मध्यावधि चिंतन या चिंता?

Categorized as अजित द्विवेदी कालम

नरेंद्र मोदी की तीसरी सरकार मध्यावधि में पहुंच गई है। सरकार के ढाई साल पूरे होने वाले हैं। उससे पहले प्रधानमंत्री मोदी ने अपने मंत्रिमंडलीय सहयोगियों के साथ दो दिन की चिंतन बैठक की है। मंत्रिपरिषद के सदस्यों के साथ प्रधानमंत्री पहले भी समय समय पर बैठक करते रहे हैं, जिसमें मंत्रालयों के कामकाज की समीक्षा होती है और आगे की रूपरेखा पर चर्चा की जाती है। ऊपरी तौर पर इस बार भी यही बताया जा रहा है कि सरकार के कामकाज को लेकर चर्चा हुई और 2047 तक विकसित भारत बनाने के लक्ष्य को पूरा करने के उपायों और उसके रास्ते में आने वाली बाधाओं पर विचार विमर्श किया गया है। बाकी बातें औपचारिक डिटेल्स हैं कि कैसे मंत्रालयों के प्रेजेंटेशन हुए, कैसे प्रधानमंत्री ने एक एक प्रेजेंटेशन को बारीकी से देखा, जरूरी सवाल पूछे, गहन गंभीर निर्देश दिए आदि आदि।

अब सवाल है कि यह मध्यावधि चिंतन था या कोई चिंता है, जिसको दूर करने के उपाय तलाशे जा रहे हैं? सरकार में चिंता होने की आशंका इस वजह से ही है नरेंद्र मोदी के तीसरे कार्यकाल में कोई भी काम बड़ा असर छोड़ने या सकारात्मक प्रभाव पैदा करने वाला नहीं हो रहा है। उलटे नकारात्मक प्रचार ज्यादा हो रहा है। सरकार एक के बाद एक मुश्किलों में फंस रही है। यह समय खराब होने का संकेत है।

सोचें, लोकसभा चुनाव में खराब प्रदर्शन करने और बहुमत गंवाने के बाद भाजपा एक के बाद एक राज्यों के चुनाव जीतती गई। पश्चिम बंगाल जैसे राज्य में भाजपा ने इतनी बड़ी जीत हासिल की इसके बावजूद धारणा नकारात्मक बनी हुई है। चुनावी जीत भी फीलगुड का अहसास नहीं करा रही है। उलटे लंबे समय तक शासन की वजह से लोगों में सरकार को लेकर एक थकान पैदा हुई है। एक ही तरह की बातें सुन कर लोग उबे हुए हैं और उनको लग रहा है कि सरकार के पास कहने या देने को नया कुछ नहीं है।

धारणा कैसे नकारात्मक हो रही है इसे प्रधानमंत्री मोदी के जन्मदिन पर दीये जलवाने की घटना से समझा जा सकता है। कहां तो इससे पूरा देश जगमग हो जाना चाहिए था। लेकिन उलटा हुआ। भाजपा के समर्थकों ने भी इसको अच्छा नहीं माना। मोदी के जन्मदिन का समारोह एक महीने तक चलना है लेकिन 17 सितंबर को दीये जलाने के अभियान के बाद से उसकी चमक फीकी पड़ गई है। अब देखऩा है कि सात अक्टूबर का कार्यक्रम कैसा होता है? उस दिन प्रधानमंत्री मोदी के सार्वजनिक जीवन में 25 साल पूरे हो रहे हैं। इसी तरह से ब्रिक्स का इतना बड़ा सम्मेलन दिल्ली में आयोजित हुआ लेकिन भारत को विश्वगुरू बनाने या बताने के अभियान में उसका कोई सकारात्मक योगदान नहीं दिख रहा है।

संस्थाओं की साख को लेकर सरकार अलग संकट से जूझ रही है। चुनाव आयोग के कामकाज को लेकर ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ कि रिपोर्ट ने दिखाया कि कैसे मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार पूरे आयोग को अपनी जागीर समझ रहे हैं और मनमाने फैसले कर रहे हैं। उनके साथ के दो चुनाव आयुक्तों के हवाले सारा खुलासा हुआ है। मतदाताओं के नाम जोड़ने, काटने और उन पर पुनर्विचार का काम मनमाने तरीके से हो रहा था। नाम जोड़ने के फॉर्म में मनमाने तरीके से बदलाव किया गया, जो बाकी दो आयुक्तों के मुताबिक ‘अवैध और अनधिकृत’ है। इलेक्टोरल रजिस्ट्रेशन ऑफिसर्स यानी ईआरओ के अधिकारों में कटौती की गई और चुनाव आयोग की डीजी आईटी ने उन्हें मतदाताओं के नाम जोड़ने और काटने से रोका, सेंट्रल डाटा को एक्सेस करने से उन्हें रोका गया। चुनाव आयोग के कामकाज पर विपक्ष पहले से सवाल उठा रहा था, अब इस रिपोर्ट ने उनकी पुष्टि कर दी है।

इससे ठीक पहले सरकार ने डिजिटल लेनदेन के प्लेटफॉर्म यूपीआई के इस्तेमाल पर शुल्क लगाने का ऐलान किया, जिससे सरकार की लोक कल्याण की प्रतिबद्धता पर सवाल उठे। आम आदमी ने इसे नए टैक्स के रूप में देखा तो व्यापारियों ने ‘नो यूपीआई डे’ मनाना शुरू कर दिया। विपक्ष ने कहा कि अमेरिकी दबाव में फैसला किया गया है। इससे पहले सरकार इथेनॉल मिश्रित पेट्रोल यानी ई-20 पेट्रोल को लेकर आम लोगों के निशाने पर आई थी। सरकार की तमाम सफाइयों के बावजूद आम लोगों ने दावा किया कि 20 फीसदी इथेनॉल मिश्रण से उनकी गाड़ियों के इंजन खराब हो रहे हैं। अंत में सरकार को मानना पड़ा और 10 फीसदी इथेनॉल मिश्रण वाला पेट्रोल भी उपलब्ध कराने की संभावना पर विचार शुरू हुआ।

उधर इथेनॉल के बढ़ते उत्पादन से खाद्यान्न संकट खड़ा होने और खाने पीने की चीजों की महंगाई का संकट अलग आ गया। अगस्त के महीने में खुदरा महंगाई लगातार आठवें महीने बढ़ी और थोक महंगाई की दर भी बढ़ी है। महंगाई की मार को दुनिया में चल रही दो बड़ी जंग ने और व्यापक बना दिया है। रूस व यूक्रेन युद्ध और ईरान पर अमेरिका के हमले से पूरी दुनिया में जरूरी वस्तुओं की आपूर्ति शृंखला प्रभावित हुई है। इसका असर चौतरफा दिख रहा है। ईंधन से लेकर रासायनिक खाद और खाने पीने की चीजों की महंगाई बेहिसाब बढ़ी है।

इससे पहले जून और जुलाई के महीने में सरकार पेपर लीक और परीक्षा में गड़बड़ियों के खिलाफ हो रहे आंदोलन से जूझती रही। छात्रों और युवाओं के आंदोलन का व्यापक असर हुआ। धर्मेंद्र प्रधान को केंद्रीय शिक्षा मंत्री के पद से इस्तीफा देना पड़ा। सरकार को छात्रों की हर मांग पूरी करनी पड़ी। लेकिन उसके बाद भी यह दावा नहीं किया जा सकता है कि युवा सरकार से संतुष्ट हो गए हैं। एजुकेशन, एग्जामिनेशन और एम्प्लॉयमेंट यानी ‘थ्री ई’ का नैरेटिव सरकार के लिए मुश्किल पैदा कर रहा है। देश का आकांक्षी वर्ग जो किसी समय प्रधानमंत्री मोदी और भाजपा का सबसे बड़ा समर्थक था उसमें दिशाभ्रम की स्थिति है।

अगर धारणा की बात करें तो भाजपा और उसकी केंद्र सरकार को सबसे बड़ा झटका अयोध्या के श्रीराम जन्मभूमि मंदिर में चढ़ावा चोरी की घटना से लगा।

घटना का जिस अंदाज में खुलासा हुआ और उसके बाद उसे जिस तरह से हैंडल किया गया उससे बात बनने की बजाय बिगड़ गई। यह आम धारणा बनी है कि सरकार और भाजपा गड़बड़ियों को पकड़ नहीं रहे हैं, बल्कि उन्हें छिपाने की कोशिश कर रहे हैं। पेपर लीक के मामले में भी गड़बड़ी छात्रों ने पकड़ी और उसके बाद सरकार ने कदम उठाया। उसी तरह चढ़ावा चोरी का मामला भी समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव के प्रयासों से सामने आया। उसके बाद भी ऐसा लगा, जैसे पूरे मामले की लीपापोती हो रही है। मंदिर के प्रबंधन से जुड़े बड़े लोगों को उत्तरदायी ठहराने की बजाय छोटे मोटे कर्मचारियों को पकड़ कर मामले को दबाने का प्रयास किया गया। मंदिर आंदोलन की गवाह रही पीढ़ी के मन में तो जो आशंका पैदा हुई है वह अपनी जगह है कि लेकिन बाद की युवा पीढ़ी की स्मृति में मंदिर का पूरा मामला चढ़ावा चोरी की स्मृति के रूप में दर्ज होगा।

सामाजिक स्तर पर सरकार के सामने अलग संकट है। देश में इस समय समाज जिस तरह में विभाजित है वैसा विभाजन इससे पहले कभी नहीं रहा है। हर जगह एससी, एसटी एक्ट के दुरुपयोग की चर्चा है। पिछड़ी और सामान्य वर्ग का जातियों के लोग इससे परेशान हैं। सामान्य वर्ग की जातियां यूजीसी के दिशानिर्देश के खिलाफ अलग आंदोलित हैं। जातियों में आपसी विश्वास का संकट दिख रहा है। आईआईटी बॉम्बे की घटना पर हो रही राजनीति सिर्फ एक इशारा है। समाज का संकट कई रूपों में सामने आ रहा है। एक अराजकता जैसी स्थिति दिख रही है। बिहार के जमुई व समस्तीपुर, ओडिशा के ढेंकनाल और दिल्ली के डीडीए पार्क में युवा लड़के, लड़कियों के साथ जिस तरह से सामूहिक यौन अपराध हुए हैं वह समाज के गहरे संकट के साथ साथ शासन के इकबाल के कमजोर पड़ने का भी संकेत हैं।

भाजपा के लिए सबसे बड़ी चिंता की बात उसके अपने समर्थकों का मोहभंग होना है। सोशल मीडिया में भाजपा और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कट्टर समर्थक रहे दिल्ली के एक वकील ने सोशल मीडिया पर एक पोस्ट लिखी, जो संकट की वास्तविकता को बताती है। उन्होंने लिखा, ‘हमने मोदी को चुना जेएनयू को ठीक करने के लिए लेकिन उन्होंने सारे विश्वविद्यालयों को जेएनयू जैसा बना दिया। हमने मोदी को चुना हिंदुओं को एकजुट करने के लिए लेकिन हिंदू आज जितना विभाजित है उतना पहले कभी नहीं रहा। हमने मोदी को चुना अच्छे दिन के लिए लेकिन उन्होंने सामान्य दिन को भी दुःस्वप्न वाले दिन में बदल

दिया’।

भाजपा और मोदी सरकार को आम लोगों की इस भावना का अहसास है। तभी मध्यावधि चिंतन में इन चिंताओं को दूर करने के उपाय पर भी निश्चित रूप से चर्चा हुई होगी। मोदी सरकार इसके लिए जानी जाती है कि वह समय रहते संकटों को समझती है और उनसे निपटने के उपाय करती है। ये सारे इस साल के संकट हैं। यूजीसी के दिशानिर्देश फरवरी में जारी हुए थे, जेईई मेन्स की परीक्षा मई में लीक हुई थी, चढ़ावा चोरी का मामला जून में सामने आया था, पेपर लीक के खिलाफ आंदोलन जुलाई में हुआ, ई-20 का विवाद भी जुलाई में हुआ और यूपीआई पर शुल्क लगाने का विवाद सितंबर में हुआ। इस तरह फरवरी से सितंबर तक सरकार अनेक किस्म की मुश्किलों से घिरी है और यह उसके लिए चिंता की बात है।


Previous News

More News

यूपी से भाजपा के कितने दावेदार

September 25, 2026

उत्तर प्रदेश की 10 राज्यसभा सीटों के लिए चुनाव की घोषणा हो गई है। उत्तराखंड की एक सीट पर भी चुनाव होगा और पश्चिम बंगाल की एक सीट पर उपचुनाव होगा। लेकिन सबकी नजर उत्तर प्रदेश की 10 सीटों पर है। राज्य में अगले साल फरवरी में होने वाले विधानसभा चुनावों के लिहाज से राज्यसभा…

हरदीप पुरी की वापसी होगी या नहीं?

September 25, 2026

राज्यसभा चुनावों की घोषणा के बाद जिस एक चेहरे को लेकर सबसे ज्यादा सवाल उठ रहे हैं वह हरदीप सिंह पुरी का है। वे नरेंद्र मोदी की सरकार में पेट्रोलियम मंत्री हैं और उत्तर प्रदेश से राज्यसभा के सांसद हैं। पांच महीने में पंजाब में विधानसभा का चुनाव होने वाला है। ध्यान रहे पुरी केंद्र…

राम माधव का इंतजार क्या खत्म होगा?

September 25, 2026

भारतीय जनता पार्टी के बड़े और चर्चित नेताओं में राम माधव संभवतः इकलौते नेता हैं, जो आज तक सांसद नहीं हुए। पार्टी के सारे प्रवक्ता या महामंत्री रहे नेता सांसद बन चुके हैं। जो लोकसभा नहीं जीत सका उसको राज्यसभा भेजा गया। राम माधव न लोकसभा लड़े और न राज्यसभा का चुनाव लड़ा। उलटे भरपूर…

राजस्थान की क्रिकेट राजनीति

September 25, 2026

देश भर में क्रिकेट हो या फुटबॉल या दूसरा कोई भी खेल उनका प्रबंधन नेताओं के हाथ में ही है। एकाध अपवाद हो सकता है कि किसी खिलाड़ी को प्रबंधन में रखा गया हो लेकिन वह भी किसी न किसी राजनीतिक दल की कृपा से ही हुआ होगा। पहले कांग्रेस के हाथ में ताकत थी…

एसआईआर की सफाई में फंसते मतदाता !

September 25, 2026

उत्तरप्रदेश, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, गुजरात समेत बारह राज्यों व केंद्रशासित प्रदेशों की संयुक्त सूची में भी करोड़ों नाम घटे। उत्तर प्रदेश में सबसे बड़ी संख्या में कटौती बताई गई, पश्चिम बंगाल में भी दस प्रतिशत से अधिक गिरावट दर्ज हुई। वहीं महाराष्ट्र में दो करोड़ से अधिक नाम बाहर दिखे, कर्नाटक में एक करोड़ से…

logo