पारस-शिलाओं के स्पर्श से वंचित ओम बिरला

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चलिए, जो हुआ, सो, हुआ। बिरला फिर आसनारूढ़ हैं। उन्हें होना ही था। कोई दूर-दूर तक सपने में भी यह नहीं सोच रहा था कि उन्हें हटाने का प्रस्ताव पारित हो जाएगा। सो, सब प्रतीकात्मक था। मगर बिरला अगर थोड़े भी संवेदनशील हैं तो यह अहसास उन्हें ज़रूर कचोट रहा होगा कि भारतीय संसद के इतिहास में वे सिर्फ़ चौथे स्पीकर हैं, जिन के ख़िलाफ़ नियम 94-सी के तहत सदन में प्रस्ताव रखा गया।

स्पीकर ओम बिरला को पद से हटाने का प्रस्ताव लोकसभा में ध्वनिमत से गिर भले ही गया, मगर उस पर हुई चर्चा से यह ध्वनि देश के कोने-कोने में पहुंच गई कि उन के कार्यकाल में सदन के पीठासीन चेहरों की साख बहुत नीचे गिर गई है। तीन महीने बाद बिरला को लोकसभा-अध्यक्ष बने पूरे सात साल हो जाएंगे और इन सात बरस के दौरान, चलते सदन में, एक भी दिन उन के चेहरे से निष्पक्षता का नूर टपकता किसी को नहीं दिखा। जब वे सत्तापक्ष की तरफ रुख करते हैं तो उन के चेहरे पर गिलगिल-मुस्कान होती है और जब वे प्रतिपक्ष से मुख़ातिब होते हैं तो उन की ज़ुबान से चेतावनियां और धमकियों की टपटप बरसात होती है।

जब-जब संसद का सत्र होता है, एक दिशा में खीसा-निपोरू और उस की विपरीत दिशा में दांत-पीसू आचरण की छटाएं दिन भर में कई-कई बार देखने को मिलती रही हैं। बिरला के पहले रहे 16 लोकसभा अध्यक्षों में से एक को भी ऐसी रंगबदलू दृश्य प्रस्तुति की महारत हासिल नहीं थी। बिरला 8वें ग़ैर-कांग्रेसी स्पीकर हैं और भारतीय जनता पार्टी की तरफ से चुनाव जीत कर आए दूसरे व्यक्ति हैं, जो लोकसभा-अध्यक्ष बने हैं। उन के पहले सुमित्रा महाजन भाजपा की तरफ से सांसद चुनी गई थीं और नरेंद्र भाई मोदी के पहले प्रधानमंत्रित्व काल की षुरुआत होने पर जून 2014 में स्पीकर बनीं। उन के 5 साल 11 दिन का कार्यकाल गरिमा और काफी-कुछ स्वायत्तता, निष्पक्षता और स्थापित परंपराओं के पालन की मिसाल रहा। शायद यही वज़ह रही कि नरेंद्र भाई के दूसरे कार्यकाल में सुमित्रा ताई को दूसरा कार्यकाल तो छोड़िए, भाजपा की उम्मीदवारी तक नहीं मिली। बहाना था कि वे 76 साल की हो गई हैं और भाजपा ने तय किया है कि 75 की उम्र के बाद सब को मार्गदशन मंडल में जाना होगा।

बहरहाल। मैं समझ सकता हूं कि कांग्रेसी लोकसभा अध्यक्षों के कार्य-व्यवहार से कुछ सीखने से बिरला को जैविक-विरोध रहा होगा, सो, उन्होंने उन के कार्यकाल की कार्यवाहियों में सूराख तलाशने का शोध ही करवाया होगा। सुमित्रा ताई भले ही उन की अपनी भाजपा की थीं, मगर उन से कुछ सीखने की कोशिश करना भी इसलिए घातक साबित होता कि बिरला जानते थे कि उन्हें तो लाया ही सुमित्रा-विलोम बनने के लिए गया है। ऐसे में ‘महाजनो येन गतः स पंथाः’ को गांठ बांध सुमित्रा महाजन की राह पर आंख मूंद कर चल देना उन के लिए आत्मघाती हो जाता। मगर बिरला अगर चाहते तो बाकी के छह ग़ैर-कांग्रेसी लोकसभा अध्यक्षों के कार्यकाल से भी तो बहुत कुछ सीख सकते थे।

मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के सोमनाथ चटर्जी से वे यह हिम्मत जुटाना सीख सकते थे कि स्पीकर के गै़र-राजनीतिक पद की प्रतिष्ठा के लिए ख़ुद के राजनीतिक दल की बात मानने से भी कैसे इनकार किया जाता है। 2008 में मार्क्सवादी पार्टी ने कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार से समर्थन वापस ले लिया था। पार्टी के महासचिव प्रकाश करात ने चटर्जी से कहा कि चूंकि वाम दल अब सरकार के साथ नहीं हैं, लिहाज़ा वे भी स्पीकर के पद से इस्तीफ़ा दे दें। चटर्जी ने ऐसा करने से इनकार कर दिया। उन का कहना था कि स्पीकर एक संवैधानिक पद है और बावजूद इस के कि वे मार्क्सवादी पार्टी की तरफ़ से चुन कर सांसद बने हैं, फ़िलहाल एक गै़र-राजनीतिक पद पर बैठे हैं, इसलिए इस्तीफ़ा दे कर इस पद का राजनीतिकरण करना अनुचित होगा। इस पर उन्हें पार्टी से निष्कासित कर दिया गया। मगर उन्होंने अपना कार्यकाल पूरा किया और 2009 में राजनीति से संन्यास ले लिया।

शिवसेना के मनोहर जोशी, तेलुगु देशम के जी.एम.सी. बालयोगी, जनता दल के रवि राय और जनता दल के कौदूर सदानंद हेगड़े के स्पीकर-कार्यकाल का अध्ययन भी बिरला की संसदीय साक्षरता को काफी पुष्ट बना सकता था। मगर मुझे नहीं लगता कि उन्होंने अतीत के इन पन्नों पर निगाह डालने की कोई ज़हमत उठाई हो। मैं तो कहता हूं कि वे कांग्रेस के लोकसभा अध्यक्षों की व्यवहारकुशलता से भी अपनी ज्ञान-शिराओं को काफी प्रवाहमयी बना सकते थे। और किसी से नहीं तो पहले कांग्रेस की तरफ से और बाद में जनता दल की तरफ से स्पीकर रहे नीलम संजीव रेड्डी से तो थोड़ा-बहुत ग्रहण कर लेने में उन्हें कतई हिचक नहीं होनी चाहिए थी। अब तक दस कांग्रेसी स्पीकर रहे हैं और उन में से चार का कार्यकाल तो मैं ने बहुत नजदीक से देखा है। इसलिए मैं पूरी तरह मुतमइन हूं कि मीरा कुमार, पूर्णो संगमा, शिवराज पाटिल और बलराम जाखड़ से भी सीखने को बिरला के पास बहुत-कुछ था। अगर कहीं वे बलिराम भगत, गुरुदयाल सिंह ढिल्लो, सरदार हुकुम सिंह, एम.ए. आयंगर और जी.वी. मावलंकर के आचरण का हल्का-फुल्का भी आचमन कर लेते तो फिर तो बात ही क्या थी? मगर लगता यही है कि इन पारस-शिलाओं का स्पर्श करने से वे दुर्भाग्यवश वंचित ही रह गए।

चलिए, जो हुआ, सो, हुआ। बिरला फिर आसनारूढ़ हैं। उन्हें होना ही था। कोई दूर-दूर तक सपने में भी यह नहीं सोच रहा था कि उन्हें हटाने का प्रस्ताव पारित हो जाएगा। सो, सब प्रतीकात्मक था। मगर बिरला अगर थोड़े भी संवेदनशील हैं तो यह अहसास उन्हें ज़रूर कचोट रहा होगा कि भारतीय संसद के इतिहास में वे सिर्फ़ चौथे स्पीकर हैं, जिन के ख़िलाफ़ नियम 94-सी के तहत सदन में प्रस्ताव रखा गया। 1954 में मावलंकर के ख़िलाफ़ ऐसा प्रस्ताव आया था। वह पारित नहीं हुआ। 1966 में सरदार हुकुम सिंह के ख़िलाफ़ ऐसा प्रस्ताव लाने की कोशिश हुई थी, लेकिन उसे पेश करने के लिए ज़रूरी सदस्यों का समर्थन नहीं मिला। 1987 में बलराम जाखड़ के ख़िलाफ़ प्रस्ताव आया था। वह भी पारित नहीं हुआ।

इस तरह बिरला तीसरे ऐसे स्पीकर हैं, जिन के खि़लाफ़ आए प्रस्ताव पर लोकसभा में बहस हुई। उस का पारित होना-न-होना नहीं, महत्वपूर्ण यह है कि 74 साल में तीसरी बार लोकसभा को स्पीकर के तौर-तरीकों पर चर्चा करनी पड़ी। क्या अपने अध्यक्षीय आचार-व्यवहार में अब तब्दीली लाने की ज़रूरत बिरला को सिर्फ़ इस एक बात से महसूस नहीं होनी चाहिए कि उन की वज़ह से लोकसभा को तक़रीबन चार दशक बाद ऐसे अशुभ दृश्य से रू-ब-रू होना पड़ा? चूंकि बुनियादी तौर पर यह निजी लाज-हया के दायरे में आने वाला मसला है, इसलिए यह निर्णय बिरला पर ही छोड़ने के अलावा हमारे-आप के पास और चारा ही क्या है कि अपने शेष कार्यकाल में वे पक्ष-विपक्ष के प्रति समान भाव रखते हैं या अपनी पुरानी लकीर के ज़िद्दी फ़कीर ही बने रहते हैं।

हमारी संसदीय परंपराओं को तमाम राजनीतिक दलों के लोगों ने अपने सदाचरण से सींचा है। इस अपरिमित परंपरा-प्रांगण में कदाचरण के चंद छोटे-मोटे टीले भी ज़रूर मौजूद हैं। मगर उन के बावजूद हमारी संसदीय परिपाटियों का आंगन टेढ़ा-मेढ़ा नहीं, कुल मिला कर समतल, समभूमिक और हमवार है। यही हमारी संसद की अंतःशक्ति है। इस शक्ति का क्षरण हुआ तो हमारे लोकतंत्र के लिए बहुत गंभीर दुर्दिन आरंभ हो जाएंगे। यह बात अगर मौजूदा हुकूमत की समझ में नहीं आ रही है या वह जानबूझ कर उसे समझना नहीं चाहती है तो फिर कौन क्या कर सकता है? वैसे तो देश के प्रधानमंत्री को भी पूर्णतः पक्षधरता-मुक्त होना चाहिए, मगर कम-से-कम स्पीकर को तो अपने पूर्वाग्रह इस संवैधानिक आसंदी पर बैठते ही तिरोहित कर देने चाहिए थे। अगर वे अब भी ऐसा नहीं करेंगे तो फिर किस से कोई उम्मीद रखें?


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