यह फ़िल्म युद्धभूमि से लौटे एक सैनिक की कहानी है, जो अपने ही समाज में मौजूद अन्याय, भ्रष्टाचार और हिंसा से जूझता है। इस अर्थ में ‘सूबेदार’ सिर्फ़ एक एक्शन-ड्रामा नहीं, बल्कि आधुनिक भारतीय समाज के नैतिक संकट का सिनेमाई रूपक भी है। फ़िल्म का केंद्रीय पात्र सूबेदार अर्जुन मौर्य है, जिसकी भूमिका अनिल कपूर ने निभाई है।
सिने-सोहबत
आज के ‘सिने-सोहबत’ में चर्चा करेंगे हाल ही में आई फ़िल्म ‘सूबेदार’ की, निर्देशक हैं सुरेश त्रिवेणी। एक ऐसी फ़िल्म, जिसके ओटीटी पर स्ट्रीम होते ही पहली चर्चा ये छिड़ी कि इसे तो बड़े पर्दे पर रिलीज़ किया जाना चाहिए था। हालांकि कई बार इस तरह के बहस फ़िल्म के प्रोमोशन के लिए भी छेड़े जाते हैं।
भारतीय सिनेमा में सैनिक की छवि लंबे समय तक एक गौरवपूर्ण राष्ट्रीय प्रतीक के रूप में प्रस्तुत की जाती रही है। युद्धभूमि पर लड़ता हुआ सैनिक अक्सर राष्ट्रवाद, त्याग और वीरता का आदर्श बनकर सामने आता है। लेकिन युद्ध के बाद उसका जीवन कैसा होता है? यह प्रश्न अपेक्षाकृत कम फ़िल्मों में उठाया गया है। निर्देशक सुरेश त्रिवेणी की फ़िल्म ‘सूबेदार’ इसी प्रश्न को केंद्र में रखती है।
यह फ़िल्म युद्धभूमि से लौटे एक सैनिक की कहानी है, जो अपने ही समाज में मौजूद अन्याय, भ्रष्टाचार और हिंसा से जूझता है। इस अर्थ में ‘सूबेदार’ सिर्फ़ एक एक्शन-ड्रामा नहीं, बल्कि आधुनिक भारतीय समाज के नैतिक संकट का सिनेमाई रूपक भी है।
फ़िल्म का केंद्रीय पात्र सूबेदार अर्जुन मौर्य है, जिसकी भूमिका अनिल कपूर ने निभाई है। सेना में वर्षों तक सेवा करने के बाद वह अपने घर लौटता है। सामान्यतः हम यह मान लेते हैं कि सैनिक के लिए युद्ध ख़त्म हो जाने के बाद जीवन शांत हो जाता है, लेकिन ‘सूबेदार’ इस धारणा को चुनौती देती है। अर्जुन मौर्य की वापसी दरअसल एक नए संघर्ष की शुरुआत है। घर लौटने पर वह पाता है कि उसका परिवार बिखर चुका है। पत्नी की मृत्यु हो चुकी है और उसकी बेटी श्यामा उससे भावनात्मक दूरी बनाए हुए है। यह स्थिति युद्ध के बाद सैनिकों के जीवन में आने वाली मानसिक और भावनात्मक जटिलताओं की ओर संकेत करती है।
अनिल कपूर इस भूमिका में एक ऐसे व्यक्ति का चित्रण करते हैं जो बाहर से कठोर और अनुशासित है, लेकिन भीतर से गहरे अकेलेपन और स्मृतियों से जूझ रहा है। उनका अभिनय इस फ़िल्म की रीढ़ है।
फ़िल्म की कथा एक छोटे कस्बे में घटित होती है। यह कस्बा किसी विशिष्ट स्थान का प्रतिनिधित्व नहीं करता; बल्कि यह आधुनिक भारत के उन असंख्य कस्बों का प्रतीक है जहां परंपरा, राजनीति और अपराध का जटिल गठजोड़ मौजूद है। छोटे कस्बे का यह परिदृश्य भारतीय साहित्य और सिनेमा में धीरे-धीरे एक महत्वपूर्ण सांस्कृतिक स्थल बनता जा रहा है। यहां न तो महानगर की चमक-दमक है और न ही गांव की सरलता; बल्कि यह एक संक्रमणशील सामाजिक संरचना है, जहां आकांक्षा और असुरक्षा साथ-साथ मौजूद रहती हैं। ‘सूबेदार’ में यही कस्बा अवैध रेत-खनन, माफ़िया और स्थानीय राजनीति की गतिविधियों से संचालित होता है।
फ़िल्म का केंद्र अनिल कपूर का प्रदर्शन है। लगभग चार दशकों से अधिक के अपने अभिनय जीवन में उन्होंने अनेक यादगार भूमिकाएं निभाई हैं, लेकिन ‘सूबेदार’ में उनका अभिनय एक नए रूप में सामने आता है। वे एक ऐसे सैनिक का चित्रण करते हैं, जिसकी आंखों में युद्ध की स्मृतियां और वर्तमान का आक्रोश दोनों मौजूद हैं। उनके संवाद कम हैं, लेकिन उनकी बॉडी लैंग्वेज बहुत कुछ कह देती है।
अनिल कपूर का यह अभिनय हिंदी सिनेमा के “एंग्री यंग मैन” की अवधारणा को एक नई दिशा और नूतन आयाम देता हुआ एक “एंग्री ओल्ड मैन” के कॉन्सेप्ट को सामने लाता है।
राधिका मदान फ़िल्म में अर्जुन मौर्य की बेटी श्यामा की भूमिका निभाती हैं। उनका किरदार सिर्फ़ एक सहायक पात्र नहीं, बल्कि फ़िल्म के भावनात्मक केंद्र का हिस्सा है। श्यामा अपने पिता से दूरी महसूस करती है, क्योंकि उसके बचपन का बड़ा हिस्सा पिता की अनुपस्थिति में बीता है। राधिका मदान अपने अभिनय में इस भावनात्मक द्वंद्व को प्रभावी ढंग से व्यक्त करती हैं। उनकी आंखों में कभी गुस्सा, कभी असुरक्षा और कभी पिता के प्रति छिपा हुआ प्रेम दिखाई देता है।
फ़िल्म के प्रमुख खलनायकों में से एक है प्रिंस भैया, जिसकी भूमिका आदित्य रावल ने निभाई है। आदित्य रावल इस किरदार में छोटे कस्बों की अपराध राजनीति के उस युवा चेहरे का प्रतिनिधित्व करते हैं, जो शक्ति और भय के माध्यम से सत्ता हासिल करना चाहता है। उनका अभिनय आक्रामक और ऊर्जा से भरा हुआ है। हालांकि चरित्र की गहराई सीमित है, फिर भी आदित्य रावल स्क्रीन पर एक प्रभावी प्रतिपक्षी के रूप में उभरते हैं।
फ़ैसल मलिक का किरदार सॉफ्टी फ़िल्म में एक अलग तरह की उपस्थिति लेकर आता है। यह पात्र अपराध जगत का हिस्सा होते हुए भी एक विशिष्ट मानवीय आयाम रखता है। फ़ैसल मलिक अपनी सहज अभिनय शैली के लिए जाने जाते हैं, और यहां भी वे अपने किरदार में एक तरह की वास्तविकता लेकर आते हैं। उनकी डायलॉग डिलीवरी और चेहरे की सूक्ष्म भावनाएं चरित्र को विश्वसनीय बनाती हैं। इस फ़िल्म में फ़ैसल के अभिनय ने उनके क्राफ़्ट की विविधता को बखूबी प्रस्तुत किया है। फ़ैसल मालिक अपने शानदार अभिनय से यह सिद्ध करने में पूरी तरह कामयाब रहे हैं कि वे सिर्फ़ ‘पंचायत’ के प्रह्लाद चा जैसी गुदगुदाने वाली भूमिका में ही नहीं, बल्कि ‘सूबेदार’ के सॉफ़्टी की तरह दिल दहला देने वाले किरदार के साथ भी पूरा न्याय कर सकते हैं।
फ़िल्म की सत्ता संरचना में एक महत्वपूर्ण पात्र है बबली दीदी, जिसे मोना सिंह ने निभाया है। यह पात्र जेल में रहते हुए भी पूरे अपराध नेटवर्क को नियंत्रित करता है। मोना सिंह इस किरदार में एक संयत लेकिन खतरनाक शक्ति का आभास कराती हैं। उनका अभिनय यह दिखाता है कि सत्ता सिर्फ शारीरिक हिंसा से नहीं, बल्कि रणनीति और मनोवैज्ञानिक नियंत्रण से भी संचालित होती है। सौरभ शुक्ला फ़िल्म में अर्जुन मौर्य के मित्र प्रभाकर की भूमिका निभाते हैं। उनका किरदार कहानी में मानवीय गर्माहट लेकर आता है। सौरभ शुक्ला अपनी सहज अभिनय शैली से इस पात्र को विश्वसनीय बनाते हैं। इसके अतिरिक्त फिल्म में कई सहायक कलाकार भी हैं जो छोटे कस्बे की सामाजिक संरचना को जीवंत बनाते हैं।
सुरेश त्रिवेणी इससे पहले अपेक्षाकृत संवेदनशील और मानवीय कहानियों के लिए जाने जाते रहे हैं। “तुम्हारी सुलु” और “जलसा” जैसी फिल्मों में उन्होंने सामाजिक यथार्थ को सूक्ष्मता से प्रस्तुत किया था। ‘सूबेदार’ में वे एक्शन और सामाजिक यथार्थ को मिलाने का प्रयास करते हैं।
उनकी सबसे बड़ी सफलता यह है कि फ़िल्म का वातावरण प्रामाणिक लगता है। छोटे कस्बे की धूल भरी सड़कें, खदानों का परिदृश्य और स्थानीय राजनीति की जटिलता, ये सभी तत्व फ़िल्म को वास्तविक बनाते हैं।
‘सूबेदार’ को सिर्फ़ एक एक्शन फ़िल्म के रूप में देखना पर्याप्त नहीं होगा। दरअसल, यह फ़िल्म आधुनिक भारत के सामाजिक-राजनीतिक संकट की ओर भी संकेत करती है। जब एक सैनिक, जिसने देश की सीमाओं की रक्षा की है, अपने ही समाज में न्याय के लिए संघर्ष करने को मजबूर हो जाता है, तब यह स्थिति हमारे लोकतंत्र की नैतिक जटिलताओं को उजागर करती है।
इस दृष्टि से ‘सूबेदार’ एक महत्वपूर्ण रूपक बन जाती है। एक ऐसे समाज का रूपक जहां वीरता और नैतिकता का असली परीक्षण युद्धभूमि के बाहर होता है। ‘सूबेदार’ हिंदी सिनेमा की उन फ़िल्मों में से है जो लोकप्रिय मनोरंजन और सामाजिक टिप्पणी के बीच संतुलन बनाने की कोशिश करती हैं।
‘सूबेदार’ बेशक़ एक यादगार फ़िल्म बन सकती थी अगर इसकी कहानी और स्क्रीनप्ले पर थोड़ा और काम कर लिया जाता। पटकथा बेहद लीनियर है और लगभग सभी मौक़ों पर प्रेडिक्टेबल भी। फ़िल्म में कलाकारों के चयन के साथ साथ फ़िल्म की लुक और फ़ील पर तो शानदार काम हुआ ही है, सिनेमेटोग्राफी, एडिटिंग, साउंड डिज़ाइन और निर्देशन पर भी ज़बरदस्त मेहनत हुई है। काश, कहानी की गहराई और लेयरिंग पर भी अगर ईमानदार प्रयास हो गए होते तो क्या बात बन जाती! इस नज़रिये से देखें तो एक फ़िल्म के तौर पर ‘सूबेदार’ एक मिस हुआ सा मौक़ा है।
मिलाजुला कर ‘सूबेदार’ की कहानी हमें यह याद दिलाती है कि सच्ची वीरता सिर्फ युद्ध जीतने में नहीं, बल्कि अन्याय के खिलाफ खड़े होने में निहित है। युद्ध समाप्त होने के बाद भी सैनिक का संघर्ष खत्म नहीं होता। वह समाज के भीतर न्याय और सम्मान की रक्षा करने के लिए एक नया युद्ध लड़ता है।
अमेज़न प्राइम वीडियो पर है। देख लीजिएगा। (पंकज दुबे पॉप कल्चर क़िस्सागो, उपन्यासकार और मशहूर यूट्यूब चैट शो ‘स्मॉल टाउन्स बिग स्टोरीज़” के होस्ट हैं।)
