जो लोग मैकाले को कोसते और ‘इंडियन नॉलेज‘ का डंका पीटते हैं, वही दूसरी साँस में भारतीय इंजीनियर, डॉक्टर और टीचर ‘एक्सपोर्ट‘ करने की डींग भी हाँकते हैं। जबकि ऐसे भारतीय मैकाले-शिक्षा, यानी अंग्रेजों की देन हैं! इसी तरह, जो ‘वसुधैव कुटुंबकम्‘ बोल कर फूलते हैं, वही अमेरिका और यूरोप को नीच बताते हैं। ऐसे प्रचारक अपनी ही दो बातें जोड़कर विचारने में असमर्थ हैं — कि उस में क्या संगति है?
राष्ट्रवाद और हिन्दू अज्ञान परंपरा-2
अंग्रेजी राज से पहले, भारतीय परिदृश्य में सदियों से अधिकांश समाज के उत्पीड़न, अपमान, और लाचारी की मौखिक टूटी-फूटी कथाएं, और बाकी सन्नाटा है। उन सदियों से पहले के भारतीय विवरणों को भी पश्चिमी विद्वानों ने खोजा। पर उन्हें लांछित करके ही हमारे बौद्धिक अपने ‘ज्ञान’ का घमंड करते हैं। मानो, प्लेटो या शेक्सपीयर को मामूली बताकर ही, हम भर्तृहरि या तुलसीदास के प्रेमी हो सकते हैं!
यह मूढ़ प्रवृत्ति स्वतंत्र भारत में गत सौ सालों से राष्ट्रवाद के नाम से चल रही है। इस का मुख्य स्वर आत्म-श्लाघा और परनिन्दा है। इस में आकंठ डूबे लोग अपने मनीषियों की बातें भी ठुकराते हैं। यदि वह दलबंदी अनुकूल न हो। खोज देखिए: टैगोर, श्रीअरविन्द, अज्ञेय, महादेवी, जैसे आधुनिक मनीषियों के सामाजिक विचार हमारे बौद्धिक आयोजनों में कब सुने गये हैं?
इसीलिए मैक्स म्यूलर या मैकॉले को भी बुरा-भला कहने वाले अधिकांश प्रवाचक उन के काम व लेखन से अपरिचित हैं! वे इस से भी लापरवाह हैं कि विवेकानन्द जैसे ज्ञानी ने मैक्स म्यूलर को ‘ऋषि’ कहा था। उन से मिलने गये, उन पर श्रद्धापूर्ण लेख लिखा। पर आज ‘इंडियन नॉलेज’ की बातें करने वाले अनेक लोग मैक्स म्यूलर का नाम ऐसे लेते हैं जैसे वह कोई बदमाश-उचक्का रहा हो। उस ‘स्कॉलर एक्स्ट्राऑर्डिनरी’ के बारे में ऐसे बोलना ही राष्ट्रवाद है!
इस विवेक-विरुद्ध प्रवृत्ति के कारण ही टैगोर जैसे संवेदनशील कवि ने नेशनलिज्म के विरुद्ध कठोर चेतावनियाँ दी थी। उन्होंने कहा था: “राष्ट्रवाद हमारा अंतिम आध्यात्मिक ध्येय नहीं हो सकता। मेरी शरणस्थली तो मानवता है। मैं हीरों की कीमत पर शीशा नहीं खरीदूँगा और जब तक मैं जीवित हूँ देशभक्ति को मानवता पर कदापि विजयी नहीं होने दूँगा।” उन्होंने सही कहा था। ‘नेशनलिज्म’ हाल में पैदा हुई संकीर्णता है। इस में दूसरों से दुराव बनाने के लिए देशभक्ति का दुरुपयोग होता है। राष्ट्रवाद का ही दूसरा पहलू दलवाद है — मेरा दल देशभक्त और दूसरे देशद्रोही। वरना ज्ञान के क्षेत्र में राष्ट्रवाद, दल, संगठन, ‘अपना’ और ‘पराया’ की बातें बेमतलब हैं!
ज्ञान, साहित्य, कला, और साइंस — यह सब मानवता के निस्सीम क्षेत्र हैं। इस में प्रेम व श्रद्धा से लगे लोग सदैव पूरी मानवता के रहे हैं। खोज देखिए — उपनिषद, योगसूत्र या गीता में कहाँ है ‘राष्ट्रवाद’? या प्लेटो, ऑरेलियस, या गालिब में? मोजार्ट, चायकोवस्की, या वान गॉग में? यानी, केवल अपने देश को श्रेष्ठ और दूसरों को हीन समझना?
जबकि भू-भागों का राजनीतिक रूप बदलती चीज है। भारत में ही अस्सी साल पहले लाहौर हमारे राष्ट्रवाद में शामिल था। आज हमारे ‘राष्ट्रवादी’ कब लाहौर का नाम लेते हैं? सो, राष्ट्रवाद एक संकीर्ण, गिरगिटी, और प्रायः दिखावटी चीज भी है। यह आज हमारे ‘राष्ट्रवादी’ गुट के कारनामों से भी देख सकते हैं।
इसीलिए, पूरे विश्व के सभी चिंतक और कलाकार सत्य, ज्ञान, कला, गुण, चरित्र, सौंदर्य, आदि को भौगोलिक सीमाओं से परे मानते हैं। यह सब देवताओं का क्षेत्र है। यही समझ शिक्षा की भी पहली सुनहरी ईंट है। यहाँ से शिक्षा आरंभ होती है।
तभी तो उन यूरोपीय विद्वानों ने भी भारत की महान धरोहरों, और साहित्य की खोज में जीवन लगा दिया! वे ज्ञान व सौंदर्य के प्रेमी थे। उन्होंने ऐतिहासिक भारत को पुनः जोड़ कर खड़ा किया, जिसे सदियों के इस्लामी विध्वंस ने मिट्टी में मिला दिया था। भारतीय अतीत के असंख्य गौरवशाली अध्यायों, कृतियों, महापुरुषों को विश्व के सामने लाने का श्रेय यूरोपियनों को है। सम्राट अशोक जैसे शासक का विवरण भी दो सौ वर्ष पहले तक किसी भारतीय स्त्रोत में नहीं मिलता।
वस्तुत: 1817 में जेम्स मिल की ‘हिस्टरी ऑफ ब्रिटिश इन्डिया’ से पहले यहाँ इतिहास की कोई व्यवस्थित पुस्तक नहीं लिखी गई। पौराणिक गाथाओं — उसे वास्तविक या काल्पनिक जो मानें — के सिवा हमारे पास कोई विवरण न था। डेढ़ सौ वर्ष पहले तक किसी भारतवासी के लिए प्राचीन तक्षशिला अथवा इन्द्र की अलकापुरी — एक जैसी काल्पनिक या सुनी-सुनाई चीज थी। उन के बारे में कोई कुछ भी माने, या न माने। उस के अस्तित्व, स्थान, काल का प्रमाण यहाँ नहीं था।
सो, हमारे अतीत के बारे में ग्रीस, चीन, अरब, वेनिस, फ्रांस, मोरक्को, आदि कहीं बाहरी स्त्रोतों में जो छिट-पुट विवरण उपलब्ध थे, उन्हें खोज, निकाल, अनुवाद, शोध, छान, मिलान, आदि कर के यूरोपियनों ने सामने लाया। जिस से ही भारतीय नेताओं व लेखकों को अपने देश के प्रति एक नये अभिमान की अनुभूति हुई! वरना इस्लामी आक्रांताओं के हाथों सदियों दुर्गति व अपमान झेलते रहने के बाद आम हिन्दुओं में कुछ आत्म नहीं बच गया था। हिन्दुस्तान को इस्लामी साम्राज्य का अंग माना जाता था। 18वीं सदी तक हिन्दू सभ्यता मरणासन्न हो चुकी थी। जिस में फिर संयोग से अंग्रेजी राज ने ही प्राण लौटाए! अतः आज भारत जो भी है, उस का बड़ा श्रेय अंग्रेजों को है।
इसे परख कर देखें। भारतीय अतीत की खोज के अतिरिक्त, ठोस जन-जीवन को भी अंग्रेजों की भौतिक, सामाजिक देन अतुलनीय है। आज हमारा संपूर्ण बाह्य जीवन ही ब्रिटिश विरासत है। उदाहरण: 1. भारत की राजनीतिक एकता; 2. सैनिक व सुरक्षा तंत्र, उस की प्रशिक्षण व्यवस्था; 3. प्रशासनिक, पुलिस, न्यायिक, तथा स्थानीय स्वशासन तंत्र; 4. निर्वैयक्तिक राजकर्मचारी तंत्र, लोक सेवा आयोग; ऑडिट; 5. अभिव्यक्ति स्वतंत्रता, मताधिकार, और कानूनी-संविधानिक व्यवस्था; 6. अखिल भारतीय मुद्रा, डाक, रेलवे, आधुनिक संचार; तथा 7. शिक्षा, पुस्तकालय, विश्वविद्यालय, संग्रहालय, अखबार, पत्रिकाएं, गजेटियर, आदि तक की पूरी सार्वजनिक व्यवस्था; अनेक नये अध्ययन विषय, परीक्षा प्रणाली, सारी डिग्रियाँ, प्रमाणपत्र, अवार्ड, स्कॉलरशिप; तथा 8. आधुनिक घर, फ्लैट ही नहीं, शौचालय तक से परिचय व डिजाइन तक, एवं अनेकानेक खेल, मनोरंजन, आदि भी यहाँ ब्रिटिश देन है।
उपर्युक्त चीजें हमारे पास पहले या तो बिलकुल न थी, या कुछ थीं भी, तो पूरे समाज के लिए नहीं थी। उक्त व्यवस्थाओं में एक-एक, जो हमें बड़ी सामान्य लगती है, और सुबह से शाम तक सभी भारतवासियों द्वारा उपयोग में आती है — उन में किस चीज को किसी भी ब्रिटिश-पूर्व ‘इंडियन’ चीज, या इंडियन ‘सिस्टम’ से बदला जा सकता है?
उक्त सभी सामान्य लगने वाली व्यवस्थाएं बहुत बड़ी देन हैं। इतनी मूल्यवान कि किसी को भी छोड़ना कोई भारतीय सोच भी नहीं सकता! लेकिन यह सब देने वाले ब्रिटिश शासकों, विद्वानों, आदि के बारे में गत सौ सालों से हमारे नेताओं ने हमें केवल अपशब्द सिखाया है! आधुनिक यूरोप की उदारवादी, वैज्ञानिक, मानवतावादी, मुक्त परंपरा से सीखकर उसी भावना में आगे बढ़ना तो दूर रहा! यही राष्ट्रवाद है। क्या यह कोई ‘नॉलेज’ है?
सोचें, यदि वह ब्रिटिश शिक्षा, संवैधानिक व्यवस्था, अभिव्यक्ति स्वतंत्रता, निर्वैयक्तिक नौकरशाही, आम चुनाव, पेनल कोड, स्कूल, विश्वविद्यालय, संग्रहालय, आदि अनुपयुक्त होते, और किन्हीं भी मध्ययुगीन या प्राचीन भारतीय ‘व्यवस्था’ (यदि किसी को मालूम हो कि वह क्या थी!) को पुनः अपनाने से काम चल जाता — तो यह ‘उपनिवेशवादी’, ‘मैकॉलेवादी’ व्यवस्था हट जाती। कोई भी बेहतर छोड़ कमतर नहीं चुनता।
पर जो लोग मैकाले को कोसते और ‘इंडियन नॉलेज’ का डंका पीटते हैं, वही दूसरी साँस में भारतीय इंजीनियर, डॉक्टर और टीचर ‘एक्सपोर्ट’ करने की डींग भी हाँकते हैं। जबकि ऐसे भारतीय मैकाले-शिक्षा, यानी अंग्रेजों की देन हैं! इसी तरह, जो ‘वसुधैव कुटुंबकम्’ बोल कर फूलते हैं, वही अमेरिका और यूरोप को नीच बताते हैं। ऐसे प्रचारक अपनी ही दो बातें जोड़कर विचारने में असमर्थ हैं — कि उस में क्या संगति है?
इसीलिए उन के गढ़े हुए ‘हिन्दू स्टडीज’, ‘इंडियन नॉलेज…’, आदि बचकाने मुहावरे हैं। महान साहित्य को पढ़ने-पढ़ाने की सीधी, सच्ची, और प्रेमपूर्ण व्यवस्था करने के बदले मुहावरे गढ़ना और हाँकना — यह ज्ञान के नाम पर प्रोपेगंडा है। दलबंदी का विकास, पर शिक्षा का ह्रास।
यह पतन इस से भी साफ दिखता है कि स्वतंत्र भारत के लगभग अस्सी सालों में यहाँ शायद ही कोई नयी ऐतिहासिक या वैज्ञानिक खोज हुई। उस तरह की मौलिकता अंग्रेजों के जाते ही जाती रही! जितनी खोज, जितना प्रशिक्षण, भारतीय जिज्ञासुओं को अंग्रेजी राज ने दिया था, वह परंपरा 1960 का दशक जाते-जाते सूख गई। सर जदुनाथ सरकार, रमेश चंद्र मजूमदार, नीलकंठ शास्त्री, सी.वी. रमन, जैसे ब्रिटिश-प्रशिक्षित मौलिक इतिहासकारों, विद्वानों, वैज्ञानिकों की श्रेणी ही लुप्त हो गई!
इस प्रकार, ‘राष्ट्रवादी’ देसी शासकों ने हमारी शिक्षा को तुरत बाँझ बना दिया! उसी विकास क्रम में यह नया चलन है कि बिना इतिहास पढ़े-पढ़ाए अपनी ज्ञान-परम्परा का झंडा लहराना सिखा दिया जाए! अब शैक्षिक दस्तावेज में ‘इतिहास’ विषय ही लुप्त है।
अतः अनायास नहीं कि जिन वर्षों से ‘इंडियन नॉलेज’ का ढोल पीटा जा रहा है, किसी भी ज्ञान-ग्रंथ का नाम नहीं आया, जिसे नए सिरे से कोई महत्व या स्थान दिया गया हो। सो, कोई ज्ञान नहीं, बल्कि यह प्रोपेगंडा करने-कराने वाले ही महत्व, स्थान, आदि ले रहे हैं। (जारी)
