धर्म की सुरक्षा को लेकर। क्योंकि ब्रिटिश शासक तमाम समूहों, जातियों, कबीलों की विशेषताओं, खूबियों-खामियों के आधार पर पक्की व्यवस्था से शासन चलाते थे। उस में कोई काल्पनिक थ्योरी या नाटकीयता नहीं, बल्कि ठोस हिसाब और प्रबंध था। कहीं कोताही या बनावट का प्रयोग नहीं। शासक और शासित, दोनों के लिए दंड-पुरस्कार, लेन-देन सब कुछ केवल कर्म व फल पर आधारित थे, लफ्फाजी पर या मुँह देखकर नहीं। इसीलिए, दुर्बल, विखंडित होते हुए भी तब आम हिन्दू सुरक्षित रहे। जो न अंग्रेजों से पहले था, न उन के बाद वैसा रहा।

सो, गत आठ दशकों में विविध क्षेत्रों में तबाह, परेशान, अपमानित होने वाले करोड़ों हिन्दू केवल इसलिए दुर्गति में पड़े, क्योंकि अंग्रेजों का स्थान लेने के ख्वाहिशमंद हिन्दू नेता राजनीति के मूल तत्व से लापरवाह रहे हैं। वह कि जिम्मेदारी से अपने को दाँव पर लगाकर, दृढ़ता से ही राज्य एवं उस में रहने वाली जनता की रक्षा होती है। किन्हीं आडंबरों, सूक्तियों, दूसरों को दोष, या तीसरों को प्रेरित करने से नहीं।

बल्कि शब्दजाल (‘अहिंसा की धरती’, ‘बुद्ध का देश’, ‘युद्ध किसी समस्या का हल नहीं’, आदि) रचने वाला नेता वस्तुत: हिंसकों को ही अनजाने प्रोत्साहन देता है। जो समझ लेते हैं कि सामने आसान शिकार है। यानी ऐसे नेता जो ‘शान्ति’ और अपनी प्रतिष्ठा व कुर्सी के लिए हर समझौता करेंगे, बल्कि हिंसकों के अत्याचार भी छिपाएंगे — ताकि नेताओं की जिम्मेदारी पर प्रश्न न उठे! सो, ‘कोई धर्म हिंसा नहीं सिखाता’, ‘हम बातचीत से समस्या के समाधान को वचनबद्ध हैं’, जैसे बयान केवल हिन्दू नेता देते रहे हैं। किसी रुसी, चीनी, अमेरिकी, अरब, या इजरायली नेता के मुँह से ऐसी बातें शायद ही निकले।

नतीजन, अंग्रेजों के जाते ही हिन्दू जनता रामभरोसे हो गई। इस का श्रेय उन के नेताओं को है, जिन्होंने सत्ता लेने के लिए कोई चारित्रिक, सैनिक, रणनीतिक तैयारी नहीं की। केवल अंग्रेजों को विदा करना ही उद्देश्य मान लिया। इसलिए हिन्दू समाज पर बाहरी, अंदरुनी चोटें लगातार पड़ती रही हैं। गत आठ दशकों में यहाँ लाखों हिन्दू सिर्फ इसलिए तबाह हुए क्योंकि उन के नेताओं को राजनीति में सक्रिय राक्षसी शक्तियों के प्रति नासमझी रही है। और इसलिए भी कि नेता अपने को फन्ने खाँ समझते हुए सहयोगियों, तथा मतभेद रखने वाले देशवासियों को उपेक्षित, अपमानित भी करते रहे हैं।

चूँकि तमाम ऐतिहासिक गलतियों की समीक्षा से हिन्दू नेताओं की  असलियत झलकती, इसीलिए — पंजाब-बंगाल विभाजन से‌ लेकर कश्मीर से हिन्दुओं के सफाए तक — किसी बड़ी से बड़ी चोट पर भी कभी संसद में चर्चा तक नहीं हुई!‌ तब संसद किसलिए है? निरापद विरोधियों, या नेहरू जैसे मृत नेताओं पर कीचड़ उछालने के लिए।

ऐसी गैर-जिम्मेदार राजनीति ही गत सौ सालों में हिन्दू नेताओं ने दिखाई है। जो पैसे, धंधे, और नाटकीयता से शत्रु को जीतने के मंसूबे पालते हैं। जो आजीवन कुर्सी की चाह रखते हुए ‘महात्मा’ या ‘सन्यासी’ कहलाने के प्रपंच करते हैं।

जिस समाज में ऐसे ही नेता होते रहें, वह पतनशील है,  हौसलाविहीन है। जो स्वतंत्र होकर, सत्ता हाथ में लेकर भी हर तरह के दुष्टों से मार, धोखा खाता, अपमानित होता, नाबालिग का नाबालिग बना रहा है। खामख्याली में जीता हुआ, जो सौ साल पहले था, आज भी है, और आगे भी उस से निकलने की इच्छा उस में नहीं दिखती।

यदि यह आलोचना अतिरंजना लगे, तो आज भारत में चल रही पूरी औपचारिक शिक्षा में साहित्य और सामाजिक ज्ञान की दशा का परीक्षण करें। आम स्थिति ‘आँख का अन्धा नाम नयनसुख’ मिलेगी। इस परिणति से बचने वाले अपवाद अपनी वैयक्तिक रुचि, प्रतिभा, और प्रयत्न वाले हैं। शिक्षा-व्यवस्था इस से निर्विकार है कि बच्चों, युवाओं को क्या, क्यों दिया जा रहा, तथा उस का हासिल क्या है? शिक्षा के प्रति इस रुख का सीधा प्रभाव समाज की बौद्धिक क्षमता पर पड़ता है।‌

अतः संयोग नहीं कि अब ऐसी आलोचना के लिए भी देश में जगह छिनती जा रही है। क्योंकि राजनीतिक वर्ग विचारशीलता के विरुद्ध है। उसे केवल अनुचर, कुली, या मूक भीड़ चाहिए। सो, काबिल लोग देश छोड़ कर जा रहे हैं। जिसे भगाया जाना कहना अधिक सही है। संपूर्ण राजनीति और शिक्षा तरह-तरह की छीन-झपट या स्वार्थ के सिवा किसी बिन्दु पर गंभीर नहीं दिखती। यह सब हिन्दू राजनीति के दिवालियेपन का संकेत है।


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