सीबीआई अफसर को सजा, जरूरी फैसला!

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सीबीआई खुद को देश की प्रमुख जांच एजेंसी बताती है, जो भ्रष्टाचार और दुरुपयोग के खिलाफ लड़ती है। लेकिन जब उसके अपने वरिष्ठ अधिकारी ही मालाफाइड रेड’, मारपीट और साजिश में शामिल हों, तो सवाल उठता है कि तब सीबीआई अपने भ्रष्ट अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई क्यों नहीं करती?

दिल्ली के तीस हजारी कोर्ट में गत 18 अप्रैल को एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया गया। न्यायमूर्ति शशांक नंदन भट्ट ने सीबीआई के वर्तमान संयुक्त निदेशक रमनीश और सेवानिवृत्त सहायक पुलिस आयुक्त वी.के. पांडे को धारा 323, 427, 448 तथा 34 आईपीसी के तहत दोषी ठहराया। यह घटना वर्ष 2000 की है, जब रमनीश सीबीआई में डिप्टी सुपरिंटेंडेंट ऑफ पुलिस के पद पर थे। यह फैसला सीबीआई की विश्वसनीयता पर गंभीर सवाल उठाता है। सीबीआई खुद को देश की प्रमुख जांच एजेंसी बताती है, जो भ्रष्टाचार और दुरुपयोग के खिलाफ लड़ती है। लेकिन जब उसके अपने वरिष्ठ अधिकारी ही ‘मालाफाइड रेड’, मारपीट और साजिश में शामिल हों, तो सवाल उठता है कि तब सीबीआई अपने भ्रष्ट अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई क्यों नहीं करती?

शिकायतकर्ता अशोक कुमार अग्रवाल, 1985 बैच के आईआरएस अधिकारी, उस समय दिल्ली जोन में डिप्टी डायरेक्टर (इनफोर्समेंट) थे। अदालत ने पाया कि 19 अक्टूबर 2000 को सीबीआई टीम द्वारा उनके घर पर की गई प्रातः कालीन रेड और गिरफ्तारी पूरी तरह ‘मालाफाइड’ (दुराभिसंधि से) थी। इसका एकमात्र उद्देश्य सेंट्रल एडमिनिस्ट्रेटिव ट्रिब्यूनल (सीएटी) के 28 सितंबर 2000 के आदेश को निष्प्रभावी बनाना था, जिसमें अग्रवाल के निलंबन की समीक्षा चार सप्ताह में करने का निर्देश दिया गया था।

अदालत ने माना कि रेड और गिरफ्तारी कानून द्वारा प्रदत्त शक्तियों का घोर उल्लंघन थी।

आरोपी अधिकारियों के कार्य ‘आधिकारिक कर्तव्य के निर्वहन’ की परिभाषा में नहीं आते, इसलिए उन्हें धारा 197 सीआरपीसी या दिल्ली पुलिस एक्ट की धारा 140 के संरक्षण का लाभ नहीं मिल सकता। इसके साथ ही अदालत ने इस मामले में साजिश भी स्थापित की। क्योंकि कानून के मुताबिक तत्कालीन डीएसपी रमनीश को केस दर्ज करने का अधिकार ही नहीं था।

अदालत ने कहा कि आरोपियों की पूरी कार्रवाई कानून का उल्लंघन थी और सीएटी के आदेश के तहत शिकायतकर्ता को वंचित करने का जानबूझकर प्रयास था। सबूत ‘बियॉन्ड रीजनेबल डाउट’ के स्तर पर शिकायतकर्ता के पक्ष में थे। विभागीय जांच में यह भी देखना होगा कि डीएसपी रमनीश किसके इशारे पर ऐसा कर रहे थे?

दिल्ली हाईकोर्ट ने 2016 में और सुप्रीम कोर्ट ने मार्च 2023 में पहले ही धारा 197 सीआरपीसी के तहत संरक्षण को अस्वीकार कर दिया था। ट्रायल कोर्ट ने स्वतंत्र रूप से पुष्टि की कि ‘मालाफाइड’ इरादे से किए गए कार्य आधिकारिक कर्तव्य नहीं माने जा सकते। रमनीश आज भी सीबीआई में संयुक्त निदेशक के पद पर हैं। दोषसिद्धि के बाद भी क्या विभागीय कार्रवाई हुई? क्या सस्पेंशन या बर्खास्तगी का प्रस्ताव है?

अतीत में कई मामलों में सीबीआई अधिकारियों पर भ्रष्टाचार, फर्जी मुठभेड़, सबूत गढ़ने या राजनीतिक दबाव के आरोप लगे, लेकिन आंतरिक कार्रवाई अक्सर कमजोर या लंबित रहती है। क्या यह संस्थागत संरक्षण का मामला नहीं है? क्या सीबीआई में ‘अपने लोगों’ को बचाने की संस्कृति है, जो उसकी निष्पक्षता को कमजोर करती है? अगर एजेंसी खुद कानून तोड़ती है तो आम नागरिक उस पर भरोसा कैसे करे? यह घटना 2000 की है, लेकिन आज भी रमनीश जैसे अधिकारी उच्च पद पर हैं, जो कि चिंताजनक है।

यहां आर्टिकल 311 और रूल 19 का उल्लेख जरूरी है। भारतीय संविधान का अनुच्छेद 311 सरकारी कर्मचारियों (सिविल सेवा में नियुक्त व्यक्तियों) की रक्षा करता है। यह कहता है कि किसी कर्मचारी को बिना जांच के, बर्खास्तगी, हटाया जाना या रैंक में कमी नहीं की जा सकती। ऐसे में आरोपी को उस पर लगे आरोप बताए जाएं और सुनवाई का अवसर दिया जाए। लेकिन दूसरे प्रावधान (दूसरा प्रोविजो) में अपवाद हैं। खंड (a) स्पष्ट है, अगर कर्मचारी का आचरण आपराधिक मुकदमे में दोषसिद्धि का आधार बना है, तो पूर्ण जांच की जरूरत नहीं। दोषसिद्धि के आधार पर सीधे बर्खास्तगी या अन्य सजा दी जा सकती है।

सीसीएस (सीसीए) रूल्स 1965 के रूल 19(i) इसी सिद्धांत पर आधारित है। इसमें कहा गया है कि आपराधिक दोषसिद्धि वाले आचरण के आधार पर दंड लगाने के लिए विशेष प्रक्रिया अपनाई जा सकती है। दोषसिद्धि के बाद विभागीय अधिकारी शो-कॉज नोटिस जारी कर कर्मचारी को सजा के प्रस्ताव पर अपना पक्ष रखने का अवसर देता है, लेकिन पूर्ण अनुशासनिक जांच की जरूरत नहीं पड़ती।

रूल 19 का उद्देश्य है कि दोषसिद्धि के बाद अनावश्यक देरी न हो और दोषी को सेवा में बनाए रखने का जोखिम न लिया जाए। अदालत की दोषसिद्धि को विभागीय रूप से स्वीकार किया जाता है, हालांकि कर्मचारी अपील में राहत मांग सकता है, लेकिन अपील या सजा पर स्टे होने से दोषसिद्धि स्वतः रद्द नहीं होती।

इस मामले में रमनीश और पांडे की दोषसिद्धि के बाद सीबीआई और संबंधित विभाग को अनुच्छेद 311(2) के प्रोविजो (a) और रूल 19 के तहत त्वरित कार्रवाई करनी चाहिए। अगर ऐसा नहीं होता तो यह सवाल और मजबूत हो जाएगा कि सीबीआई अपने अधिकारियों के खिलाफ क्यों नरम रवैया अपनाती है ?

कानून के जानकार इस फैसले को न्याय की जीत मानते है, लेकिन फैसला आने में बहुत देरी हुई। 26 साल बाद न्याय मिला। यह दर्शाता है कि शक्तिशाली लोगों के खिलाफ लड़ाई कितनी लंबी और कठिन हो सकती है। सीबीआई को आत्मचिंतन करना चाहिए। अपनी छवि सुधारने के लिए उसे आंतरिक जवाबदेही मजबूत करनी होगी। भ्रष्टाचार विरोधी एजेंसी अगर खुद भ्रष्टाचार या दुरुपयोग से मुक्त नहीं होती, तो लोकतंत्र में उस पर जानता का  विश्वास घटता है।

अशोक कुमार अग्रवाल जैसे निडर लोगों की हिम्मत सराहनीय है। ऐसे लोग दबाव, धमकियों और लंबी कानूनी लड़ाई के बावजूद न्याय की राह नहीं छोड़ते। यह मामला याद दिलाता है कि कानून सबके लिए बराबर होना चाहिए – चाहे आरोपी कोई भी हो। सीबीआई जैसे संस्थानों को इस सबक को गंभीरता से लेना चाहिए, वरना ‘सीबीआई बनाम सीबीआई’ जैसी स्थितियां बार-बार उभरेंगी।


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