क्रिकेट में तो हुए विश्वगुरु!

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बीसमबीस विश्वकप 2026 में अपने खिलाड़ियों ने किंवदंती नुमां क्रिकेट खेली। .. अमदाबाद के नरेंद्र मोदी स्टेडियम पर सवा-लाख लोगों ने बीसमबीस विश्वकप जीत का भव्य उत्सव मनाया। सभी ने खिलाड़ियों का परिवार से मिलना देखा। सेल्फी और फोटो खिंचवाना चला। देश-विदेश से खूब वाहवाही मिली। देश भर को गर्व की अनुभूति हुई। इसलिए क्रिकेट खेल में ही सही, अपन विश्वगुरु हो गए हैं।

“क्रिकेट एक भारतीय खेल है जिसे गलती से अंग्रेजों ने खोजा।“

क्रिकेट के प्रति मन लुभाने वाली और भारतीयों का प्रेम दर्शाने वाली यह बात मनोवैज्ञानिक आशीष नंदी ने अपनी किताब में सन् 1989 में लिख दी थी। जब गए रविवार अमदाबाद में भारत ने लगातार दूसरा बीसमबीस विश्वकप जीता तो उसके अगले ही दिन आशीष नंदी से मिलना हो गया। जानना चाहा कि सैंतीस साल पहले उनके मन में ऐसा क्या चल रहा था जिसने उनको इस खेल के प्रति ऐसा ऐतिहासिक दृष्टिकोण रखने पर मजबूर किया। सोचे गए महाव्याक्य से छह साल पहले, यानी सन् 1983 में इंग्लैंड के ही लॉर्ड्स मैदान पर महान खिलाड़ियों की वेस्ट इंडीज टीम को हरा कर भारत पहली बार विश्वविजेता हुआ था।

अगला एकदिवसीय विश्वकप भी भारत में खेला जा चुका था। उनका मानना था कि भारतीयों पर कॉलोनाइजेशन यानी उपनिवेशवाद की गहरी छाप रही। कॉर्पोरेटाइजेशन यानी व्यवसायीकरण का लोभ भी साफ दिखने लगा था। आर्थिक नीति में सुधार – 1991, और उदारवाद की योजनाएं भी बनने लगी थीं। आज भारतीयों का क्रिकेट प्रेम, इंडिया का रिलिजन ही नहीं है बल्कि भारत आज इस महान खेल का आस्थालय है!

बीसमबीस विश्वकप 2026 में अपने खिलाड़ियों ने किंवदंती नुमां क्रिकेट खेली। विकसित तो भारत जब होगा तब होगा, लेकिन भारत की क्रिकेट आज पूरी तरह विकसित हो गयी है। अमदाबाद के नरेंद्र मोदी स्टेडियम पर सवा-लाख लोगों ने बीसमबीस विश्वकप जीत का भव्य उत्सव मनाया। पटाखों से दिवाली मनाई गयी। चौक-चौराहों पर ढोल-मंजीरा और नाच-गाना चला। विश्वविजेता खिलाड़ियों का जमघट दिखा। सोशल मीडिया पर पसंदीदा खिलाड़ियों की रील चलीं। सभी ने खिलाड़ियों का परिवार से मिलना देखा। सेल्फी और फोटो खिंचवाना चला। देश-विदेश से खूब वाहवाही मिली। देश भर को गर्व की अनुभूति हुई। इसलिए क्रिकेट खेल में ही सही, अपन विश्वगुरु हो गए हैं।

बीसमबीस के स्वरूप में भी खेला तो क्रिकेट ही जाता है। अपने खिलाड़ियों ने आंकड़ों के गणित से अलग खेल की अभूतपूर्व, अनोखी जांबाजी में क्रिकेट खेला। हार से नहीं डरने की प्रतिबद्धता दिखायी। लप्पेबाजी की बल्लेबाजी के इस बीसमबीस खेल में अपने बल्लेबाजों ने लय, लोच और लास्य की अद्भुत कला दिखाई। शतक चुकने की परवाह किए बिना या सफल-असफलता से परे, आक्रामक रोमांच में बल्लेबाजी की। खिलाड़ियों ने खुद से ऊपर टीम को रखने की योजना बनाई थी। गेंदबाजी ऐसी अचूक व सटीक रही की विपक्षी साझेदारी जम या टिक नहीं पायी। और फिल्डिंग ऐसी कि छक्का मान बैठा बल्लेबाज पवेलियन लौटने पर मजबूर हो जाए। भारतीय खिलाड़ियों का आपसी समन्वय इस विश्वकप में लाजवाब रहा। सूर्यकुमार यादव के नेतृत्व वाली इस भारतीय क्रिकेट टीम ने अजूबे किए और अनूठा खेल दिखाए।

विश्वकप के सफलतम खिलाड़ी रहे संजू सैमसन ने जिस शानदार, लगातार आक्रामकता में शुरुआती बल्लेबाजी की वैसी बीसमबीस में पहले देखने को नहीं मिली थी। संजू की प्रतिभा में जो चमक दिखी वो कोहली-रोहित के समय में सहमी सी लगती था। ईशान किशन और अभिषेक शर्मा के प्रति जो सहनशील नेतृत्व सूर्या ने दिखाया, कोहली या रोहित भी अपने में कमतर खिलाड़ियों के प्रति नहीं दिखा पाए थे। सूर्यकुमार का बल्ला बेशक नहीं चला लेकिन उनका नेतृत्व विश्वकप जीत के लिए बेहद जरूरी रहा। सूर्या से पहले विश्वकप जीतने वाले सभी खिलाड़ी टेस्ट या एकदिवसीय क्रिकेट के जानेमाने सफल खिलाड़ी रहे हैं। अच्छा नेतृत्व और सहनशील व्यवहार ही प्रतिभा को चमकने का जरूरी मौका देता है। तिलक वर्मा, शिवम दुबे और अक्षर पटेल को जब और जैसा भी मौका मिला अपनी प्रतिभा से ज्यादा अच्छा खेले।

अपनी गेंदबाजी भी किसी से कम नहीं रही। जसप्रीत बुमराह तो दुनिया के सर्वश्रेष्ट तेज गेंदबाज हैं ही। लेकिन अर्शदीप, सिराज और वरुण ने भी जी-जीन लगायी। कुछ मैच में वरुण को मार भी पड़ी लेकिन उनने कप्तान के विश्वास को डगमगाने नहीं दिया। कुलदीप जैसे शानदार स्पिन-कलाकारी गेंदबाज को बाहर ही बैठना पड़ा। फिल्डिंग में कुछ कैच तो अजब तरह से गजब लपक लिए गए। कुल मिलाकर सूर्या को अब बीसमबीस का बादशाह कहा जा सकता है।

बीसमबीस विश्वकप के बाद अगला संघर्ष अगले साल होने वाले एकदिवसीय विश्वकप में भी चलना चाहिए। अपनी पीढ़ी दर पीढ़ी ने क्रिकेट को जैसे अपनाया, वैसे ही अपन सत्य और अहिंसा को भी अपना सकते हैं। क्योंकि खेल में भी अंतत: तो सत्य ही खिलता है। और अहिंसा के आत्मबल से ही खेल का युद्ध खेला जाता है। हिंसक युद्ध के दौरान शानदार अहिंसक जीत की बधाई। सच्चे विश्वगुरु तो अच्छे प्रयासों से ही बनते है।


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