‘माइकल’: एक अधूरी जीवनी

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पॉप-संस्कृति के इतिहास में माइकल जैक्सन सिर्फ़ एक नाम नहीं, एक बहुत बड़ी घटना हैं, एक ऐसी रचना हैं जो संगीत, नृत्य, फैशन और ग्लोबल स्टारडम की सीमाओं को तोड़ती है। ऐसे कलाकार पर फ़िल्म बनाना, दरअसल, एक जोखिम भरा नैरेटिव निर्णय होता है: आप या तो एक ईमानदार, असहज और जटिल फिल्म बनाते हैं या फिर एक सुरक्षित, चमकदार और अपूर्ण श्रद्धांजलि। दुर्भाग्य से, निर्देशक एंटोनी फूक्वा और लेखक जॉन लोगन की अभी अभी रिलीज़ हुई हॉलीवुड फ़िल्म ‘माइकल दूसरी श्रेणी में आती है, जहां रोशनी बहुत है, पर सच का सामना करने का साहस कम। आज के ‘सिने-सोहबत’ में ‘माइकल’ पर ही विमर्श करेंगे, जिसकी कहानी सच्चाई को लेकर काफ़ी सेलेक्टिव है और इसकी खामोशी भी बेहद सुविधाजनक है।

फ़िल्म माइकल जैक्सन के बचपन से लेकर उनके सुपरस्टार बनने तक की यात्रा को दिखाती है। ‘द जैक्सन 5’ के दौर से लेकर ‘थ्रिलर’ युग तक। यह वह समय है जो सबसे अधिक ‘सेलिब्रेटेबल’ है, जहां एक असाधारण प्रतिभा दुनिया को चकित करती है।

फ़िल्म अपने शुरुआती हिस्सों में प्रभावशाली है। पारिवारिक दबाव, पिता जो जैक्सन का कठोर अनुशासन और एक बच्चे के भीतर छिपी असुरक्षा, ये सब परतें दिखाई देती हैं। लेकिन जैसे ही कहानी उस मोड़ पर पहुंचती है, जहां माइकल का जीवन जटिल और विवादास्पद होने लगता है, फ़िल्म अचानक चुप हो जाती है। यह चुप्पी महज़ एक रचनात्मक चुनाव नहीं, बल्कि एक नैतिक विफलता है क्योंकि बायोपिक का अर्थ केवल ‘महिमा मंडन’ नहीं, बल्कि ‘सम्पूर्णता’ होता है।

यहां सबसे दिलचस्प और विडंबनापूर्ण तथ्य यह है कि इस फ़िल्म के निर्माता ग्राहम किंग वही हैं, जिन्होंने ‘बोहेमियन रैपसोडी’ जैसी शानदार फिल्म बनाई थी जो मशहूर बैंड ‘क्वीन’ की यात्रा पर आधारित थी।

‘बोहेमियन रैपसोडी’ ने भी कई आलोचनाओं का सामना किया था लेकिन उसने अपने नायक ‘फ्रेडी मर्करी’ के जटिल जीवन, उनकी पहचान, उनकी बीमारी, और उनके व्यक्तिगत संघर्षों को पूरी तरह नज़रअंदाज नहीं किया। उसमें एक भावनात्मक ईमानदारी थी जो ‘माइकल’ में पूरी तरह गायब है। यह तुलना इसलिए भी ज़रूरी है क्योंकि यह दिखाती है कि समस्या ‘विषय’ की जटिलता नहीं, बल्कि ‘निर्माण की मंशा’ में है।

फ़िल्म का सबसे बड़ा आकर्षण हैं जैफर जैक्सन, जो माइकल जैक्सन की भूमिका निभाते हैं। उनकी शारीरिक भाषा, डांस मूव्स, और स्टेज प्रेज़ेंस अद्भुत हैं। कई बार तो वे स्क्रीन पर इतने ‘सटीक’ लगते हैं कि वास्तविक और अभिनय के बीच की रेखा धुंधली हो जाती है। लेकिन अभिनय केवल ‘अनुकरण’ नहीं होता, वह ‘आत्मा’ का पुनर्निर्माण भी होता है और यहीं जैफर चूक जाते हैं। माइकल जैक्सन के भीतर जो अकेलापन, जो भय, जो असुरक्षा थी वह स्क्रीन पर पूरी तरह नहीं उतर पाती।

यह आंशिक रूप से उनकी सीमितता नहीं, बल्कि स्क्रिप्ट की कायरता भी है, जो उन्हें उस गहराई तक जाने ही नहीं देती। अगर ‘माइकल’ को केवल एक ‘म्यूजिकल एक्सपीरियंस’ के रूप में देखा जाए, तो यह शानदार है। गाने फ़िल्म के सबसे मजबूत क्षण हैं। निर्देशक एंटोनी फूक्वा इन गानों को सिनेमाई भव्यता के साथ पेश करते हैं। लाइटिंग, कैमरा, और कोरियोग्राफी का संयोजन दर्शकों को मंत्रमुग्ध करता है।

लेकिन यही भव्यता एक समस्या भी बन जाती है। फ़िल्म बार-बार ‘कॉन्सर्ट मोड’ में चली जाती है, जहां कहानी रुक जाती है और प्रदर्शन शुरू हो जाता है। परिणाम ये होता है कि यह एक ‘फिल्म’ कम, और एक ‘ग्लॉसी प्लेलिस्ट’ अधिक लगने लगती है। सबसे बड़ा प्रश्न ये है कि क्या यह बायोपिक है या फिर सिर्फ़ ‘ब्रांड मैनेजमेंट’?

‘माइकल’ को देखते हुए बार-बार यह सवाल उठता है कि क्या यह एक ईमानदार बायोपिक है? माइकल जैक्सन का जीवन जितना प्रेरणादायक था, उतना ही विवादों से भरा भी लेकिन फ़िल्म इन विवादों को पूरी तरह गायब कर देती है, जैसे वे कभी थे ही नहीं। इस तरह की एडिटिंग  केवल “कहानी का हिस्सा छोड़ना” नहीं, बल्कि “इतिहास को संपादित करना” है और जब सिनेमा इतिहास को संपादित करने लगता है, तो वह कला नहीं, प्रचार बन जाता है।

इसमें कोई संदेह नहीं कि एंटोनी फूक्वा एक कुशल निर्देशक हैं। फ़िल्म तकनीकी रूप से मजबूत है। फ़्रेमिंग, एडिटिंग, प्रोडक्शन डिज़ाइन सब प्रभावशाली हैं। लेकिन महान सिनेमा केवल कौशल से नहीं बनता उसके लिए साहस चाहिए और ‘माइकल’ में वही साहस अनुपस्थित है। यह फ़िल्म हर उस मोड़ से बचती है जहां उसे असहज सवाल पूछने चाहिए थे। जैसे वह अपने ही नायक से डरती हो।

माइकल जैक्सन केवल एक कलाकार नहीं थे, वे एक सांस्कृतिक बदलाव के प्रतीक थे। नस्ल, पहचान, मीडिया, और पॉप-कल्चर के जटिल समीकरण उनके जीवन में साफ़ दिखाई देते हैं लेकिन फ़िल्म इन जटिलताओं को सरल बना देती है। वह हमें एक “सुपरस्टार” दिखाती है, लेकिन उस समाज को नहीं, जिसने उसे बनाया और तोड़ा। यह सरलीकरण फ़िल्म को सतही बना देता है।

“माइकल” एक ऐसी फ़िल्म है जो अपने विषय से प्रेम करती है लेकिन उस प्रेम में आलोचना की जगह नहीं छोड़ती। यह फ़िल्म हमें माइकल जैक्सन की महानता दिखाती है, लेकिन उनकी मानवता से दूर रखती है। यह उनकी आवाज़ सुनाती है, लेकिन उनकी खामोशी नहीं समझाती। और अंततः, यही इसकी सबसे बड़ी विफलता है कि यह एक महान कलाकार की “पूरी कहानी” कहने का साहस नहीं जुटा पाती।

माइकल जैक्सन, जिन्हें “किंग ऑफ पॉप” कहा जाता है, का जीवन जितना चमकदार था, उतना ही विवादों से घिरा रहा। उनके करियर के शिखर पर ही उन पर कई गंभीर आरोप लगे, जिनमें सबसे चर्चित बाल यौन शोषण के आरोप थे। 1993 में पहली बार यह मामला सामने आया, जिसने उनकी सार्वजनिक छवि को गहरा झटका दिया। बाद में 2005 में उन पर मुकदमा चला, लेकिन अदालत ने उन्हें सभी आरोपों से बरी कर दिया।

इन कानूनी लड़ाइयों के अलावा, उनके निजी जीवन को लेकर भी कई सवाल उठे चाहे वह उनकी बदलती हुई शारीरिक बनावट हो, जिसे लेकर प्लास्टिक सर्जरी और त्वचा रोग विटिलिगो की चर्चा रही, या फिर उनका रहस्यमयी निजी संसार, जिसमें “नेवरलैंड रैंच” जैसी जगहें अक्सर मीडिया के निशाने पर रहीं।

मीडिया ट्रायल ने उनके व्यक्तित्व को और जटिल बना दिया, जहां सच, अफवाह और सनसनीखेज़ी की सीमाएं धुंधली हो गईं। इन विवादों ने माइकल जैक्सन की विरासत को दो ध्रुवों में बांट दिया। एक तरफ अद्वितीय कलाकार और दूसरी तरफ एक विवादित व्यक्तित्व।

‘माइकल’ आपको चकाचौंध में डुबोती है, लेकिन सच की रोशनी से दूर रखती है और सिनेमा, जब सच से दूर भागता है तो वह मनोरंजन तो बन सकता है, लेकिन इतिहास नहीं।

अगर आप ‘माइकल जैक्सन’ की डांस मूव्स के मुरीद रहे हों तो याद रखें ‘माइकल’ आपके नज़दीकी सिनेमाघर में लगी है। देख लीजिएगा।

 (पंकज दुबे पॉप कल्चर क़िस्सागो, उपन्यासकार और मशहूर यूट्यूब चैट शो स्मॉल टाउन्स बिग स्टोरीज़” के होस्ट हैं।)


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