निस्संदेह, भारतीय सभ्यता कभी महान थी। पर हजार सालों से भी अधिक समय से वह जिस हाल में गई और अभी जो है — उस में गर्व करने के लिए क्या है? उपनिषद, गीता, योगसूत्र, आदि आध्यात्मिक ज्ञान हैं, वह भी हजारों वर्ष पहले के। तक्षशिला या मौर्य साम्राज्य भी सदियों पहले की स्मृतियाँ है। जिन में भी अनेक को विस्मृति से निकाल सामने लाने का काम विदेशियों ने किया। वह करने की हमारी क्षमता ही नहीं थी। सो, बाह्य ज्ञान में हम सदियों से सिफर थे और आध्यात्मिक ज्ञान को हम ने खुद शिक्षा से बाहर रखा हुआ है!
राष्ट्रवाद और हिन्दू अज्ञान परंपरा-1
कई बरसों से अकादमिक संस्थानों में ‘इंडियन नॉलेज’ विमर्श पर दिखता दृश्य शोचनीय है। इस में जानने, पढ़ने के बदले दूसरों को दूषने और रटी-रटाई दुहराने की आदत बढ़ रही है। इस की कतई कोई कैफियत या सफाई नहीं हो सकती, और यह हानिकारक है।
‘इंडियन नॉलेज’ पर आयोजित सेमिनार में वक्ता यदि मैक्स म्यूलर को गालियों से सजा रहा हो, तो विद्यार्थी क्या सीखेंगे? यह उन की ज्ञान-पिपासा को गंदा पानी देना है। अधिकांश आयोजनों में ढेरों निराधार बातें कही जाती हैं। वह भी तोतारटंत तमाशे जैसी। मानो कोई जंगम थियेटर जगह-जगह एक ही नाटक कर रहा हो।
उस में ज्ञान गौण दिखता है। केवल ‘इंडियन’, बल्कि उस के नाम पर संकीर्ण ठसक रहती है। फिर ‘इंडियन’ शब्द भी दलीय दिखता है। आखिर इंडियन तो वे विद्वान, या नेता भी हैं जो दलबंदी से दूर या अन्य दलों से हैं। किन्तु वे इस पूरे अभियान से बाहर रखे गये हैं, चाहे किसी विषय के बड़े ज्ञाता ही क्यों न हों।
इतिहास, राजनीति, साहित्य, दर्शन, आदि विषयों के सच्चे जानकारों का भी किसी को पता नहीं। वे हैं, विलुप्त हो चुके, या उन का कोई मतलब भी है? हर कहीं एक्टिविस्ट प्रचारक हावी दिखते हैं, और सारी गतिविधि मजे से चल रही है। इस नाम पर विश्वविद्यालयों, अकादमियों में बरसों से जो हो रहा है, उसे देख कर किसी सच्चे लेखक, शिक्षक का दिल बैठ जाएगा!
कोई देखे कि उन गतिविधियों में क्या ‘इंडियन’, कौन सा ‘नॉलेज’, या देसी ‘सिस्टम’ है? पहले तो, ज्ञान किसी देश का होता ही नहीं। उसे खोजने, देने वाले द्रष्टा, कवि, लेखक पूरी मानवता के होते हैं: ‘स्वदेशे पूज्यते राजा, विद्वान सर्वत्र पूज्यते’। क्योंकि ज्ञान का प्रकाश भी सूर्य के प्रकाश की तरह सर्वत्र समान है। जैसे सूर्य को ‘देसी’ सीमा में देखना मूर्खता है, वैसे ही ज्ञान को भी। इसीलिए उपनिषद से लेकर प्लेटो, शेक्सपीयर, या आज के एआई तक पूरी मानवता के प्रति समदर्शी हैं। तभी न एआई, न उपनिषद को किसी प्रोपेगंडा की जरूरत है। उन की मूल्यवत्ता स्वत: जगजाहिर है।
इसीलिए, किसी ‘नॉलेज’ को ‘इंडियन’ बताकर उछल-कूद बचकाना है। तब आप को ‘अमेरिकन’ या ‘ब्रिटिश’ नॉलेज भी चिन्हित करना होगा — जिस से ही आज हमारा लगभग संपूर्ण जीवन चलता है। न कि इंडियन नॉलेज से। बिजली, रेलवे, मोटरकार, एयरप्लेन, प्रिंटिंग प्रेस, मोबाइल, आधुनिक घर-फ्लैट, टॉयलेट, डाइनिंग टेबल, चाय, केक, बर्थ-डे, कोट-सूट, शर्ट-पैंट, स्कर्ट, सिनेमा, अखबार, करेंसी, इंटरनेट, यूपीआई, उबेर, फेसबुक, यूट्यूब, क्रिकेट, फुटबॉल, बैडमिंटन, क्लब, पार्क, या फिर कँटीले तार, राइफल, बम, मिसाइल, टैंक, तथा संविधान, पेनल कोड, नागरिक समानता, स्थाई कर्मचारी तंत्र, प्रतियोगी परीक्षाएं, सुप्रीम कोर्ट, और चालू कैलेंडर, सन्डे ऑफ तक … इन तमाम खोजों, साधनों, निर्माणों, व्यवस्थाओं, रीतियों में ‘इंडियन’ नॉलेज क्या है? सभी की सभी पर ‘ब्रिटिश’, ‘जर्मन’, ‘अमेरिकन’, ‘रोमन’, आदि टैग लगाना होगा! अर्थात् भौतिक जीवन के लिए आवश्यक संपूर्ण बाह्य ज्ञान पर।
वैसा न करने पर ‘इंडियन’ और ‘फॉरेन’ का अंतर कैसे होगा? कैसा बचकानापन कि किसी नॉलेज को ‘इंडियन’ तो बताएं, परन्तु अन्य नॉलेज का ‘जर्मन’ या ‘रोमन’ होना गोल कर दें! मापदंड एक होगा। उदाहरणार्थ, ‘हिस्टरी’ ज्ञान ही ग्रीक देन है। भारत में यह कभी था ही नहीं! आखिर, हिन्दुओं में अतीत-बोध न होना, पिछली गलतियों से न सीखना, बार-बार एक ही गलती दुहराना, तथा काल्पनिक बातों, लनतरानियों, जुमलों से प्रेम रखना अनायास नहीं है।
वैसे भी, जो एक नाम तक ‘इंडियन’ न बना सके — मूल नाम रखा ‘इंडियन नॉलेज सिस्टम’! उस का हिन्दी अनुवाद किया: भारतीय ज्ञान परंपरा, जबकि ‘सिस्टम’ और ‘परंपरा’ बिलकुल भिन्न पद हैं — वे आगे क्या करते होंगे।
ज्ञान का ध्यान हो तो बिना किसी आडंबर केवल मूल्यवान पुस्तकों को चालू सिस्टम में, यानी स्कूल-कॉलेज, सर्विस कमीशन, आदि के सिलेबस में जोड़ देना पर्याप्त है! विषय और कक्षा स्तर के अनुकूल महान पुस्तकों, उस के अंशों, पाठों के चयन का काम सच्चे विद्वान और जानकार कर दे सकते हैं। फिर, परीक्षाओं को गुणवत्ता पूर्ण बना देना। तब ज्ञानार्जन स्वत: बढ़ जाएगा।
पर ज्ञान का प्रसार, बच्चों-युवाओं को विवेकवान, चरित्रवान बनाना उद्देश्य नहीं लगता। उद्देश्य है: छाती ठोकना, हाँकना, अन्य दलों, या निर्दलीयों को कोसना, लांछित करना, एवं विदेशियों पर कीचड़ उछालना। इसीलिए, पूरी गतिविधि एक दल-परिवार के हवाले दिखती है। ताकि कोई जानकार या विद्वान भी दलीय स्वार्थ और ऊल-जुलूल फैलाने में अड़चन न बने।
यह सब कितना लज्जाजनक व हानिकारक है, यह समझने वाले नेता भी देश में शायद नहीं रह गये। वरना, कोई तो इस पर रोता-धोता, यदि कुछ और न कर सकता। ऐसे ठस देसी नेताओं की तुलना में अंग्रेज शासक हमारे लिए देवदूत थे! जिन्होंने सुदूर देहातों तक में प्लेटो, शेक्सपीयर, वाल्टेयर और गिब्बन जैसी अपनी सर्वोत्तम सामग्री से भारतीय पीढ़ियों का मानसिक, बौद्धिक पोषण, संवर्धन, प्रोत्साहन किया था।
जबकि हमारे लोग शिक्षा में मुख्यत: नेता-प्रचार, पार्टी-बंदी, मतवाद, फैलाते रहे हैं। उसी क्रम में, ‘इंडियन नॉलेज’ भी डंके सा पीट रहे हैं। इस में ज्ञान की सुगंध या आभा कम ही है। जितना सत्य है भी, वह नारे वाले अहंकार से दबा रहता है। ज्ञान पीछे रह जाता है और हम इंडियन ‘ऊँचे नॉलेज वाले’, जबकि पश्चिम स्वार्थी, दुष्ट, आदि — यह ध्वनि पूरे आई.के.एस. डंकावादन में अधिक तीव्र है।
तब ‘विद्या ददाति विनयम’ का क्या होगा, जब आई.के.एस. पर बोलने वाला तैश में लहराता और घमंड से इतराता नजर आए? इस प्रोपेगंडा में विद्वान इक्के-दुक्के दिखते हैं, जो कुछ ढंग की बातें करते हैं। बाकी अधिकांश बस जोश दिखाते, कुछ श्लोकों की तोतारटंत, तथा निरापद लोगों एवं अप्रासंगिक विषयों पर छींटाकशी करते रहते हैं।
जिन के हाथ में सत्ता, साधन, संस्थान भी हैं, वैसे महानुभाव भी बस कोसते ही रहते हैं! बरसों, दशकों से यही उन की स्थाई अदा है। सब कुछ हाथ में लेकर भी कोसना, व्यंग्य करना, और डींग हाँकना ही ‘भारतीय ज्ञान’ की गतिविधि बना दी गई है। इसीलिए, सामने खड़ी शैक्षिक समस्याएं उन आयोजनों में कभी विचारणीय नहीं होती। जैसे, अयोग्यता के आरक्षणों की बढ़ती भरमार, उस के परिणाम, शिक्षा-परीक्षा की गुणवत्ता का पतन, अनेक विषयों में उच्च डिग्रीधारियों की वास्तविक जानकारी से दूरी, नियुक्तियों में भ्रष्टाचार, आदि। यह सब बदतर हो रहे हैं। पर अपने को ‘विश्वगुरु’ कहने की शेखी बढ़ रही है।
इस प्रकार, शिक्षा में राजनीतिक चालबाजियाँ सर्वोपरि हो गई है। जिस में विद्या और विद्यार्थी ही ध्यान से बाहर हैं। अब अधिकांश खर्चीले सेमिनार, व्याख्यान उन जुमलों पर होते हैं जो नेता आए दिन देते रहते हैं! क्या अंग्रेजी राज में यहाँ शिक्षा संस्थानों में ऐसी फूहड़ता कभी नोट की गई थी?
बहरहाल, किसी मूल्यवान ज्ञान, संस्था या व्यक्ति को भी नारे लगवा कर अपनी महानता बताने की जरूरत नहीं होती। ऑक्सफोर्ड या हार्वर्ड को, या ट्विटर या टाटा को जगह-जगह भाषण आयोजित कराने की जरूरत नहीं हुई कि वह ‘महान’ है। इसलिए, ‘इंडियन नॉलेज’ का नारा उलटे दिखाता है कि मामला गड़बड़ है।
निस्संदेह, भारतीय सभ्यता कभी महान थी। पर हजार सालों से भी अधिक समय से वह जिस हाल में गई और अभी जो है — उस में गर्व करने के लिए क्या है? उपनिषद, गीता, योगसूत्र, आदि आध्यात्मिक ज्ञान हैं, वह भी हजारों वर्ष पहले के। तक्षशिला या मौर्य साम्राज्य भी सदियों पहले की स्मृतियाँ है। जिन में भी अनेक को विस्मृति से निकाल सामने लाने का काम विदेशियों ने किया। वह करने की हमारी क्षमता ही नहीं थी। सो, बाह्य ज्ञान में हम सदियों से सिफर थे और आध्यात्मिक ज्ञान को हम ने खुद शिक्षा से बाहर रखा हुआ है! तब आज का ‘इंडियन’ किस बात पर इतरा कर दूसरों को हीन बताना अपने ‘नॉलेज’ की श्रेष्ठता मानता है?
जिस नालंदा, तक्षशिला, कई मूल्यवान ग्रंथों और महान शासकों पर हम गर्व करते हैं — वह जिन लोगों ने खोज कर दिए, उन्हीं की भर पेट निन्दा ही इस नई रटंत का सिग्नेचर ट्यून है! यहाँ बौद्धिक चर्चाओं में यदि विलियम जोन्स, होरेस हेमन विल्सन, जॉन मार्शल, जेम्स मिल, अलेक्जेंडर कनिंघम, मैक्स म्यूलर, विन्सेंट स्मिथ, या फिट्ज एडवर्ड हॉल का कभी उल्लेख होता भी है — तो प्रायः द्वेष के साथ। जब कि यही वे महापुरुष हैं जिन्होंने विकट परिश्रम, और जीवन लगाकर, भारतीय इतिहास के असंख्य गौरव स्थलों और लुप्त ग्रंथों को खोज निकाला! जो इतिहास की मिट्टी में गहरे दफन हो चुके थे। हमारे लिए यह पूरे विषय ही — हिस्टोरियोग्राफी और आर्कियोलॉजी — यूरोपीय देन हैं। दो सौ साल पहले पूरा भारत ‘हिस्टरी’ विषय से अनजान था! इस का विराट अर्थ समझना चाहिए।
सो, हमें हमारा अपना इतिहास-ज्ञान ही यूरोपियन देन है। तब हम किस ‘परंपरा’ का दावा, किस बूते करते हैं — यदि यहाँ इतिहास विवरण था ही नहीं? अतः यह सारी घमंडी ‘राष्ट्रवादी’ लनतरानियाँ बस सवा सौ साल पहले शुरू हुई हैं। वह भी अंग्रेजी राज से मिली सुरक्षा, सुविधा, शिक्षा, और अभिव्यक्ति स्वतंत्रता के बल पर! वरना, 1206 से 1707 ई. तक हमारी बोली अपने ही देश में कहाँ गुम रही? उन सदियों में हमारे पास कौन सी ‘राष्ट्रीय’ संस्था, रचना या संगठन था? (जारी)
